<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200</id><updated>2012-02-15T22:18:51.297-08:00</updated><category term='खेल खेल में'/><category term='शुरुआत'/><category term='दोगलापन...'/><category term='कुछ अलग'/><category term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><category term='विज्ञापनों के ज़रिए...'/><category term='मैट्रो का सफर...'/><category term='फ़िल्मी चक्कर...'/><category term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><category term='इंटरनेट के झरोखे से...'/><category term='टीवी की कहानी दर्शक की ज़ुबानी...'/><title type='text'>पुलिया से ब्लागिंग तक...</title><subtitle type='html'>कभी पुलिया पर बैठे किचकिच करते थे... 
अब कम्प्यूटर पर बैठे ब्लागिंग करते हैं...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>87</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-3447416378141291883</id><published>2011-11-18T11:15:00.000-08:00</published><updated>2011-11-18T11:16:27.915-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फ़िल्मी चक्कर...'/><title type='text'>रॉकस्टार के ज़रिए एक सोच की समीक्षा...</title><content type='html'>&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-size:10.0pt;mso-ansi-font-size: 11.0pt;line-height:115%;font-family:Mangal;mso-bidi-font-family:Mangal; mso-bidi-theme-font:minor-bidi"&gt;रॉकस्टार- एक ऐसे लड़के की कहानी जो न प्यार को समझ सका और न अपने अंदर छुपे संगीत के हुनर को। केवल लोकप्रिय हो जाना ही समझ का पैमाना नहीं होता हैं। पूरी फिल्म में कहीं उसे संगीत से प्यार करते नहीं देखा। बिल्कुल वैसे ही जैसे प्यार करते भी नहीं देखा। जनार्दन को हीर बस होना चाहिए... शायद अंतिम सीन में वो महसूस कर पाया कि वो प्यार करता था या फिर ये कहे कि वो प्यार के अहसास को समझ सका। इम्तियाज़ अली की अब तक की निर्देशित चारों फिल्में देखने के बाद ये महसूस हुआ कि सभी फिल्मों के नायक-नायिका बहुत व्यवहारिक हैं। हालांकि जब वी मेट की गीत अंशुमन से प्यार करती थी। लेकिन, अंत में यही हुआ कि वो प्यार नहीं आकर्षण निकला और प्यार को तो एक दम अंतिम समय में समझ पाई। लव आजकल में तो युवाओं की इस सोच पर निर्देशक कम कहानीकार ने ऋषि कपूर के किरदार के ज़रिए खुद ही चोट कर दी थी। प्यार को न समझनेवाले सैफ के किरदार को ये मालूम था कि उसे क्या करना है, कहाँ नौकरी, कहाँ घर...  वो केवल प्यार को ही नहीं समझ सका। यही हाल रहा जनार्दन का... हीर उसे होना चाहिए... क्यों होना चाहिए&lt;/span&gt;? &lt;span lang="HI" style="font-size:10.0pt;mso-ansi-font-size: 11.0pt;line-height:115%;font-family:Mangal;mso-bidi-font-family:Mangal; mso-bidi-theme-font:minor-bidi"&gt;ये वो अंत तक नहीं समझा सका। फिल्म जिस उम्र से शुरु होती हैं उसे मैं जी चुकी हूँ और जिस उम्र पर खत्म होती है उसे जी रही हूँ। इसलिए ये दावे से कह सकती हूँ कि इन सभी फिल्मों के किरदार बहुत व्यवहारिक है और भावुक नाममात्र को। मुझे मेरे भावुक होने और मेरे भावनात्मक लगाव के बारे में कई प्रकार के ज्ञान मिल चुके हैं लेकिन, इन किरदारों को देखकर लगता हैं कि ये बेवकूफ नहीं हैं और ये पहले से ही जानते हैं कि दरअसल सबकुछ भावनात्मक लगाव ही हैं। ज़िंदगी में उसी भावनात्मक लगाव पर आकर गाड़ी रूक जाती हैं। लेकिन, सिनेमा में इससे आगे बढ़कर जबरन में फिर प्यार में तब्दील हो जाती हैं। यही वजह है कि गीत अंशुमन के सामने आदित्य को किस करती हैं या मीरा हनीमून के पहले दिन अपने पति को छोड़ देती हैं और हीर शादी के दो साल बाद जानार्दन से संबंध बनाती हैं... इन फिल्मों से और इन किरदारों से आप टुकड़ों में प्रभावित हो पाते हैं... कइयों के मन से आवाज़ आती हैं काश मैं भी ऐसा कर पाता&lt;/span&gt;/&lt;span lang="HI" style="font-size: 10.0pt;mso-ansi-font-size:11.0pt;line-height:115%;font-family:Mangal; mso-bidi-font-family:Mangal;mso-bidi-theme-font:minor-bidi"&gt;पाती... और, मुझे लगता है कि सच में ये सिनेमा ही है... क्योंकि, असल ज़िंदगी में या तो हम व्यवहारिक है या तो हम भावुक... &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-3447416378141291883?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/3447416378141291883/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=3447416378141291883' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3447416378141291883'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3447416378141291883'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/11/blog-post_18.html' title='रॉकस्टार के ज़रिए एक सोच की समीक्षा...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-5797503064598682150</id><published>2011-11-15T10:37:00.000-08:00</published><updated>2011-11-15T10:42:42.531-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोगलापन...'/><title type='text'>हम चले नेक रस्ते पे हमसे भूलकर भी कोई भूल हो ना...</title><content type='html'>बचपन से हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर, आँखें बंद करके हम ये प्रार्थना करते आए हैं। घर हो या स्कूल हमेशा हमें सही और सच के रास्ते पर चलने की सीख दी जाती हैं। हमेशा से समझाया जाता है कि कुछ भी हो जाए सही करो। एक से बढ़कर एक ऐसी जीवनियां हमें पढ़ाई गई हैं जिनसे हमें सच के रास्ते पर चलने की सीख मिले। आज शाम को एक साथ ये पूरी पढ़ाई मेरी आँखों के सामने तैर गई। सच बोलो, सच का साथ दो, सच सीखो... लेकिन, सच को तय करने के अधिकार के बारे में कभी कोई जानकारी मुझे तो मेरी पढ़ाई ने नहीं दी। आखिर ये तय कौन कर रहा है कि क्या सच हैं और क्या झूठ। क्या सही है और क्या ग़लत। आज तक मैं इस खेल से अंजान थी लेकिन, आज मैं समझ गई। दरअसल ये मैं तय कर रही हूँ कि क्या सच हैं और सही हैं और क्या ग़लत या फिर झूठ। लेकिन, अपने लिए नहीं। ना बिल्कुल नहीं। मैं ये तय करती हूँ दूसरों के लिए, इस समाज के लिए और मेरे लिए सही और ग़लत तय करता है ये समाज। नेक रास्ते पर हम चले तो... लेकिन, कौन-सा रास्ता नेक हैं ये हमें कोई दूसरा बताएगा। भूल हमसे कोई ना हो। लेकिन, भूल है क्या ये कोई और तय करेगा। स्कूल में, घर में, हमेशा हमें सिखाया जाता हैं कि वो करो जो सही हो, किसी का दिल मत दुखाओ, केवल मौज या मस्ती के लिए किसी की भावनाओं से मत खेलो... लेकिन, एक वक्त ऐसा आ जाता हैं कि हमारी ही भावनाओं से खेला जाता हैं और ये समझाया जाता हैं कि अरे, ये ज़माना बहुत प्रैक्टिकल हैं भावनाओं के लिए यहां कोई जगह नहीं। एक महिला, एक पत्नी के रूप में अपने पति के साथ सूखी रोटी खाने को तैयार रहती हैं। पिता का हरेक परिस्थिति में साथ निभाती हैं। बच्चों के लिए कुछ भी कर जाती हैं। लेकिन, एक सास के रूप में अचानक से भावनाओं को तुच्छ मानकर व्यवहारिक हो जाती हैं। पति के साथ सूखी रोटी खानेवाली पत्नी अपनी बेटी को सलाह दे देती हैं कि लड़के के स्वभाव पर मत जाओ समाज के नियमों और परिवार के पैसों की खनक को समझो। प्यार तो उम्र का तकाज़ा हैं हो जाता हैं। लेकिन, भावनाओं में मत बहो। वो करो जिससे समाज में खड़ी रह सको। आश्चर्य होता है एक माँ को बेटी की शादी बिना किसी सोच समझ के करते देख। और, माँ भी वो जो अपनी माँ को इस बात पर कई बार कोस चुकी हो कि काश मेरी शादी आपने सोच-समझकर की होती... दरअसल एक जिंदा इंसान के दिल की भावनाओं से बढ़कर हैं ये अदृश्य समाज। ये समाज एक ऐसा शेर है जो कभी आता नहीं हैं बस मन को डराता है कि शेर आया, शेर आया... मैंने अपने बचपन में कभी किसी शिक्षा देनेवाले से नहीं पूछा कि आखिर ये सच हैं क्या... बस अपने विवेक और समझ से जिसे सच माना उसे अपनाया। लेकिन, मैं उम्मीद करती हूँ कि आनेवाली पीढ़ी एक बार अपने सिर को उठाकर, आँख से आँख मिलाकर और हाथ को हवा में लहराकर ज़रूर पूछे कि आखिर ये सच और नेकी है क्या...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-5797503064598682150?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/5797503064598682150/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=5797503064598682150' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5797503064598682150'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5797503064598682150'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='हम चले नेक रस्ते पे हमसे भूलकर भी कोई भूल हो ना...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-7258892489247753229</id><published>2011-10-07T12:13:00.000-07:00</published><updated>2011-10-07T12:14:04.388-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोगलापन...'/><title type='text'>अपने लिए जीना, जीना नहीं...</title><content type='html'>कभी कभी आपसे प्यार करनेवाले, आपके साथ अपनी ज़िंदगी को जोड़कर देखनेवाले, आपके साथ बचपन से रहनेवाले। आपको एक ट्राफी की तरह मानते हैं। आपस में इस होड़ में लगे रहते हैं कि कौन जीतेगा इसे। और, इस होड़ में जीते कोई भी हार केवल उस ट्राफी की होती है जिसके लिए ये सारी लड़ाई हैं। ट्राफी कब, कौन बन जाए ये भी आप नहीं कह सकते। कभी आप खुद वो ट्राफी हैं, तो कभी आप उसे पाने की दौड़ में हैं। समय और परिस्थितियां तय करती हैं आपकी जगह। फिलहाल मेरे सामने भी एक ऐसा इंसान मौजूद हैं, जो लोगों के बीच ट्राफी बना हुआ हैं। वो क्या करेगा ये तय तो उसे ही करना हैं लेकिन, अपने लिए नहीं बल्कि किसी एक की खुशी के लिए। यहाँ ये बात समझाने की ज़रूरत नहीं कि फैसला कुछ भी हो उसे दुखी ही रहना हैं। हम हमेशा से ही अपनी ज़िंदगी दूसरों के लिए जीते आए हैं। हम सब ऐसा ही करते हैं। हम दूसरों के लिए जीते हैं और दूसरे उम्मीद करते हैं कि वो हमारे लिए जिए। जब हम दूसरों के लिए करते हैं तो हम उस बात का अहसान मनवाना चाहते हैं और जब दूसरा करता है तो उसे उसका फर्ज़ मानकर हल्का करने की भी पूरी कोशिश करते हैं। ऐसे में हमारे आसपास अगर एक भी अपनी ज़िंदगी अपने लिए जीनेवाला, हिम्मती और सामाजिक रूप से मतलबी मिल जाता है तो हम अपनी नाकामयाबी को छिपाते हुए उसे कोसने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। दरअसल, सामाजिक प्राणी वही तो है जो कि अपनी ज़िंदगी कुंठा में दूसरों के लिए बिता दें। और, दूसरों को समाज के लिए ज़िंदगी बिता देने के बोझ में दबा दें...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-7258892489247753229?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/7258892489247753229/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=7258892489247753229' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7258892489247753229'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7258892489247753229'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='अपने लिए जीना, जीना नहीं...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-8356709702247036014</id><published>2011-04-28T07:00:00.001-07:00</published><updated>2011-04-28T07:00:43.092-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>सुविधाओं का अभाव ही शायद इंसान को सरल बनाता है...</title><content type='html'>शुरुआत से ही विज्ञान की छात्र होने के बावजूद कभी भी इंजीनियर बनने के बारे में नहीं सोचा। विज्ञान और गणित दोनों ही ऐसे विषय रहे हैं जोकि मुझे नबंर ज़्यादा पाने के लिए आसान लगे हैं। इसमें आपको अपनी कोई ख़ास क्रिएटिविट नहीं दिखानी होती है। लेकिन, जिस चीज़ से इंसान भागता है वो उसके सामने कभी न कभी आ ही जाती है। मेरा भी यही हाल है। आज जो काम कर रही हूँ उसका पूरा सत्व ही क्रिएटिविट में झुपा हुआ है। खैर, पिछले शनिवार को ये समझ में आया कि विशुद्घ विज्ञान या गणित किस हद तक क्रिएटिव हो सकते हैं। आईआईआईटी दिल्ली में लगे ओपन हाउस में पहुंचकर मालूम चला कि कैसे समीकरण ज़िंदगी में घुल मिलकर कुछ अनोखा बना सकते हैं। सबसे पहले ही सामना हुआ एक ऐसी साइकल से जोकि खुद ब खुद टायरों में हवा भर सकती है। सोच सचमुच अच्छी थी क्योंकि साइकल में हवा कम होने पर उसे पंचरवाले तक लेकर जाना बड़ा कड़ा काम है। लेकिन, छात्रों की इस सोच को परिपक्व होने में वक़्त लगेगा। आगे बढ़े तो कुछ छात्र एक अजीबों गरीब बैक पैक के साथ मिले। पास जाने पर मालूम चलाकि ये मज़दूरों को ज्यादा भार आसानी से उठा लेने के लिए तैयार किया गया है। विशुद्ध वैज्ञानिक नियमों के ज़रिए सबसे बड़ी समस्या का निदान। ये प्रयोग मुझे अच्छा लगा हालांकि जिस देश में हाड़ तोड़ मज़दूरी करनेवालों को जहां ठीक से खाना नहीं मिलता उन्हें ये बैक पैक कहां नसीब। कुछ मॉडल ऐसे भी थे जिन्हें छात्रों ने बनाया तो था कि बेहतरीन सोच के साथ लेकिन वो उसे समझा नहीं पा रहे थे। कुछ-कुछ ऐसा ही था एक जूट का गिटार। जोकि छात्रों के मुताबिक़ इको फ्रेन्डली और सस्ता था लेकिन, छात्र ये नहीं बताया कि कैसे वो इसे एम्लिफाय कर सकता है। कुछ छात्राओं ने कपड़े सुखाने की मशीन बनाई थी तो कुछ ने एक समान प्लटों को धोने की। कुछेक सार्वजनिक स्थलों से कचरा हटाने में जुटे थे। सभी छात्रों की सोच तो काबिल-ए-तारीफ़ लगी लेकिन, साथ में ये भी ये भी लगाकि ये सोच दुनियादारी से बहुत दूर है। जब असल में इन्हें उपयोग में लाने की बात होगी तो हो सकता है कि कई रुकावटें आएं। कुछ भी हो लेकिन ये सोचकर एक सूकून मिला कि देश का ये भविष्य समाज के लिए सोच रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत में- आईआईटी में छात्रों को इन प्रयोगों के साथ देखकर जितना अच्छा लगा उतना ही दुख हुआ दिल्ली के स्कूली छात्रों को देखकर। एक भी छात्र इन प्रयोगों को देखने के लिए आया हो ऐसा नहीं महसूस हुआ। सभी बस झुण्ड बनाकर इधर-उधरकर हंसी हंगामा करते नज़र आए। कुछेक तो बदतमीज़ी से बात करते भी दिखे। आईआईटी में आकर महसूस हुआ कि सुविधाओं का अभाव ही शायद इंसान को सरल बनाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-8356709702247036014?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/8356709702247036014/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=8356709702247036014' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8356709702247036014'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8356709702247036014'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/04/blog-post_28.html' title='सुविधाओं का अभाव ही शायद इंसान को सरल बनाता है...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4917652617539378178</id><published>2011-04-22T06:18:00.000-07:00</published><updated>2011-04-22T06:27:14.936-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैट्रो का सफर...'/><title type='text'>सफ़र से मिलती सीख...</title><content type='html'>बांटने से डर बढ़ता है। आप अगर जानबूझकर किसी वस्तु या व्यक्ति से दूर रहेंगे तो आपकी उसके बारे में राय आभासी होगी। ऐसे वक़्त में अगर उसके बारे में एक भी नकारात्मक ख़बर आ गई तो बस। ये बात मुझे महसूस हुई गुरुवार को। जब रात साढ़े दस बजे मैं ग्रीन पार्क मेट्रो स्टेशन पहुंची। मेट्रो से सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन का साधन शायद ही कोई हो। इस बात को जानते हुए भी मैं थोड़ी बेचैन सी थी। मुझे आजकल ट्रेन के लेडीज़ कोच में महिलाओं के साथ सफ़र करने की ऐसी आदत हो गई है कि सामान्य कोच में पुरुषों के साथ यात्रा करने में घबराहट होती है। ऐसे में रात के साढ़े दस बजे तो लेडीज़ कोच के मायने को ही पुरुष यात्री नकार देते है। खैर, मेट्रो आई और लेडीज़ कोच में एक भी पुरुष यात्री नहीं था। दरअसल पूरा कोच खाखी रंग में पुता हुआ सा लग रहा था। पूरे कोच में सीआईएसएफ़ की महिला सिपाही बैठी हुई थी। हर स्टेशन से चार-पांच का इजाफ़ा भी हो रहा था। सभी अपनी-अपनी ड्यूटी ख़त्म करके आ रही थी। बस उनकी खाखी वर्दी के डर से ही किसी की हिम्मत नहीं हुई लेडीज़ कोच में घुसने की। ग्रीन पार्क से राजीव चौक का सफर मैंने सूकून से काटा। मेरे मन को खाखी वर्दी पहनी महिलाओं को देखकर बहुत आराम मिला। अंजान डर से थोड़ी सी राहत। इसके बाद राजीव चौक पहुंचते ही मन फिर डूबने लगा। दिन की आखिर मेट्रो को पकड़ने के लिए मुझे चालीस मिनिट तक वही रुके रहना पड़ा। पूरे समय यही तनाव कि लेडीज़ कोच में पुरुष ना बैठे हो। अंजान पुरुषों के साथ सफ़र ना करने का हश्र ऐसा होगा कभी सोचा नहीं था। एक समय था जब मैं बस और मेट्रो में उनके साथ कंधे से कंधा टकराकर सफ़र करती थी। आगेवाले डिब्बे की तरफ टहल रहे लड़कों को देखकर मेरा बीपी बढ़ रहा था। मुझे अचानक से लगने लगा कि इस तरह का बंटवारा भले ही सहुलियत देता हो लेकिन, ये मन में कई भय भी छोड़ देता है। अचानक से ही साथ में बैठा अंजान पुरुष वहशी लगने लगता है। एक आरामदायक सफर तनाव भरा हो जाता है। स्टेशन पर बिताए चालीस मिनिट और उसके बाद ट्रेन में गुज़ारे 20 मिनिट पूरे तनाव में गुज़रे। हालांकि इस दौरान न तो किसी पुरुष ने मुझे घूरा और न ही बदतमीज़ी की। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि इस तनाव से ही मैं इतनी कमज़ोर हो रही हूँ कि अगर किसी ने कोई बदतमीज़ी की भी तो मैं शायद अपना बचाव न कर सकूं। समाज ऐसा होना चाहिए जहां सभी एक साथ आरामदायक और दोस्ताना तरीक़े से रह सके। यूं अलग-अलग कोच में बांट देने से एक दूसरे के प्रति सम्मान कम और डर ज़्यादा बस जाता है। हमें एक दूसरे के साथ रहकर एक दूसरे का सम्मान करना आना चाहिए। ना कि जिस चीज़ से डर लगे उससे यूं दूर भागना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4917652617539378178?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4917652617539378178/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4917652617539378178' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4917652617539378178'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4917652617539378178'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/04/blog-post_22.html' title='सफ़र से मिलती सीख...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4856205906796076597</id><published>2011-04-18T07:12:00.001-07:00</published><updated>2011-04-18T07:12:27.304-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>समझ ज़रूरी है...</title><content type='html'>स्कूली दिनों को हम लोग मौज मस्ती के लिए ही ज़्यादातर याद करते हैं। पढ़ाई भी याद आती है तो किसी शिक्षक की बातों से या किसी शरारत से। ऐसा शायद ही किसी के साथ होता हो कि वो स्कूल को वहाँ की बेहतरीन पढ़ाई के लिए याद करता हो या ये याद कर रहा हो कि उसके स्कूल में जो उसे पढ़ाया वो आज काम आ गया। स्कूल एक ऐसी जगह बन गई है जहाँ जाना आपके पढ़े लिखे होने का सबूत है। लेकिन, स्कूल में मिलनेवाली शिक्षा इतनी ज़्यादा एक ढर्रेवाली और निरस होती है कि उसे पढ़ने के बाद न तो वो हमें वो आनेवाले समय के लिए बहुत लाभदायक लगती है और न ही एक सुखद याद की तरह हमारे साथ रहती है। शिक्षा पद्धति को रोचक बनाने के लिए आज के वक़्त में बहुत से काम हो रहे है। ख़ासकर गणित और विज्ञान जैसे विषयों को लेकर। यही ऐसे दो विषय रहे हैं जिनसे बच्चे सबसे ज्यादा भयभीत रहे हैं। इन विषयों को सरल बनाने के लिए जोड़ो ज्ञान नाम की संस्था भी काम रही है। ये संस्था गणित और विज्ञान को लेकर कई किट बना चुकी है। इस संस्था का मानना है कि किसी भी विषय को व्यवहारिक रूप से समझाया जाना ज़रूरी है। प्रायोगिक तौर पर बातों को सिखाने की शुरुआत बचपन से ही होनी चाहिए। अपने कार्यक्रम के सिलसिले में जब मैं इस संस्था के एक केन्द्र पर पहुंची तो मुझे तीन क्लास नज़र आई। क्लास के नाम चमकता सूरज और टिमटिमाते तारे और कुछ ऐसे ही थे। पहली क्लास में नन्हे मुन्ने ब्लॉक्स छुपा रहे थे। ये केवल उतने ही ब्लॉक छुपाते हैं जितने कि मैडम के बड़े से डायस को उछालने पर आते हैं। बच्चे अंकों को समझते है वो जानते हैं कि दो क्या है और चार क्या। हां लेकिन, वो अभी लिखना नहीं जानते हैं। यहां अमूर्त गणित को मूर्त रूप से दिमाग़ में सहेजने का काम चल रहा है। स्कूल एक सीधी खड़ी बिल्डिंग में था, सो ऊपर पहुंचने पर हमने देखा कि अलग-अलग उम्र के बच्चे एक साथ काम कर रहे हैं। एक बच्चा स्कैच कर रहा है तो दूसरा उसमें रंग भरेगा और तीसरा उसके बारे में लिखेगा। अलग-अलग उम्र के बच्चों को यूं एक साख देखकर आश्चर्य हुआ। मुझे स्कूल की एक शिक्षक ने समझाया कि इनमें शामिल बड़े बच्चे स्कूल ड्रॉप आउट है। और, यहां सामान्य स्कूलों से इतर साथ काम करना सिखाया जाता है। उनका मानना है कि हमें आगे चलकर साथ मिलकर ही काम करने होते हैं लेकिन, स्कूलों में सिखाया जाता है कि कैसे अलग और अकेले काम किए जाए। प्रतिस्पर्धा इतनी ज़्यादा होती है कि हम साथ काम करना भूल ही जाते है। जबकि यही वो समय है जब साथ रहना आसानी से सीखा जा सकता है। इसके बाद हम पहुंचे सबसे ऊपर बड़े बच्चों की क्लास में जहां बच्चे एक ऐसा प्रयोग कर रहे थे जोकि साल भर तक चलेगा। दिन और रात के अनुपात को समझने का प्रयोग। इसके लिए उन्हें साल भर तक सुबह उठकर सूरज के उगने का समय और शाम को ढलने का समय नोट करना था। इस प्रयोग से जो वो सीखेंगे वो उसे ज़िंदगीभर याद रखेंगे। और, यही तो होती है असल शिक्षा। जोड़ो ज्ञान अपने स्तर पर ज्ञान को सरल और सुगम तरीक़े से जोड़ने का काम कर रहा है। वो सरकारी स्कूलों में इस तकनीक को लागू करवाना चाह रहा है। ये सब बस इसलिए कि बच्चे पढ़े आगे बढ़ने के लिए, ज़िंदगी में उसे ढालने के लिए। ना कि बस रटने के लिए...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4856205906796076597?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4856205906796076597/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4856205906796076597' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4856205906796076597'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4856205906796076597'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/04/blog-post_18.html' title='समझ ज़रूरी है...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-744009513826856089</id><published>2011-04-13T06:37:00.001-07:00</published><updated>2011-04-13T06:37:56.986-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ अलग'/><title type='text'>जब साइकल से नापा दिल्ली को...</title><content type='html'>कई बार ऐसा होता है कि नौकरी करते-करते एक ऐसा वक़्त आ जाता है कि हम कुछ नए की तलाश में लग जाते हैं। वही कुछ ना मिल सकें तो कही और खोजना शुरु कर देते है। परिवर्तन की चाह स्थाई भाव की तरह हमारे साथ चिपका रहता है। लेकिन, मैं हमेशा से यथास्थिति को बनाएं रखने में यक़ीन रखती हूँ। जो जैसा है वैसा ही रहे कुछ ना बदले। जैसे ही कुछ बदलाव होते हैं मैं बैचैन होने लगती हूँ। दरअसल ये मेरे अंदर का डर और आत्मविश्वास की कमी है जोकि मुझे परिवर्तन के प्रति पहले से ही डरा देती हैं। खैर, नौकरी के मामले में मेरी राय बदलाव न होने के मामले में कुछ ज्यादा है। लेकिन, न चाहते हुए भी हर बार, हर नए हफ्ते में किसी नई परिस्थिति में पड़ जाती हूँ। मेरे साप्ताहिक कार्यक्रम सुर्खियों से परे के लिए मुझे ऐसी-ऐसी ख़बरें खोजनी और करनी पड़ती है जो मुझे कुछ नया अनुभव मुफ्त ही दे जाती है। कभी मुझे संसद भवन की रखवाली में लगे लंगूर से हाथ मिलाने पड़ता है, तो कभी गधों के लिए काम करनेवाले अंग्रेज़ जोड़े के साथ घूमना और कभी तो कपड़ों की धुलाई के नए तरीक़ों की छानबीन करनी पड़ जाती हैं। कइयों को लगता है कि मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे ऐसे मौक़े मिलते हैं लेकिन, मुझ जैसी आलसी के लिए ये मौक़े बहुत ही भारी होते हैं। और, आसली होने के बावजूद मेरे कामचोर न होने की वजह से हर बार ऐसी स्टोरी से मुझे दो चार होना ही पड़ता हैं। बात कुछ 15 दिन पहले की है जब मुझे डेल्ही बाय सायकल के बारे में जानकारी हुई। कुछ विदेशी जो कुछ साल से दिल्ली में रह रहे हैं, दिल्ली की सैर करवाते हैं। सैर का तरीक़ा ऐसा जो कोई भी पारंपरिक भारतीय पर्यटक कभी ना अपनाएं। साइकल पर सवार होकर ये लोग पर्यटकों को दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों की सैर करवाते है। जैसे कि पुरानी दिल्ली का वो इलाक़ा जिसे शाहजहां ने बसाया था या फिर यमुना के किनारे बसी दिल्ली या फिर अंग्रेज़ों के समय बसी दिल्ली। ये सभी सुबह-सुबह एक निश्चित समय पर पहुंचकर पर्यटकों को साइकल थमा देते हैं और आगे-आगे साइकल चलाते जाते हैं और पीछे पर्यटक। मैं भी इस टूर को शूट करने के लिए सुबह 6 बजे पहुंच गई पुरानी दिल्ली के डिलाइट सिनेमा के सामने। वहां मिली स्तासा। स्तासा इस ग्रुप की एक गाइड है। उसने हमें बताया कि कैसे वो पिछले पांच महीने से भारत में केवल इस ग्रुप के साथ इंटर्नशीप के लिए है। इसकी शुरुआत जैक ने की है जोकि नीदरलैण्ड से है। वो दिल्ली में नीदरलैण्ड के एक अखबार के संवाददाता के रूप आए थे। लेकिन, कुछ नए की चाह में उन्होंने दिल्ली को साइकल पर घुमाने की शुरुआत की। सुबह-सुबह पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में मैं साइकल चलाऊंगी ये मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। लेकिन, मैं चला रही थी। जिस दिल्ली में 6 साल से कुछ नहीं चलाया और शूट के चक्कर में उसे पूरा नाप लिया। उस दिल्ली में मैं साइकल चला रही थी, वो भी कुछ 15 साल बाद। मैं और मेरा कैमरामैन हम दोनों ने पूरे 11 किलोमीटर के टूर में कभी उनका पीछा किया तो कभी उनके आगे चले। मेरे कैमरामैन साइकल से ही ऑफिस आते हैं, तो साइकल नहीं लेकिन उसे चलाते हुए कैमरा हैंडल करना ज़रूरत भारी पड़ा होगा। पुरानी दिल्ली की गलियों में यूं साइकल पर देखकर लोग तो हमें कम चौंके मैं खुद ही अपने आपमें चौंकी हुई सी थी। स्तासा ने हमें तुर्कमान गेट, पुराने घर और मंदिर दिखाए। हालांकि इनके बारे में उसकी जानकारी मुझे कुछ कम लगी। कई बार मुझे उसे सही करना पड़ा। कामकाज स्पष्ट बोलना कितना ज़रूरी और हिम्मतवाला काम है ये मैंने उससे सीखा। स्तासा ने हमारे टूर के दो पर्यटकों को आधे टूर से ही लौटा दिया क्योंकि वो साइकल नहीं चला पा रहे थे। बिना किसी लाग लपेट के उसने कहां और वो दोनों चले भी गए। कोई भारतीय होता तो पैसे देने का रौब जमाते और साइकल ना आने की बात को छुपाने के पीछे दलील देते और वही झगड़ने लगते। स्तासा ने चांदनी चौक, फतेहपुरी मस्जिद, लाल किला और जामा मस्जिद भी दिखाई। इन्हें कई लोगों ने कई बार देखा होगा। लेकिन, जैसे मैंने देखा और जैसा महसूस किया वो यूनिक था। चांदनी चौक पर साइकल चलाना या फिर लाल किले के सामने भीड़ भाड़वाली सड़क को साइकल से क्रास करना। इस टूर में हमने नई दिल्ली को भी देखा और बदहाल यमुना नदी के साथ गंदी गौशालाओं को। इस सबके बीच कई बार ये महसूस हुआ कि अंग्रेज भारत गंदगी देखने ही आते हैं। इन टूर में भी अधिकतर अंग्रेज़ होते हैं। क्योंकि उन्हीं को भारत के इस चेहरे में दिलचस्पी है और वही है जोकि घूमने के उद्देश्य से लगातार तीन घंटे साइकल चला सकते हैं। हमारे लिए तो घूमने का अर्थ ही आराम होता है। मेरे लिए इस टूर को शूट करने से बड़ा अनुभव रहा यूं साइकल चलाना और दिल्ली के गली कूचों से गुज़रना। जहां कुछ लोग मुस्कुराते मिले तो कुछ छेड़ते और फब्तियाँ कसते। दो दिन तक उनका पीछा करने के बाद तीसरे दिन सुबह-सुबह में जल्दी ही उठ गई और लगा कि जैसे फिर चली जाऊं। मेरी यही तो परेशानी है बदलाव से डरती हूँ और अगर कुछ बदल जाएं तो बस उसी में ढल जाती हूँ...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-744009513826856089?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/744009513826856089/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=744009513826856089' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/744009513826856089'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/744009513826856089'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='जब साइकल से नापा दिल्ली को...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-2854784150893336183</id><published>2011-03-07T03:52:00.001-08:00</published><updated>2011-03-07T03:52:58.248-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>मरने का हक़...</title><content type='html'>इंसान का स्वभाव एक मुश्किल पहेली है। कौन, कब, कैसे, क्या करेगा कोई नहीं कह सकता है। एक भी ऐसा मुद्दा नहीं जिस पर सबकी राय एक सी हो। कुछ लोग अतिवादी होंगे तो कुछ उदारवादी। अरुणा शानबाग के लिए इच्छा मृत्यु सही है या ग़लत इस पर भी लोगों की कई तरह की राय है। हालांकि अपने जीवन पर अरुणा कोई राय व्यक्त करने लायक़ नहीं। अरुणा को सालों से संभाल रहे अस्पताल के कर्मचारी उसे ज़िंदा देखना चाहते हैं, तो दूसरी ओर उसके जीवन को शब्दों में उकेर चुकी लेखक उसे पीड़ा से मुक्ति दिलाना चाहती है। अरुणा की ख़बर सुनकर गुज़ारिश याद आ गई। फ़िल्म में ईथन मैक्सरेगस ख़ुद अपने लिए मृत्यु मांगता है जोकि उसे नहीं दी जाती हैं। अपनी ज़िंदगी शान से जी चुके ईथन को ये महसूस होता है कि कोई नहीं है जो उसके दर्द को समझता हो। ईच्छा मृत्यु एक ऐसा विषय है जिस पर कभी एक राय तो क्या किसी एक व्यक्ति की हमेशा एक राय नहीं हो सकती हैं। इंसान अगर ख़ुद किसी असह्य पीड़ा से गुज़र रहा हो तो वो रोज़ाना यही प्रार्थना करता है कि हे ईश्वर ! मुझे उठा ले। लेकिन, वही अगर उस जगह उसका बच्चा हो तो वो पूरे समय ईश्वर से उसकी सलामती और बेहतरी की दुआ मांगता हैं। एक भी बार उसके मुंह से उसके लिए मौत की बात नहीं निकलती हैं। वैसे भी हमारी ईच्छाएं समय और परिस्थितियों पर सौ फ़ीसदी निर्भर करती हैं। आज हम जिसे चाहते हैं कल उसे नकारते हैं। या आज जो हमें नापसंद है, कल वो ही हमारा चहेता होता हैं। ऐसे में मौत की कामना करना कहाँ तक सही होगा। मेरे चाचा की दो हफ्ते पहले कैंसर से मौत हो गई। भाई-बहनों में सबसे छोटे वो पिछले पाँच साल से पल-पल मर रहे थे। मन ही मन उनकी इस परिस्थिति से दुखी होकर हर कोई उनके स्वस्थ होने की कामना करता था। लेकिन, अंतिम समय में बदतर हो चुकी उनकी हालत को देखकर सभी उनके लिए मौत ही मांग रहे थे। अपने अंत समय तक इंसान के मन में जीने की प्रबल इच्छा होती है। आखिरी सांस तक हम जीना चाहते हैं। लेकिन, कई बार ये जीवन मौत से बदतर हो जाता है। ऐसे में जीने के अधिकार के साथ क्या मरने के अधिकार का भी होना ज़रूरी नहीं है? ये कहा जा सकता है कि इसका ग़लत इस्तेमाल भी हो सकता है लेकिन, फिर बस वही बात कि ऐसी कौन सी चीज़ है जिसका सही और ग़लत दोनों तरीक़ों से इस्तेमाल न हो रहा हो। मेरी एक सहकर्मी की दलील है कि जो लोग इलाज कराने में अक्षम है उन्हें इस बात की छूट होनी चाहिए कि अपने या अपने परिवार के किसी सदस्य के लिए इच्छा मृत्यु मांग सकें। लेकिन, क्या पैसे की कमी किसी की ज़िंदगी तय कर सकती है? क्या इसका मतलब ये हुआ कि पैसा है तो जीओ नहीं तो मर जाओ। इन सबके बीच एक और बात सामने आई। मेरे एक ऐसे ही बिस्तर पर पिछले कई साल से पड़े लड़के के उदाहरण पर मेरी सहकर्मी ने झट से कहा कि- उसके परिवारवाले उसे इसलिए नहीं मार रहे है कि वो परिवार का एकमात्र लड़का हैं। मेरा खून खौल गया। मुझे लगा कि जैसे उस लड़के माता-पिता के प्यार पर मतलब का चांटा पड़ गया हो। वही ये भी हुआ कि बच्चियों की जन्म लेते ही हत्या कर देना भी फिर मर्सी किलिंग के तहत आने लगेगा। क्या मर्सी किलिंग की आड़ में छुपकर लोग हत्याएं भी कर सकते हैं। अरुणा के मामले में ही अरुणा की ये हालत करनेवाला इंसान सात साल जेल में बिताकर कही आराम की ज़िंदगी जी रहा है। अपनी कुछ सेकेंड की हवस को शांत करने के लिए उसने एक पूरी की पूरी ज़िंदगी को बर्बाद कर दिया। गुनाह करनेवाला तो आसानी से छूट गया लेकिन, जिस पर बीती वो आज तक सज़ा भुगत रहा हैं। मर्सी किलिंग एक ऐसा विषय है जिस पर किसी एक या दो या एक दर्जन केस के ज़रिए भी फैसला या एक नियम बनाना असंभव है। क्योंकि हर इंसान के लिए ज़िंदगी और मौत दोनों के प्रति सोच अलग-अलग समय पर अलग-अलग है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-2854784150893336183?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/2854784150893336183/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=2854784150893336183' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2854784150893336183'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2854784150893336183'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='मरने का हक़...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4405312368988872630</id><published>2011-02-08T01:23:00.000-08:00</published><updated>2011-02-08T01:25:14.885-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ अलग'/><title type='text'>स्त्रीलिंग होने का अर्थ...</title><content type='html'>&lt;em&gt;दिल्ली में चलनेवाली मैट्रो ट्रेन में महिलाओं के लिए आरक्षित अलग कोच कई पुरुषों को ग़लत लगता है। पुरुषों की दलील है कि महिलाएं तो कंधे से कंधा मिलाकर चलती है। तो फिर क्यों अब वो अलग कोच चाहती है। महिलाओं की बराबरी पुरुषों को कितनी पसंद है और कितनी नापसंद इसका जवाब तो कोई पुरुष ही दे सकता है लेकिन, महिलाओं की हिम्मत को उनकी अकड़ और उनकी परेशानियों को उनकी ढाल माननेवाले पुरुषों के लिए ही एक सर्वे हुआ है। अगर वो चाहे तो इस लेख को पढ़ने के बाद महिलाओं की तकलीफ़ों को समझने और सही मानने की एक नए सिरे से कोशिश शुरु कर सकते हैं...&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गैर सरकारी संगठनों की ओर से हुए एक सर्वे के मुताबिक़ भारत में केवल 12 फ़ीसदी महिलाओं को ही माहवारी के दौरान साफ़-सुथरे नैपकिन उपयोग के लिए मिल पाते हैं। ये आंकड़ा चौंकानेवाला है। कम से कम मेरे लिए। शहरों में रहनेवाली और जीने के लिए ज़रूरी चीज़ों को आसानी से पा लेनेवाली मुझ जैसी लड़की के लिए ये आंकड़ा चौंकाने के साथ डराने का भी काम कर रहा है। देश की मात्र 12 फ़ीसदी महिलाएं नैपकिन का इस्तेमाल कर पाती है। संभव है कि ये महिलाएं मुझ जैसी शहरी ही हो। मतलब कि गांव और कस्बों में हर महीने महिलाओं को चार से पाँच दिन बद से बदतर हालात में गुजारने होते होंगे। बेहतरीन क्वालिटी और हाईजीनिक नैपकिन्स के इस्तेमाल के बाद भी कई बार दर्द और परेशानी जब सहन नहीं होती है तब उनकी क्या हालत होगी जो कपड़े या फिर पॉलीथीन का इस्तेमाल करती हैं। इन दिनों में साफ सफाई के साथ शारिरीक तौर पर आराम बेहद ज़रूरी माना जाता है। ऐसे में सर्वे के मुताबिक़ कई महिलाएं इस दौरान राख या रेत का भी प्रयोग करने के लिए मजबूर है और काम उतना ही जितना रोज़ाना होता है। राख या रेत के इस्तेमाल से कई महिलाओं को घाव हो जाते हैं और कई तरह की बीमारियाँ भी हो जाती हैं। गांवों में महिलाओं को इस दौरान अछूत मान लिया जाता है। कोई उन्हें छूता तक नहीं है और न ही उन्हें किसी मंगल कार्य में शामिल होने दिया जाता हैं। माहवारी के दौरान घर के काम या किचन में घुसने की मनाही के पीछे मूल वजह महिला को आराम देना और स्वच्छता को बनाए रखना ही होगी, जो आगे चलकर रूढ़ीवादी सोच में बदल गई। गांवों से इतर शहर में रहनेवालों के लिए तो टीवी पर हर ब्रेक के दौरान आनेवाले सैनेटरी नैपकिन के विज्ञापन को देखकर तो ये आभास होता है कि अब तो ये एक बेहद सामान्य सी बात है कि सभी को इसके बारे में मालूम है और महिलाएं अब इसका इस्तेमाल भी करती हैं। लेकिन, सच तो ये है कि महिला के लिए नैपकिन खरीदना परिवार के अन्य सदस्यों को एक खर्चा लगता है, उसकी मूल ज़रूरत नहीं। कुछ गैर सरकारी संस्थाओं ने मिलकर पुराने कपड़ों को जोड़कर नैपकिन बनाने की शुरुआत की है जिसकी क़ीमत 1 रुपए प्रति नैपकिन पड़ेगी। लेकिन, जहाँ महिला को पहनने को कपड़े और खाने के लिए पैसे ना हो वहाँ एक रुपए का नैपकिन भी बहुत बड़ी और मंहगी बात हैं। कई बार मुझे लगता है हम सच में आगे बढ़ रह रहे हैं। देश की महिलाएं पुरुषों से कन्धा मिलाकर चल रही है। बैंकों की सीईओ महिलाओं की मुस्कुराती तस्वीरों को देखकर लगता है कि महिलाएं अब किसी बात में पीछे नहीं। लेकिन, इन्हीं ख़बरों के बीच छुपी ये एक कॉलम की ख़बर सर से पैर तक एक झुरझुरी फैला देती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4405312368988872630?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4405312368988872630/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4405312368988872630' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4405312368988872630'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4405312368988872630'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/02/blog-post_08.html' title='स्त्रीलिंग होने का अर्थ...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-6722759067619529884</id><published>2011-02-07T04:13:00.000-08:00</published><updated>2011-02-07T04:15:41.535-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फ़िल्मी चक्कर...'/><title type='text'>काल्पनिक किरदारों के ज़रिए वास्तविकता दिखाती सिनेमा...</title><content type='html'>तेरे घर के सामने। देव आनन्द और नूतन की ये फ़िल्म मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है। इस फ़िल्म की कहानी से ज़्यादा दोनों के बीच का प्यार और उस प्यार के लिए उनकी लड़ाई और हिम्मत मुझे ज़्यादा पसंद है। साल 1963 में आई इस फ़िल्म को उस वक़्त आधुनिक ही माना गया होगा। क्योंकि ये तो वो दौर था जहाँ प्रेम विवाह बहुत कम होते थे और उस पर इस तरह से माता-पिता की मर्ज़ी के विरूद्द तो और भी नहीं। सामाजिक ढ़ांचा ज़रूर ऐसी बातों को स्वीकृति देने लगा होगा लेकिन, केवल बातों में। मतलब ये कि युवा ये ज़रूर मानने लगे होंगे कि अपनी मर्ज़ी से किसी से प्रेम और फिर शादी की जा सकती हैं लेकिन, कितने करते होगे और कितने कर पाते होंगे इस पर मुझे शक़ हैं। ये हाल हमेशा से ही रहा हैं। सिनेमा कई बार समाज की वो तस्वीर दिखाती हैं जोकि लोगों की बातों में तो है लेकिन, कर्मों में नहीं। अगर हम आज की ही बात करें। तो कई ऐसे हैं जोकि खुले संबंधों और विचारों की बात तो करते हैं लेकिन, जब करने की बारी आती हैं तो पीछे हट जाते हैं। लव आज कल की मीरा ने प्यार किया, सेक्स किया फिर खुशी से ब्रेक भी। फिर किसी और से प्यार और शादी। लेकिन, दूसरे ही दिन पति से ये बोलकर अलग हो गई कि कुछ ठीक नहीं लग रहा हैं। मीरा आज की ही लड़की हैं लेकिन, ऐसी कितनी लड़कियाँ असल में हैं जोकि ऐसा कुछ कर सकती हैं। हाँ, सोचने या इस तरह की बातों को बोलनेवाली कई मिलेंगी। सिनेमा के ज़रिए हम कई बार वो ज़िंदगी जी लेते हैं जोकि हम जीना तो चाहते हैं लेकिन, हिम्मत नहीं कर पाते हैं। ऐसे कई और उदाहरण हो सकते हैं जहाँ फिल्म के मुख्य किरदारों ने ऐसे विद्रोह किए हैं जोकि हमारे मन में कही ना कही दबे पड़े हैं। वो केवल प्यार के मामले में ही नहीं है और कई मामलों में हैं। रंग दे बंसती देखते ही हमारे रौंगटे खड़े हो जाते हैं और एक जोश भर जाता हैं। लेकिन, जो फ़िल्म में हुआ वो तो छोड़िए हम तो ख़ुद को तक सही नहीं कर पाते हैं। थ्री ईडियट देखकर निकलते वक़्त मेरे दोस्त ने कहा कि यार केवल काबलियत नहीं किस्मत भी थी आमिर के कैरेक्टर की। ये सच भी है मैं काबिल तो हूँ लेकिन, अगर मुझे कोई मौक़ा ही ना दे तो? किस्मत से मौक़ा मिलता है और जो काबिल होता है वो उसे भुना लेता है। सिनेमा हमारे भीतर छुपे उस हारे हुए और ख्यालों में खोए हुए इंसान को खुश करती हैं जो अपने मन से जीना चाहता है लेकिन, जी नहीं पाता हैं। सिनेमा में हरेक पात्र काल्पनिक होता है वो भले ही सच में हो तब भी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-6722759067619529884?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/6722759067619529884/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=6722759067619529884' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6722759067619529884'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6722759067619529884'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/02/blog-post_07.html' title='काल्पनिक किरदारों के ज़रिए वास्तविकता दिखाती सिनेमा...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-5301727628619190547</id><published>2011-02-02T03:47:00.000-08:00</published><updated>2011-02-02T03:49:09.077-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><title type='text'>मिसेज तेन्दुलकर</title><content type='html'>टीवी पर आनेवाले आधे ये ज़्यादा धारावाहिकों में महिलाओं को आग लगाऊं और कुटिल बुद्धि दिखाया जाता था। महिलाओं का दबदबा इतना ज़्यादा कि कुटिल महिला से लड़ने के लिए भी महिला ही सामने आती थी। खैर, इस बीच दौर आया प्रतियोगिताओं का। कही नाचना तो कही गाना। और, अब बारी है रीयलिटी टीवी की। हरेक चैनल ऐसे शो की भरमार है। इसी बीच स्टार ने अपने चैनल का लुक ही महिलाओं के हिसाब से कर दिया। चैनल कितना महिलाओं के प्रति संजीदा और कितना टीआरपी के प्रति इसके बारे में मुझे शक़ है। चैनल पर शुरु हुआ नया रीयलिटी शो- वाइफ़ बिना लाइफ़। इस शो में पत्नी जाती है छुट्टी पर और पति संभालते हैं घर और बच्चों को। पूरे तौर पर व्यवसायिक इस शो के लिए ऐसे भावुक एड तैयार किए गए हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि वाह, इन्हें कितनी फ़्रिक है महिलाओं की। वही इसके पलट सब पर शुरु हुआ नया कार्यक्रम मिसेज तेन्दुलकर मुझे बेहतर लगा। इस कार्यक्रम में एक पति अपनी पत्नी की खुशी और उसके करियर को ख़ुद से ज़्यादा अहमियत देता हैं। सब कुछ छोड़कर वो घर और बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाने की ठानता है। लोगों का ऐसी बातों पर हंसना और आश्चर्य चकित होना सामान्य है। सीरियल को शुरु हुए दो दिन हुए हैं और इसकी शुरुआत मुझे भायी है। वजह कॉन्सेप्ट से ज़्यादा हैट्स ऑफ़ प्रोडक्शन और देवेन भोजानी है। दोनों का कॉम्बीनेशन कमाल है। सब पर ही आनेवाला दूसरा हिट सीरियल तारक मेहता का उल्टा चश्मा मुझे पसंद तो हैं लेकिन, उसमें भारतीय नारी के प्रोजेक्शन से मुझे कभी कभी चिढ़ होती हैं। दया का अपने पति को टप्पू के पापा कहना मुझे हमेशा अखरता है। खैर, इसी पर आनेवाला सजन रे झूठ मत बोलो और एफ़आईआर भी मुझे पसंद है। ये चैनल एक ऐसा चैनल है जो अकेले रहनेवालों के लिए बहुत बड़ा सहारा है। आप आराम से टीवी चलाकर अपने काम कर सकते हैं। ये आपको अहसास करवाता रहता हैं कि कही कोई मेला लगा है। मिसेज तेन्दुलकर पुरुषों की दबानेवाली और महिलाओं की एजी ओजीवाली सोच को बदल पाएगा इस बात पर तो शक़ है। लेकिन, मुझे हंसाने में ये ज़रूर कामयाब होगा...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-5301727628619190547?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/5301727628619190547/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=5301727628619190547' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5301727628619190547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5301727628619190547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='मिसेज तेन्दुलकर'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-2913483340505304140</id><published>2011-01-26T02:23:00.000-08:00</published><updated>2011-01-26T02:24:30.409-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोगलापन...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>अपना इंसाफ, अपने हिसाब...</title><content type='html'>&lt;p class="MsoNormal" style="text-align:justify"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  &gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: 27px;"&gt;&lt;b&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="text-align:justify"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  &gt;&lt;b&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size:18.0pt; line-height:115%;font-family:&amp;quot;Kruti Dev 010&amp;quot;"&gt;lH; lekt esa fgalk dk dgha dksbZ LFkku ugha gS! ysfdu blh lH; lekt esa xqukgxkjksa dh Hkh dksbZ txg ugha gS! eSa ckr dj jgk gwa eaxyokj dks xkft;kckn dh fo”ks’k vnkyr esa gq, ?kVukdze dh! vk#f’k ekeys dh Dykstj fjiksVZ ij lquokbZ ds fy, tk jgs jkts”k ryokj ij tkuysok geyk gqvk! ryokj ds flj vkSj maxfy;ksa esa pksV yxh! ysfdu ftl rjg ls geyk fd;k x;k------ ;s dguk T;knk lgh gksxk fd oks cky&amp;amp;cky cp x,! irk pyk fd geykoj cukjl dk ogh mRlo “kekZ gS ftlus #fpdk fxjgks=k ls NsM+NkM+ ds nks’kh ,lih,l jkBkSM+ ij geyk fd;k Fkk! xkft;kckn esa gq, okd;s ds ckn lcds fnekx esa cl ,d gh ckr Fkh fd 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href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/2913483340505304140/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=2913483340505304140' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2913483340505304140'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2913483340505304140'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/01/blog-post_26.html' title='अपना इंसाफ, अपने हिसाब...'/><author><name>Bhuwan</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4393914345779084634</id><published>2011-01-25T01:36:00.000-08:00</published><updated>2011-01-25T23:05:13.750-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खेल खेल में'/><title type='text'>सचिन तो ध्यानचंद क्यों नहीं ?</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;मैने मेजर ध्यानचंद को कभी हॉकी खेलते नहीं देखा लेकिन मैने सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट में इतिहास रचते ज़रुर देखा है! क्रिकेट के खेल में एक के बाद एक रिकॉर्ड तोड़ते और नया कीर्तिमान रचते सचिन पूरी दुनिया के हीरो बन चुके हैं! आज का हर खेलप्रेमी युवा उनको अपना आदर्श मानता है! मैं भी सचिन की प्रतिभा का कायल हूं! मुझे आज भी वो दिन याद है जब पाकिस्तान के सईद अनवर ने मुंबई में सियाराम कप के दौरान एक सौ छियानवें रन बनाया था! उस वक्त मैं मैच नहीं देख पाया था! बिजली नहीं थी और हमने सईद की धुंआधार पारी रेडियो पर सुनी थी! तब से लेकर दो हजार दस तक मैने क्रिकेट के बारे में बस यही सपना पाला था कि अगर कोई अनवर का रिकॉर्ड तोड़े तो वो सचिन ही हो! और जब सचिन ने इसे पूरा किया और ग्वालियर के मैदान में वन डे इतिहास का दोहरा शतक ठोंका तो लगा कि जैसे सचिन ने मेरे लिए ही ये डबल सेंचुरी लगाई हो! वन डे हो या टेस्ट सचिन इज़ द बेस्ट! क्रिकेट जगत में सचिन की तुलना ऑस्ट्रेलिया के सर डॉन ब्रैडमैन से की जाती है! यहां तक की क्रिकेट के कई जानकारों ने सचिन को उनसे बेहतर भी बताया है! लगातार बीस साल से अधिक समय से क्रिकेट खेल रहे सचिन आज सर्वश्रेष्ठ मुकाम पर पहुंच चुके है! उनकी इस उपलब्धि के चलते उन्हें भारत रत्न से नवाज़ने की मांग की जा रही है! स्वर सामज्ञी लता मंगेशकर ने भी सरकार से बार-बार ये मांग दुहराई है! हो सकता है इस बार सचिन को देश का ये शिखर सम्मान दे भी दिया जाए! वो इसके हक़दार भी हैं! लेकिन क्रिकेट में देश के लिए सचिन के योगदान को बिना कम आंके हुए मेरा एक सवाल है! अगर सचिन भारत रत्न के हकदार हैं तो हॉकी के जादूगर माने जाने वाले मेजर ध्यानचंद क्यों नहीं ? भारत के राष्ट्रीय खेल को शीर्ष पर पहुंचाने वाले मेज़र ध्यानचंद को क्यों इस सम्मान के काबिल नहीं समझा जा रहा है! मैं पहले ही बता चुका हूं की मैंने ध्यानचंद का खेल नहीं देखा है लेकिन अख़बारों, टीवी और इंटरनेट पर मिली जानकारी के मुताबिक उन्हें यूं ही हॉकी का जादूगर नहीं कहा जाता था! 1928 का एम्सटर्डम समर ओलंपिक हो, 1932 का लॉस एंजिलिस हो या फिर 1936 का बर्लिन हो! सब जगह ध्यानचंद का जादू सर चढ़ कर बोला! तीनों ओलंपिक में भारतीय हॉकी का इतिहास स्वर्ण से लदा हुआ है! 1932 में तो मेजबान यूएसए को रिकॉर्ड 24-1 से हराने में में मेजर ने आठ गोल दागे थे! बताया जाता है कि एक दौर ऐसा था जब भारतीय हॉकी टीम अजेय मानी जाने लगी थी! इन तीन ओलंपिक के अलावा दूसरे टूर्नामेंटों में भी ध्यानचंद की हॉकी स्टिक ने कमाल दिखाया! कुछ लोग ये भी बताते हैं कि हिटलर ने उन्हें जर्मनी की तरफ से खेलने का न्योता दिया था लेकिन देशप्रेमी ध्यानचंद सिंह ने उसे ठुकरा दिया था! ऐसे में पद्म भूषण मेजर ध्यानचंद को किसी भी मायने में भारत रत्न के लिए कमतर नहीं माना जा सकता!&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4393914345779084634?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4393914345779084634/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4393914345779084634' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4393914345779084634'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4393914345779084634'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/01/blog-post_25.html' title='सचिन तो ध्यानचंद क्यों नहीं ?'/><author><name>Bhuwan</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-738161916277817475</id><published>2011-01-24T03:49:00.001-08:00</published><updated>2011-01-24T03:49:45.422-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फ़िल्मी चक्कर...'/><title type='text'>फ़िल्मों के इतंज़ार में...</title><content type='html'>ये साली ज़िंदगी और सात खून माफ़। दो ऐसी फ़िल्में हैं जिनका मुझे इंतज़ार है। ये साली ज़िंदगी का प्रोमो महीनेभर पहले यू ट्यूब पर देखा था। इरफान खान टीवी के ज़माने से ही मेरे पसंदीदा हैं। चित्रांगदा सिंह की अदाकारी और ख़ूबसूरती में से क्या मुझे ज़्यादा पसंद हैं ये तो मैं भी तय नहीं कर पाती हूँ। दरअसल ये दोनों ही कलाकार ऐसे हैं जिन्हें झक मार ही सही लेकिन पसंद करने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं। प्रोमो देखकर लगता है कि सुधीर मिश्रा के स्टाइल का वॉटर मार्क कही भी धुंधला नहीं हुआ होगा। ये साली ज़िंदगी.... एक ऐसा जुमला जो सभ्य से सभ्य इंसान ने एक बार ही सही अपनी ज़िंदगी में ज़रूर बोला होगा। फ़िल्म भले ही अंडरवर्ल्ड, प्यार, धोखा, सेक्स या ख़ून खराबे से भरी हुई हो लेकिन, ये तीन शब्द हरेक ने कमसेकम एक बार तो महसूस किए ही होगें। हालांकि ऐसी फ़िल्में मेरी पसंदीदा जॉनर्स में से एक में शामिल नहीं हैं फिर भी सुधीर मिश्रा, इरफान खान, चित्रागंदा और सौरभ शुक्ला के लिए इसका इंतज़ार हैं।&lt;br /&gt;   वहीं, सात ख़ून माफ़ का प्रोमो जब पहली बार देखा तो लगा कि इसकी कहानी बस लिखने के लिए लिखी गई कहानी हैं। मतलब कि, कुछ अलग बनाना हैं तो कुछ भी अलग भलता ही सही लिख दो। लेकिन, विशाल भारद्वाज की वजह से मन ही मन लग रहा था कि कुछ तो हैं। सो, आज मालूम चलाकि कहानी रस्किन बॉण्ड की है। मेरे कान खड़े हो गए। लगाकि ओह, तो ये बात हैं। विशाल भारद्वाज और शेक्सपियर का कॉम्बिनेशन तो देख लिया अब रस्किन बॉण्ड और विशाल भारद्वाज की जुगल बंदी देखने का मन हो गया। सुसान्नास् सेवन हसबैण्डस् के शीर्षकवाली इस कहानी के बारे में केवल इतना मालूम चला कि बीस साल से पैंसठ साल तक की उम्र के बीच इस महिला की हुई सात शादियों का तानाबाना है इसमें। फ़िल्म में मौजूद कलाकारों से उम्मीद कम और निर्देशन से उम्मीदें ज़्यादा हैं। फ़िल्म देखना हैं लेकिन, पहले कहानी को पढ़ने का मन हैं। फ़िल्म देखकर आज तक जितनी भी कहानियाँ और नाटक पढ़े हैं कभी वो मज़ा नहीं आया जो फ़िल्म देखते समय आया। इस बार कहानी पढ़कर फ़िल्म देखना चाहती हूँ। उम्मीद है, कर पाऊंगी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-738161916277817475?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/738161916277817475/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=738161916277817475' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/738161916277817475'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/738161916277817475'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/01/blog-post_24.html' title='फ़िल्मों के इतंज़ार में...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-3245022358065203605</id><published>2011-01-19T03:17:00.001-08:00</published><updated>2011-01-19T03:17:45.126-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फ़िल्मी चक्कर...'/><title type='text'>जेसिका, सबरीना या मैं...</title><content type='html'>नो वन किल्ड जेसिका देखी। फ़िल्म अच्छी थी लेकिन, देखते वक़्त उत्साह की कमी रही। केस के बारे में सब कुछ मालूम था और फ़िल्म का अंत फ़िल्म शुरु होने के पहले से मालूम था। विद्या बालन, रानी मुकर्जी, मायरा सभी की एक्टिंग बढ़िया रही। रानी मुकर्जी के किरदार से एक पत्रकार होते हुए भी रिलेट नहीं कर पाई। महिला टीवी पत्रकार को जिस ढर्रे पर हमेशा हर फ़िल्म में बताया जाता हैं वैसी शायद पांच प्रतिशत ही होती हैं। मैं उन पांच प्रतिशत में नहीं हूँ, शायद इसलिए भी मज़ा नहीं आया। खैर, फ़िल्म में जो मुझे ख़ास लगा वो था सबरीना का संघर्ष। सबरीना को मैं जेसिका की बहन के रुप में ही जानती हूँ, जैसे कि सब जानते हैं। ऐसे में फ़िल्म में दिखाई दी सबरीना अगर असल से दस फ़ीसदी भी मिलती जुलती है तो सच में उसका संघर्ष दिल दहला देनेवाला है। पूरी फ़िल्म में मुझे यही लगता रहा कि जेसिका या सबरीना की जगह मैं या मेरी दोस्त या बहन भी हो सकती थी या हो सकती हैं। ऐसे में इस समाज में रहना और सच और इंसाफ के लिए लड़ना कितना मुश्किल हैं। सच कहूँ तो मुझे इस फ़िल्म को देखकर डर लगा। जो डर पिछले पाँच साल से इस महानगर में रहते और काम करते हुए नहीं लगा। हर क़दम, हर मोड़ पर आपको शातिर होना ज़रूरी हैं। हार ना मानने से ज़्यादा ज़रूरी वही है। फ़िल्म में भी यही दिखा। सबरीना ने हार नहीं मानी लेकिन, उससे कुछ नहीं हुआ। मीडिया के शातिरपन ने ही अपराधियों को पकड़वाया और इंसाफ दिलवाया। सच कहूँ तो फ़िल्म के अंत में मेरे कई बार आंसू बहे। ये आंसू फ़िल्म की कहानी या कलाकारों की एक्टिंग के लिए न होकर उस डर के थे जो बार-बार मुझे ये सोचने पर मजबूर कर रहे थे कि सबरीना या जेसिका की जगह मैं भी हो सकती थी या हो सकती हूँ। मैं फ़िल्म देखकर भी फ़िल्म की समीक्षा नहीं कर सकती हूँ। क्योंकि फ़िल्म को मैं फ़िल्म के नज़रिए से देख ही नहीं पाई। अंत में बस इतना कि सबरीना वाकई हिम्मती हैं और उन्होंने जो किया सबके बस की बात नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-3245022358065203605?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/3245022358065203605/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=3245022358065203605' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3245022358065203605'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3245022358065203605'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/01/blog-post_19.html' title='जेसिका, सबरीना या मैं...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-8377409859109190857</id><published>2011-01-12T01:10:00.001-08:00</published><updated>2011-01-12T01:34:51.570-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>माँ से मायका...</title><content type='html'>आई के बारे में मेरा एक बहुत बड़ा भ्रम आज टूट गया। अपनी 78 साल की लंबी ज़िंदगी में लगातार बीमारियों से लड़नेवाली मेरी आई को देखकर मुझे हमेशा यही अहसास होता था कि उनमें जीवन को जीने की ललक बाकियों से कहीं ज़्यादा हैं। ना जाने कितने ऑपरेशनों से गुज़र चुकी मेरी आई हमेशा खुश रहती। समय पर दवाई खाती, डॉक्टर के पास जाती और अपनी हरेक छोटी से छोटी परेशानी को गंभीरता से लेती। इतना ही नहीं अपनी इन बीमारियों के लिए लोगों को भी गंभीर बनाए रखती। मैंने अपनी इस 27 साल की ज़िंदगी में उनसे ज़्यादा ख़ूबसूरत महिला नहीं देखी। एकदम बेदाग गोरे चेहरे पर कुमकुम की बड़ी-सी लाल बिन्दी और उल्टी गूंथी चोटी। हमेशा कॉटन की साड़ी में लिपटी मेरी आई को देखकर हमेशा मैं यही कहती थी कि जवानी में तो कहर ही बरपाती होगी। मेरी आई हमेशा मुस्कुरा कर रह जाती। मेरी आई मेरे दादा की चिंता भी करती और उन्हें ताने भी सुनाती रहती। मेरे पापा की माने तो उनकी सभी बेटियों ने उनके इस गुण को आत्मसात् किया है। हरेक गलती के लिए तुम्हारे दादा ही ज़िम्मेदार हैं। आई अपने उसूलों की पक्की थी। हद से ज़्यादा प्यार करनेवाली मेरी आई महीने के उन पाँच दिनों में जल्लाद बन जाती थी। किसी को नहीं छोड़ती। ऐसे में तो देवास जाने में ही जान सूख जाती थी मेरी। मेरी मम्मी मेरी आई की फोटो कॉपी है हर मामले में। भयानक रूप से डायिबटीज़ से पीड़ित मेरी आई को हमेशा याद रहता था कि कौन सी मिठाई घर में बची हुई और कहाँ रखी हुई हैं। उनकी एक बात जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद थी वो थी उनका चीज़ों, लोगों और परिस्थितियों को स्वीकार कर लेना। वो बहुत ही आसानी से ढल जाती थी। समय के साथ चलना वो जानती थी। मुझे लगता था कि यही वो वजह है जो आई को ज़िंदा रखे हुए हैं। लेकिन, मैं ग़लत थी। आई को दादा ने ज़िंदा रखा था। दादा के जाने के चार दिन बाद ही आई भी चली गई। चार दिन भी इसलिए क्योंकि शुरुआती तीन दिनों तक तो वो समझ ही नहीं पाई कि दादा चले गए हैं। आईसीयू में ऑक्सीजन मास्क लगाए पड़ी आई को बस यही लगता कि दादा घर पर हैं। बार बार पूछती कि दादा ने रोटी खाई कि नहीं या वो मुझे देखने आए थे क्या। वो शायद ज़िंदा ही दादा के दम पर थी। वो जीना ही चाहती थी दादा के लिए। दादा अंतिम समय में चाहते थे कि वो आई को मरते देखे। वो नहीं चाहते थे कि आई कष्ट अकेले भुगते। लेकिन, वो ये नहीं जानते थे कि वो ही थे जिनमें आई की जान बसती थी। आई-दादा जीवनभर साथ रहे और आज भी साथ ही हैं। आखिर में बस मम्मी कि एक बात याद आती हैं जो वो हमेशा बोलती रहती थी - माँ से ही मायका है। जिस दिन वो गई मायका गया। आज मुझे भी यही महसूस हो रहा है कि देवास मेरा ननिहाल मेरी आई यानि कि मेरी नानी से ही था...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-8377409859109190857?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/8377409859109190857/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=8377409859109190857' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8377409859109190857'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8377409859109190857'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/01/blog-post_12.html' title='माँ से मायका...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-2322392107270573100</id><published>2011-01-10T03:50:00.000-08:00</published><updated>2011-01-10T03:51:21.965-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>इस्तीफ़ा...</title><content type='html'>ज़िन्दगी के चार दशक परिवार के मुखिया के पद पर बिताकर अंततः उन्होंने इस्तीफा दे दिया। अपने दो सौ साल पुराने घर में 83 साल तक रहनेवाले उस वृद्ध ने अपनी हरेक ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाया। बचपन में ही पिता की मौत के बाद अपनी माँ के साथ मिलकर उन्होंने अपने सात भाई बहनों की पढ़ाई से लेकर शादी तक की ज़िम्मेदारी निभाई। अपने दादाजी को भी सालों तक संभाला। अपनी नौकरी में मिले हेडमास्टर के पद को पूरी ज़िम्मेदारी से निभाया। इन ज़िम्मेदारियों को निभाने में उनकी पत्नी ने उनका पूरा साथ दिया। ये बात अलग है कि मानसिक रूप से उनकी सहभागी उनकी पत्नी जीवनभर शारिरीक रूप से बीमार ही रही। अंतिम समय में भी संयोग कुछ ऐसा बना कि आईसीयू में भर्ती अपनी पत्नी के साथवाले बिस्तर पर आकर लेटने के बाद ही उन्होंने प्राण त्यागे। ये पति-पत्नी का जोड़ा मेरे मन में ऐसा था जो कभी बिछड़ नहीं सकता था। जो कभी मर नहीं सकता था। सच में, मैं हमेशा यही सोचती थी कि आई-दादा को कभी कुछ नहीं होगा। खैर, वो चले गए। अपने पीछे पाँच बेटियों और एक बेटे को उनके भरे-पूरे परिवार के साथ। उन्होंने न सिर्फ़ अपने नाती- नातिनों और पोते-पोतियों को बढ़ते देखा बल्कि उनकी शादियाँ और उनके बच्चों को स्कूल कॉलेज जाते भी देखा। हेडमास्टर की कमाई में पाँच बेटियों की शादी की। अमीर तो नहीं लेकिन, सुयोग्य वर उनके लिए खोजे। पैसे से ज़्यादा प्राथमिकता व्यवहार और स्वभाव को दी। उनके ही एक दामाद को पूरे खानदान ने इसलिए पसंद किया क्योंकि वो इनकम टेक्स में नौकरी करता था। लेकिन, शादी से पहले उसके नौकरी छोड़ देने और एक पीआरओ की नौकरी करने पर भी वो विचलित नहीं हुए। उन्हें दामाद की ईमानदारी दिखी कि उसने नौकरी छोड़ने की बात को छुपाया नहीं। हाँ वो कई बार समाज के आगे झुके भी। कई बार समाज के दबाव में आकर बच्चों की मर्ज़ी के खिलाफ फैसले भी लिए जोकि उनके बच्चों ने माने भी। शायद ऐसे में नई पीढ़ी की मन मर्ज़ी ने उन्हें बहुत दुखी कर दिया। हमेशा मुखिया होने के ताने फैसले करने और उन्हें सुनानेवाले को ये बर्दाश्त नहीं हुआ कि कोई उनके आगे बोले या उनकी बात ना माने। यही वजह है कि अपने अंतिम दिनों में वे बहुत दुखी रहने लगे थे। मन ही मन किसी शोक में घुलने लगे थे। वही जीवनभर बीमार रही उनकी पत्नी शरीर से भले ही कमज़ोर हो लेकिन मन की पक्की निकली। आज सोचती हूँ तो लगता है कि अगर ऐसा ना होता तो इतनी बीमारी के साथ कोई जी ही नहीं सकता हैं। दादा जहाँ मन के विपरीत होनेवाले हरेक परिवर्तन से विचलित और परेशान रहने लगे, वही आई उस हरेक परिवर्तन के साथ खुद को भी बदलती गई। जो जैसा मिला उसमें खुश होती गई। पिछले तीन साल से मैं आई और दादा को आसपास बिस्तर डाले बीमार एक दूसरे को ताकते हुए देख रही थी। हर सांस पर दादा को इस बात की चिन्ता सताती की साथवाले बिस्तर पर पड़ी उनकी पत्नी तो ठीक है ना। कुछ दिनों से उन्होंने आई (उनकी पत्नी) के मरने के लिए दुआएं मांगनी शुरु कर दी। वो नहीं चाहते थे कि वो उन्हें यूँ ही बीमार छोड़ अकेले चले जाए। मैंने उन्हें जब भी देखा एक रिटायर हेडमास्टर की ठसक के साथ देखा। मेरे जीवन के वो एकमात्र इंसान जिन्हें मैंने लंगोट बांधते देखा हैं। हमेशा सफारी में रोज़ माता की टेकरी चलकर जाते। एक दम फीट। किसी तरह की कोई बीमारी नहीं कोई परेशानी नहीं। शायद नई पीढ़ी की मनमर्ज़ी और अपनी ज़िंदगी को अपने हिसाब से जीने की जिद के आगे वो झुक नहीं पाए। अपने छोटे भाई-बहनों से लेकर अपने बच्चों तक किसी के मुंह से जिसने अपने लिए ऊंची आवाज़ नहीं सुनी वो अंदर ही अंदर घुटने लगे थे। दादा के जाने की ख़बर सुनकर मैं भी रोई। जब मालूम चलाकि उनकी अंतिम यात्रा में इतने लोग उमड़े थे कि मोहल्ले में पैर रखने की जगह नहीं थी तो मन ही मन गर्व भी महसूस हुआ। दादा के जाने का दुख तब सबसे ज़्यादा होता है जब मैं आई के बारे में सोचती हूँ। ऑक्सीजन मास्क पहने बिस्तर पर पड़ी दुनिया की सबसे सुन्दर मेरी आई कभी दादा की याद में रोती हैं तो कभी सब कुछ भूलकर दादा के रोटी खाने की चिंता करने लगती है। कभी दादा से गुस्सा हो जाती हैं कि मुझसे मिलने क्यों नहीं आए। अब ऐसा लगता है कि दादा को आना चाहिए और आई को ले जाना चाहिए। मैं हमेशा से ही आई की इस बात की कायल रही हूँ कि उनमें जीवन को जीने की ललक सामान्य से ज़्यादा है। लेकिन, अब लगता है कि आई तो तब तक ही आई थी जब तक दादा थे। मेरे दादा ने अपना जीवन पूरा जिया। एक आत्मसम्मान और ठसक के साथ जिया। लेख का अंत कैसे करूँ मुझे समझ नहीं आ रहा है। बस इतना ही कहूंगी कि मेरे दादा यानी कि नानाजी दयाशंकर रामनारायण शुक्ल ने अपनी ज़िंदगी अपने मुताबिक़ जी और जब लगा कि अब उन्हें नहीं जीना वो चले गए। और, अब मैं बस इतना चाहती हूँ कि मेरी आई यानि कि मेरी नानीजी श्रीमती अन्नपूर्णा दयाशंकर शुक्ला को हम उनके दादा के बिना भी संभाल पाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-2322392107270573100?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/2322392107270573100/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=2322392107270573100' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2322392107270573100'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2322392107270573100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/01/blog-post_10.html' title='इस्तीफ़ा...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-3799717078738642557</id><published>2011-01-03T04:21:00.000-08:00</published><updated>2011-01-03T04:24:00.196-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंटरनेट के झरोखे से...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फ़िल्मी चक्कर...'/><title type='text'>सिनेमा को समझनेवालों के लिए...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/TSG_dImB4KI/AAAAAAAAAWk/shsrWlfOr3M/s1600/untitled.bmp"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 142px; FLOAT: left; HEIGHT: 196px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5557933922396004514" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/TSG_dImB4KI/AAAAAAAAAWk/shsrWlfOr3M/s200/untitled.bmp" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन पहले ही मैंने नेट पर उर्फ़ प्रोफेसर देखी। पंकज आडवाणी की निर्देशित ये फिल्म सिनेमा घरों तक नहीं पहुंच पाई है। आडवाणी ने इस फिल्म की एडिटिंग भी की हैं। यूं ही नेट की सैर के दौरान मैंने इस फ़िल्म के बारे पढ़ा। फिर पढ़ा कि पंकज आडवाणी जाने भी दो यारो में कुंदन शाह के सह-लेखक रह चुके हैं और संकट सिटी भी पंकज की ही फ़िल्म थी। साथ ही ये भी पता चला कि मात्र 45 साल की उम्र में उनकी हार्ट अटैक से मौत भी हो गई। उर्फ प्रोफेसर के बारे में जिसने भी लिखा बहुत तारीफ की और उसे हिन्दी सिनेमा में अब तक की बनी हास्य फिल्मों में श्रेष्ठ तीन में शामिल किया। सो, इंटरनेट पर ही मैंने इस फिल्म को खोजना शुरु किया। और, एक दिन देख भी डाली। मैं इस लेख के ज़रिए फिल्म की समीक्षा नहीं कर रही हूँ। क्योंकि मुझे समीक्षा लिखना आता नहीं है। खैर, मैं केवल ये बताना चाह रही हूँ कि एक फिल्म है जिसका नाम उर्फ प्रोफेसर है और उसे हरेक उस इंसान को देखना चाहिए जोकि सिनेमा देखने और उसे समझने में दिलचस्पी रखता हैं। उर्फ प्रोफेसर बहुत ही कम लागत में बनी, एवरेज कैमरा एंगल और कुछ बेहतरीन लेकिन, कम बजटवाले कलाकारों की फिल्म है। इस फिल्म में अगर कुछ हैं तो वो है इसकी कहानी और उस कहानी को पर्दे पर उतारने का तरीक़ा। फिल्म में किसी को मारते या गाली देते या शारिरीक संबंध बनाते हुए ऐसे दिखाया गया है जैसे कि सामान्यतः आप और हम सांस लेते हैं। पूरी फिल्म में केवल एक किरदार ऐसा है जिसे किसी के भी मरने का दुख होता हैं। बाक़ियों के लिए किसी को मारना या मरते देखना ऐसा है जैसे मूंगफली छीलकर खाना। फिल्म आपको पूरे समय बांधे रखती हैं। मैं फिर ये कहना चाहती हूँ ये समीक्षा नहीं हैं बस इतना कहना है कि आप अगर सिनेमा को प्यार करते हैं और समझते हैं तो इसे ज़रूर देखे। इसे देखे बिना आपकी वो समझ पूरी नहीं होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-3799717078738642557?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/3799717078738642557/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=3799717078738642557' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3799717078738642557'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3799717078738642557'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='सिनेमा को समझनेवालों के लिए...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/TSG_dImB4KI/AAAAAAAAAWk/shsrWlfOr3M/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-7429127334022875799</id><published>2010-10-22T04:31:00.000-07:00</published><updated>2010-10-22T04:32:29.213-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>रिश्वत देना और लेना एक कला है !</title><content type='html'>भगवान की पूजा नहाने के बाद ही की जाती है। मंदिर में जाने से पहले अपने जूते-चप्पल बाहर उतारे जाते हैं। रात में सोने से पहले भगवान का नाम लेना चाहिए। या फिर रात को दही नहीं खाना चाहिए। ये कुछ ऐसी बातें हैं जो कि मैं पूरी तरह से निभाती हूँ। भले ही मैं इसे करने की वजहों के बारे में कुछ ना जानती हूँ। दरअसल मैंने कभी ये जानना ही नहीं चाहा कि हम ऐसा क्यों करते हैं। शायद यही हालत दुखुराम की भी होगी या फिर कहा जाए कि मुझसे भी बुरी होगी। क्योंकि अपनी ऐसी सोच और आदतों में ही उसने ये भी जोड़ रखा है कि कोई भी काम बिना रिश्वत दिए बिना नहीं होता हैं। दुखुराम छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले का रहनेवाला है। और, एक ख़बर के मुताबिक़ उसने भरी अदालत में जज को तीन सौ रूपए की रिश्वत देकर केस का फैसला जल्दी करने को कहा। दुखुराम की इस हरकत के चलते अदालत में मौजूद सभी लोग सकते में आ गए और जज ने उसे रिश्वत देने के जुर्म में जेल की सज़ा सुनाई। बाद में ये मालूम चला उस भोले से गांववाले को उसके साथियों ने समझाईश दी थी कि, बिना रिश्वत के कोई काम नहीं होता है। इसी के चलते दुखुराम ने दुखी होते हुए अपने कुल जमा जेब के पैसे जज साहब के सामने रख दिए। छह साल से सम्पत्ति के मामले में उलझे हुए दुखुराम की ये छोटी सी हरकत हमारे देश के भ्रष्ट तंत्र को दर्शाती है। जहां हमने रिश्वत देने और लेने को कुछ इस तरह से अपनी ज़िंदगी में समाहित कर लिया है जैसे कि सांस लेते हैं। दुखुराम ने बढ़े ही अफसोस के साथ ये कहा कि पैसे देने पर भी हमारा काम नहीं हुआ। दरअसल दुखुराम ये तो समझ गया कि पैसे के बिना फैसला नहीं आया है लेकिन, वो ये नहीं समझ पाया कि पैसे दिए कैसे जाते है। रिश्वत देना ही केवल काम को करवाने के लिए काफी नहीं है। असल में रिश्वत देना और लेना दोनों ही एक कला है। एक ऐसी कला जिसे सालों की मेहनत से तराशा जाता हैं। साथ ही ये एक ऐसा गुण भी है जो कि आपके खून में होना ज़रूरी हैं। बहुत आश्चर्य की बात है कि ये कला और इससे जुड़े कलाकार हमारे बीच में मौजूद हैं लेकिन, फिर भी इसे व्यवस्थित रूप से सिखाने के लिए कोई संस्था नहीं हैं। ये एक ऐसी कला है जो कि फिलहाल घराना पंरपंरा के अनुसार चल रही है। बाप से बेटे को और सीनियर से जूनियर को। लेकिन, ऐसे में इसे ना समझनेवाले दुखुराम जैसे लोग पिस जाते हैं। जोकि रिश्वत कला के बारे में अपनी अधकचरी जानकारी के चलते पैसा भी गंवा देते हैं और ऊपर से सज़ा भी भुगतते हैं। अब ज़रूरत है कि रिश्वत की कला की बारीकियों को आम जनता को भी सिखाया जाए...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-7429127334022875799?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/7429127334022875799/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=7429127334022875799' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7429127334022875799'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7429127334022875799'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/10/blog-post_22.html' title='रिश्वत देना और लेना एक कला है !'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-1638880479713447120</id><published>2010-10-20T06:15:00.000-07:00</published><updated>2010-10-20T06:16:19.660-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><title type='text'>सूरज की रौशनी</title><content type='html'>सूरज की रौशनी क्या क्या कमाल कर सकती है, ये शायद अब तक हमने पूरी तरह जाना नहीं है। या फिर ये कहे कि हम लोग धीरे धीरे ये जानने की कोशिशों में लगे हुए हैं। बचपन में सोलर कुकर को स्कूल में प्रोजेक्ट के लिए थर्माकॉल से बनाया करती थी। लेकिन, इसका बहुत व्यवहारिक इस्तेमाल कभी नहीं देखा। कई बार सुना कि मल्टीस्टोरी फ्लैटवाली कॉलोनियों में आजकल सोलर पैनल लगने लगे हैं पानी गर्म करने के लिए। व्यवहारिक रूप से इसका भी इस्तेमाल नहीं देखा। कई लोगों के मुंह से ये सुना ज़रूर कि ये बहुत व्यवहारिक और काम को कम करनेवाली ऊर्जा नहीं हैं। शायद हम सूरज की रौशनी से बचने के इतने आदी हो गए हैं कि बस काले शीशों में एसी ऑन करके सूरज को केवल एक विलेन की तरह देखते रहते हैं। लेकिन, ये आग उगलता हमसबों की ज़िंदगी का विलेन कुछ लोगों की ज़िंदगी बढ़ाने के काम में लगा हुआ है। सीएसआईआर (काउन्सिल ऑफ़ साइन्टिफ़िक एण्ड इन्ड्रस्टियल रिसर्च) ने सोलेक्शा ईजाद किया। सोलेक्शा यानी कि सोलर रिक्शा। रिक्शा वही जो हमें अपने घर से बस स्टॉप या फिर पासवाले मार्केट से घर तक लाता हैं। ऊपर नीचे, उबड़-खाबड़ रास्तों के साथ साथ ट्रेफ़िक और लाल हरी बत्तियों के बीच से हमें सही समय पर सही जगह पहुंचाता हैं। रिक्शा वही जिसे चलानेवाले को हम अपने से कमतर समझते हैं और उससे एक एक रुपए के लिए हुज्जत करते हैं। उसी रिक्शे को सीएसआईआर ने सौर ऊर्जा से संचालित करने की पहल की हैं। वो ऐसे रिक्शे बना रहा है जो कि बैट्री से चलते हो और वो बैट्री सूरज से चार्ज होती हो। सीएसआईआर का मक़सद पूरी तरह से रिक्शाचालकों की मेहनत को आधा करना और कमाई को दोगुना करना हैं। इस रिक्शे में पैडल मारने की कोई ज़रूरत नहीं, हालांकि पैडल है ज़रूर। जोकि बैट्री के डिस्चार्ज होने पर काम आते हैं। एक शोध के मुताबिक़ टीबी के मरीज़ों में सबसे ज़्यादा रिक्शाचालक होते हैं। सरकारी अस्पतालों में इसकी दवाई मुफ्त होने पर भी ये उनके लिए फायदेमंद नहीं हैं। क्योंकि इन दवाइयों के साथ जिस तरह के खाने की ज़रूरत हैं वो उन्हें नहीं मिल पाता हैं। ऐसे में अधिकतर ये दवा खोना शुरु तो करते हैं लेकिन, बीच में ही छोड़ देते हैं। पूरे दिन रिक्शा खींचने के लिए उन लोगों का सहारा बनता है तंबाखू। ऐसे में उन्हें बेहतर खाना और माहौल देना संभव नहीं लगता है। तो क्यों न उनकी मेहनत को ही कम कर दिया जाए। यही वजह है कि इन रिक्शों को बनाया गया। ये रिक्शे बिना पैडल मारे चलते हैं। इनमें सवारी के साथ रिक्शा चालक भी धूप और पानी से एक छत के ज़रिए बच जाता हैं। रिक्शे में इन्डीकेटर से लेकर हॉर्न तक सब कुछ हैं। ये है आज के रिक्शे। इसे चलानेवाले एक रिक्शाचालक ने हमें बताया कि वो पहले सामान्य रिक्शों चलाता था। लेकिन, जब से इसे चलाना शुरु कर दिया वो अब उसे नहीं चला पाता है। ये रिक्शा न सिर्फ़ सवारी को शान की सवारी देता हैं बल्कि ये हमारे समाज के उस तबके के बारे में सोचता है जो ज़िंदा भी ये ना नहीं इसकी किसी को फ़िक्र नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-1638880479713447120?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/1638880479713447120/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=1638880479713447120' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/1638880479713447120'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/1638880479713447120'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/10/blog-post_20.html' title='सूरज की रौशनी'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-7842058478776652269</id><published>2010-10-04T00:52:00.001-07:00</published><updated>2010-10-04T00:52:54.592-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैट्रो का सफर...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>लेडीज़ ओनली...</title><content type='html'>सुरक्षा की भावना इंसान में एक अलग तरह की ऊर्जा का संचार कर देती है। आज़ादी के सही मायने शायद तब ही समझ में आते है जब हमें उस आज़ादी में इस बात की ग्यारंटी मिल जाए कि हम सुरक्षित हैं। आज सुबह जब रूम से ऑफिस जाने के लिए निकली तो मैट्रो की भीड़ और परेशानी से मन परेशान नहीं था। दो अक्टूबर से दिल्ली मैट्रो में पूरी एक बोगी महिलाओं के आरक्षित की गई हैं। फिलहाल ये ट्रायल है। महिलाओं की बोगी में पुरुष न चढ़ पाए इसके पूरे इंतज़ाम भी है। बोगी में भीड़ इतनी ही थी जिसमें आप आसानी से खड़े हो सकें। अगर भीड़ बढ़ी भी तो इस बात को लेकर मैं निश्चिंत हूं कि इस भीड़ में भी मुझे जो धक्का लग रहा है वो जानबूझकर मारा गया या फिर कोई भीड़ में मजे लेने के लिए मेरे पास नहीं खड़ा हुआ हैं। हालांकि, मैट्रो में ये भीड़ कुछेक समय पहले सी ही बढ़ी हैं। और आज तक मैट्रो में इस तरह की घटना की कोई ख़बर भी नहीं आई हैं। फिर भी मैट्रो की ओर से भीड़ में महिलाओं को सुरक्षित करने के लिए शुरु की गई ये पहल स्वागत योग्य है। इस अलग बोगी के होने से केवल मेरे लिए भीड़ का डर तो खत्म हुआ ही है लेकिन, जो सबसे बड़ी बात है वो है सुरक्षा की भावना। सोचिए कैसी विडम्बना है कि जिस समाज में हम महिला पुरुष मिलकर रहते हैं उसी समाज में हम पुरुषों से अलग होकर सुरक्षित महसूस करती हैं। हमारे घर में, ऑफिस में, स्कूल में, कॉलेज में हर जगह पुरुष मौजूद हैं। हम उनके साथ पढ़ते हैं, काम करते हैं, जीवन के दुख से लेकर खुशी तक के लम्हों को साझा करते हैं। फिर भी हम उन्हीं के बीच कई बार असुरक्षित महसूस करते हैं। उम्मीद है कि हमारी आनेवाली पीढ़ी में महिलाओं के लिए कही से अलग कोई बोगी न हो। आनेवाली पीढ़ी की शिक्षा ही ऐसी हो कि पुरुष महिला को और महिला पुरुष को हौव्वा न समझकर अपना साथी समझे। उम्मीद है, आनेवाले समय में महिलाओं के लिए अलग बोगी न हो, एक ही साझा बोगी में महिलाएं सुरक्षित महसूस करें...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-7842058478776652269?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/7842058478776652269/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=7842058478776652269' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7842058478776652269'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7842058478776652269'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='लेडीज़ ओनली...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4676138655959049725</id><published>2010-09-23T04:27:00.000-07:00</published><updated>2010-09-23T04:28:23.664-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीवी की कहानी दर्शक की ज़ुबानी...'/><title type='text'>टीवी डराता है...</title><content type='html'>टीवी कल तक सिर में दर्द पैदा करता था। लेकिन, अब वो डराने लगा है। यहां डर भूत-प्रेत का नहीं हैं या फिर किसी भयावह परिस्थिति का नहीं है। यहां डर सामाजिक है। कल एक नया सीरियल देखा। एक बौनी लड़की की परेशानियों से जुड़ा हुआ। वैसे तो लड़कियों को कई तरह की परेशानियां होती हैं लेकिन, टीवी की लड़कियों को केवल शादी की। जब तक कुंवारी है शादी होने की और जब हो जाएं तो घर और पति को खुश रखने की। किसी भी मुद्दे पर आप सीरियल को शुरु किजिए उसका अंतहीन कॉन्सेप्ट ले दे के लड़की की शादी और परिवार पर ही आकर रुक जाएगा। खैर, इस सीरियल में तो पहले ही एपिसोड से मुद्दा लड़की के लिए लड़का ढ़ूंढना है। एक सीरियल में लड़की का चेहरा जला हुआ है सो उसकी शादी में समस्या, एक में वो देवी का रूप है सो शादी की समस्या, एक में कही किसी जगह कोई सफेद दाग है सो शादी की समस्या। लड़कियां अलग-अलग, परेशानियां अलग-अलग, पृष्ठभूमि अलग-अलग, लेकिन समस्या एक ही - शादी। लड़कियों की हरेक समस्या का समाधान जैसे कि शादी में ही छिपा हुआ हैं। इनमें से किसी भी सीरियल में ये नहीं दिखाया जाता है कि लड़की करियर बनाना चाहती है या फिर अपनी ज़िंदगी अपने मुताबिक़ जीना चाहती हैं। यहां तो लड़की के बीस या इक्कीस के होते ही माँ बाप की रातों की नींद उड़ जाती हैं। लड़की में कोई कमी हो तो और भी ज़्यादा। मुझे तो कई बार अपने ही मम्मी पापा से पूछने का मन होता है कि- आपकी बेटी तो टीवी के मुताबिक़ बहुत बड़ी हो गई है और आप है कि आराम से सोते हैं। खैर, टीवी पर कुछेक सीरियल बीच में आते हैं जोकि इस डकियानूसी लीग से हटकर होते हैं। लेकिन, वो जल्द ही या तो बंद हो जाते हैं या फिर अपना ट्रैक बदल लेते हैं। सुन्दरता को अभिशाप के रुप में पेश करनेवाले एक सीरियल का यही हाल होते मैं देख रही हूँ। सच कहूँ तो हरेक सीरियल देखकर मैं रोज़ाना किसी न किसी बात पर डर जाती हूँ। कभी अपनी लंबाई नापने लगती हूँ, तो कभी आंखें चैक करती हूँ, तो कभी कुछ और। हालांकि एक सीरियल में लड़के की कमजोरी को भी दिखाया जा रहा है लेकिन, उस कमज़ोरी के चलते न उसको और न ही उसके घरवालों को परेशान या फिर लड़की के माता-पिता की तरह झुकते हुए दिखाया गया हैं। उसके पलट वहाँ भी एक दूसरी कमज़ोरी से जूझ रही लड़की को ही लोगों के तानों और परेशानी का शिकार बताया गया हैं। सच में टीवी के ये सीरियल और उसमें नज़र आनेवाली लड़कियाँ और उनके माता-पिता मुझमें एक डर पैदा करने लगे है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4676138655959049725?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4676138655959049725/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4676138655959049725' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4676138655959049725'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4676138655959049725'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/09/blog-post_23.html' title='टीवी डराता है...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4374986547260504121</id><published>2010-09-22T05:04:00.000-07:00</published><updated>2010-09-22T05:05:35.311-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैट्रो का सफर...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>कृप्या यहां न थूके...</title><content type='html'>मैं राजीव चौक मैट्रो स्टेशन पर ट्रेन के इंतज़ार में खड़ी हुई थी। मेरी साथवाली लाइन में एक अंकल खड़े हुए थे। उन्होंने एक बार इधर देखा फिर उधर देखा। जेब से गुटखे का पाऊच निकाला और धीरे से उसे फाड़ा। मुंह में गुटखा डाला और धीरे से खाली पाऊच वही फेंक दिया। इसके बाद नासमझी का कुछ ऐसा अभिनय शुरु किया कि अच्छे-अच्छे अनके सामने पानी भरे। मैं उनके पास गई उस पाऊच को उठाया और उन अंकल से मैंने कहा कि आपकी ओर से मैं इसे कचरे के डिब्बे में फेंक दूंगी। उन्होंने कुछ नहीं कहा। मैंने भी उसे जेब में रख लिया और वापस लाइन में लग गई। मेरा ऐसा करना कोई नई बात नहीं है। लेकिन, बस मुझे खुद पर अफसोस हुआ कि मैं क्यों मैट्रो को सभ्यता से जोड़कर देखने लगी थी। मैं ये सोचती थी कि इस तरह की विश्वस्तरीय सवारी में लोग उसकी और अपनी इज़्ज़त के लिए ही सही इसे साफ रखेंगे। मैट्रो में दिन रात सफाई करते कर्मचारियों को देखकर ही सही लेकिन, कचरा नहीं फैलाएगे। लेकिन मैं ग़लत थी...&lt;br /&gt;मेरी मम्मी से अगर मुझे कुछ विरासत में मिला है तो वो है सफाई करने की आदत। मेरी मम्मी हद से ज़्यादा सफाई पसंद है। हमेशा उन्हें घर की सफाई की चिंता रहती हैं। बिना किसी और बात या सेहत की चिंता किए वो साफ सफाई में जुटी रहती हैं। मैं भी ऐसी हूँ ये बात मुझे तब समझ में आई जब मैं उनसे अलग होकर रहने लगी। दिल्ली में अकेली रहने के बाद मुझे ये समझ में आया कि मैं तो सफाई के बारे में सामान्य से ज़्यादा सोचती हूँ। खैर, मैं मम्मी जैसी होते हुए भी कुछ अलग हूँ। मेरी मम्मी घर की सफाई के लिए चिंतित ज़रूर रहती हैं लेकिन, घर के बाहर खासकर सार्वजनिक स्थलों की सफाई को लेकर उन्हें कोई चिंता नहीं हैं। वो कचरा नहीं फैलाती लेकिन, दूसरों के फैलाने पर उनसे लड़ती भी नहीं हैं। मैं इस मामले में कुछ संवेदनशील हूँ। जब भी किसी को ऐसी जगहों पर कचरा फैलाते देखती हूँ तो कुछ न कुछ बोल ही देती हूँ। अगर बोलने की परिस्थिति न हो तो मन मसोसकर रह जाती हूँ। नहीं तो वही करती हूँ जिसका मैंने शुरुआत में ज़िक्र किया। मेरे कई दोस्त मुझे चलता फिरता कचरे का डिब्बा बोलते है। मैं हमेशा से ही इस्तेमाल के बाद कचरे को डिब्बा न दिखाई देने पर बैग में भर लेती हूँ। दोस्तों को भी फेंकने नहीं देती हूँ, अगर फेंक भी दिया तो उठा लेती हूँ और अपने पास रख लेती हूं। कइयों के लिए मैं मज़ाक का विषय हूँ लेकिन, मुझे इस बात का अफसोस नहीं...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4374986547260504121?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4374986547260504121/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4374986547260504121' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4374986547260504121'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4374986547260504121'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/09/blog-post_22.html' title='कृप्या यहां न थूके...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-6173828911978948800</id><published>2010-09-17T02:42:00.001-07:00</published><updated>2010-09-17T02:42:51.491-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीवी की कहानी दर्शक की ज़ुबानी...'/><title type='text'>सुगंध के साथ शरीर की बिक्री...</title><content type='html'>कुछ साल पहले एक विज्ञापन टीवी पर आया करता था। विज्ञापन में एक लड़का बांसुरी बजाकर शहर के सारे चूहों को समुद्र में बहा आता है। इस काम के पैसे ना मिलने पर वो बांसुरी छोड़ एक डियोड्रन्ट लगाता है जिसकी खूशबु के पीछे सारी लड़कियां चल पड़ती है। विज्ञापन विदेशी कंपनी का था और उसमें कलाकार भी सारे विदेशी ही थे। वो उस कंपनी का भारत में ऐसा पहला विज्ञापन था। विज्ञापन पर सभी की नज़रें पड़ी और सभी को बेहद बोल्ड लगा। युवाओं के मन में इस विज्ञापन ने अप्रत्यक्ष रूप से एक कामना भी जगाई। खैर, इसके बाद से लेकर अब तक ऐसे डियोड्रन्ट के कई विज्ञापन टीवी पर आने लगे हैं। शुरुआत जिस अप्रत्यक्ष रूप से हुई थी वो आज प्रत्यक्ष हो चुकी हैं। एक महिला का अपनी ही सुहागरात के दिन किसी ओर पुरुष पर आसक्त हो जाना केवल गंध के पीछे, या फिर एक माँ का बच्चों के साथ खेलते-खेलते एक नौजवान के कमरे में घुसकर कुंडी लगा लेना वो भी केवल उस गंध के चलते और भी कई ऐसे ही विज्ञापन आजकल टीवी पर हरेक ब्रेक में आप देख सकते हैं। ऐसे विज्ञापन उस उत्पाद के लिए किसी तरह की कामना जगाते हैं इस बात से बड़ी बात है, उस विज्ञापन में जागनेवाली कामनाएं। केवल एक गंध के पीछे क्या इंसान का मन और दिमाग इस तरह से घूम सकता है कि वो ये ही भूल जाए कि उसकी इच्छा और सच्चाई क्या है। ऐसे विज्ञापनों में शारीरिक आकर्षण को इस हद तक लेकर जाया जाता है कि उसके आगे पूरी दुनिया सामनेवाले को छोटी लगे। उत्तेजना को बढ़ानेवाले उत्पादों के विज्ञापन हमेशा से ही टीवी पर आते है और आज के वक़्त में बहुत खुलकर भी आते हैं लेकिन, उसके साथ ये बात सर्वविदित है कि वो इसी काम के लिए हैं। लेकिन, एक डियोड्रन्ट को उत्तेजना से जोड़ना और इस हद तक जोड़ना उत्पाद को बेचने के लिए इस्तेमाल की गई एक बेहुदी सोच लगती है। ऐसे उत्पाद विशुद्ध रुप से शरीर की दुर्गन्ध को छुपाने के लिए होते हैं। माना कि शरीर की एक विशेष गंध आकर्षित करती है लेकिन, वो गंध शरीर की होती है नहीं ऐसे उत्पादों की। ऐसे में केवल उत्पाद को बेचने के लिए शरीर की गंध को बेचने और इस तरह से मानवीय संबंधों और भावनाओं को भुनाने की सोच खतरनाक हैं। शायद विज्ञापन को बनानेवाले इस बात से अपना मुंह मोड़ लेना चाहते है कि वो एक समाज में रहते है। उससे भी बड़ी बात एक ऐसे समाज में जहाँ बड़े हो रहे बच्चों को उनके बड़े शरीर में आते बदलावों और सेक्स जैसी बातों के बारे में कोई जानकारी नहीं देते हैं। ऐसे में वो इन विज्ञापनों से क्या सीख लेंगे शायद उन्हें इससे मतलब नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-6173828911978948800?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/6173828911978948800/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=6173828911978948800' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6173828911978948800'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6173828911978948800'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='सुगंध के साथ शरीर की बिक्री...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-6184752508014658155</id><published>2010-09-10T00:47:00.001-07:00</published><updated>2010-09-10T00:47:57.267-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीवी की कहानी दर्शक की ज़ुबानी...'/><title type='text'>10 मिनिट में 100 खबरें...</title><content type='html'>रोज़ाना कम से कम तीन से चार बार परिचितों के फोन केवल दिल्ली में बाढ़ की स्थिति पूछने के लिए आते हैं। मैं ये बताते-बताते थक जाती हूँ कि ऐसी कोई बात नहीं है। दिल्ली में बाढ़ नहीं आई है। हाँ कुछेक यमुना के पास बसे निचले इलाकों में पानी भर गया है। लेकिन, किसी को मेरी बात पर यकीन नहीं होता हैं। हरेक को लगता है कि मैं झूठ ही बोल रही हूँ। आज सुबह ही फोन पर मुझसे ये पूछा गया कि इंडिया गेट तक सुना है पानी आ गया है....&lt;br /&gt;ग़लती इसमें दिल्ली से दूर दूसरे शहरों में रहनेवाले लोगों की नहीं बल्कि खबरिया चैनलों की है। दनादन खबरें दिखाते ये चैनल जोकि हमें खबरें ठूंसाते है आजकल नाव में बैठकर बुलेटिन पढ़ रहे हैं। खबर देखने के लालच में कल जब टीवी ऑन किया तो एक खबरिया चैनल पर एंकर क्रोमा की नाव में बैठी थी तो दूसरे में असल की नाव में। पूर्वी दिल्ली के डूबने की खबरें में पूर्वी दिल्ली के निचले इलाके में बने अपने रूम पर बैठकर ही सुन रही थी। अचानक से कही से रिपोर्टर आ जाता है और चिल्लाने लगता है कि देखिए मेरे पीछे का नज़ारा कैसे सब कुछ डूब चुका हैं। अब बारिश के दिनों में कौन सी ऐसी नदी होती होगी जिसके किनारे पर पानी ना आ जाता हो। लेकिन, हमारे चैनलों पर आजकल खबर दिखाने का चलन कुछ कम हो चला हैं। अब तो डराने का मौसम आ गया है। बारिश से डराओ, तूफान से डराओ, तहखाने की मौत से डराओ, डराओ, डराओ और बस डराओ। डराने के साथ-साथ इन चैनलों पर दूसरी जो चीज़ आपको मिल जाएगी वो है उधार का मनोरंजन। अगर आपको कोई भी कामेडी शो मिस हो गया हो घबराईए मत आपको प्राइम टाइम पर कॉमेडी से लेकर खतरों के खिलाड़ी और यू ट्यूब के विडियो सब कुछ मिल जाएगे। खबरें भी मिलेगी, लेकिन उसके लिए आपको लगातार देखते रहना पड़ेगा पता नहीं कब अचानक 10 मिनिट में 100 खबरें खत्म हो जाए और फिर आपको खबरिया चैनल पर खबरें देखने के लिए दो यै तीन घंटे का लंबा इतंज़ार करना पड़े...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-6184752508014658155?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/6184752508014658155/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=6184752508014658155' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6184752508014658155'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6184752508014658155'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/09/10-100.html' title='10 मिनिट में 100 खबरें...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-1240767228524392098</id><published>2010-08-23T04:53:00.000-07:00</published><updated>2010-08-23T04:54:25.086-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीवी की कहानी दर्शक की ज़ुबानी...'/><title type='text'>मम्मी के साथ मत देखना</title><content type='html'>शनिवार को टीवी पर एक नया शो देखा। नाम है - मीठी छुरी... कुछ टीवी की अभिनेत्रियां बैठी थी और दो पुरुष एंकर उनसे बातें कर रहे थे। शो की टैग लाइन है मम्मी के साथ मत देखना। मम्मी साथ रहती नहीं सो सोचा कि इसे भी देख लिया जाए। ये सभी महिलाएं यहां एक दूसरे का मज़ाक उड़ा रही थी। बीच-बीच में अपना भी। थोड़ी-थोड़ी देर में सौ पुरुषों से उनके बारे में राय भी ली जा रही थी। संक्षिप्त में कहा जाए तो एक महिलाओं की किटी पार्टी को दो पुरुष मिलकर होस्ट कर रहे थे और उसका प्रसारण टीवी पर हो रहा था। शो में होनेवाली बातें कुछ नई थी। कम से कम मेरे लिए जोकि एम टीवी रोडी और स्प्लिट्सविला और न जाने क्या-क्या देख चुकी हूँ। खैर, इसमें जो बात मुझे पते की लगी वो थी इन कलाकारों की इमेज। मुझे ये जानकर आश्चर्य हुआ कि उतरन में तपस्या कि माँ का किरदार निभा रही अभिनेत्री कुंवारी है। अगर मुझसे ही पूछा जाता तो मुझे लगता कि ये तो दो बच्चों की माँ होगी। लेकिन, वो तो कुंवारी है और खूब पार्टी करती हैं। ऐसी ही कई बातें कइयों के बारे में मालूम चली। यही वजह है कि सौ पुरुषों की महिलाओं के बारे में राय एकदम ग़लत साबित हो रही थी। दरअसल हम जो टीवी पर देखते हैं उसकी छाप हमारे मन पर इतनी गहरी होती है कि हम असलियत उसी को मान लेते हैं। इस शो को देखने के बाद कुछ नया नहीं लगा। आज के समय में हरेक इंसान ऐसा ही हैं कुछ खुलकर तो कुछ दबकर। लेकिन, एक बात तो है टीवी का हमारे मन पर असर आज भी उतना है जितना कि रामायण के वक़्त था। पहले लोग अरुण गोविल के पैर छूते थे और ये मानते हैं कि सुगना या गहना मिनी नहीं पहन सकती। कुछ को ये शो सामाजिक पतन लगे लेकिन, मुझे तो एक मौक़ा लगा टीवी के कलाकारों को जानने का...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-1240767228524392098?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/1240767228524392098/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=1240767228524392098' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/1240767228524392098'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/1240767228524392098'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/08/blog-post_23.html' title='मम्मी के साथ मत देखना'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-556172255354625006</id><published>2010-08-18T06:57:00.000-07:00</published><updated>2010-08-18T06:58:16.082-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीवी की कहानी दर्शक की ज़ुबानी...'/><title type='text'>आज़ादी की पतंग...</title><content type='html'>&lt;span style="color:#333333;"&gt;कुछ दिन पहले मुझे आज़ादी की एक नई कहानी पर काम करने का मौक़ा मिला। मुझ से पूछा गया कि आपको आज के वक़्त में आज़ादी से जुड़ी हुई क्या बात या काम अलग लगता है। मुझे याद आई आज़ादी के दिन दिल्ली के आसमान में उड़ती पतंग। मेरी लिए ये एकदम अलग और अनोखी बात थी। मैंने कही भी 15 अगस्त के दिन पतंग उड़ाते किसी को नहीं देखा था। मैंने इसी विषय को अपनी स्टोरी के लिए चुना और पहुंची कुछ ऐसे लोगों के पास जिनके लिए इस दिन पतंग उड़ाने का अर्थ है आज़ादी मनाना। इनका मानना है कि पतंग जिस आज़ादी से हवा में लहराती है वैसे भी हरेक मन हवा में उड़ना और हरेक बंधन से आज़ाद होना चाहता हैं। इसके बाद हम पहुंचे पुरानी दिल्ली के लालकुंआ इलाक़े में। वहां बिकती है ये पतंग। पूरी दिल्ली में यही से पतंग जाती हैं। ये पतंग का थोक बाज़ार हैं। यहां आकर और लोगों से मिलकर मालूम चलाकि कितना बड़ा हैं पतंग का व्यवसाय। इसी विषय पर बनी मेरी रिपोर्ट लोकसभा टीवी के विशेष कार्यक्रम आजादी की नई कहानी में चली हैं। अगर आप इसे देखेंगे तो अच्छा लगेगा।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लिकं है - &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=9ADJS_RBfuk" target="_blank"&gt;&lt;span style="color:#333333;"&gt;&lt;strong&gt;http://www.youtube.com/watch?v=9ADJS_RBfuk&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-556172255354625006?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/556172255354625006/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=556172255354625006' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/556172255354625006'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/556172255354625006'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='आज़ादी की पतंग...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4446548575427574290</id><published>2010-07-30T11:50:00.000-07:00</published><updated>2010-07-30T11:52:35.001-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोगलापन...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>चाबी से चलनेवाला गुड्डा</title><content type='html'>हमारे समाज में प्रतिष्ठा किसी भी दूसरी वस्तु या इंसान से बड़ी है। इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है प्रतिष्ठा के नाम पर होनेवाली हत्याएं। हालांकि अब इस पर लगाम लगाने के लिए सरकार क़ानून बनाने के बारे में सोच रही है। इससे इतर समाज का एक तबका इससे निपटने के लिए कमांडो का गठन कर चुका है। नाम है- लव कमांडो। जी हाँ, लव कमांडो के नाम से शुरु हुई इस फोर्स में वकील से लेकर डॉक्टर तक हरेक तबके लोग शामिल है। ये वो लोग है जोकि समाज में हो रही ऐसी हत्याओं को रोकना चाहते हैं। जोकि एक ऐसे समाज कि स्थापना करना चाहते हैं जहाँ कोई जातिगत बंधन ना हो। इस कमांडो ने अब तक कई शादियां करवाई हैं, कइयों की जान बचाई है। इसी मुद्दे पर पिछले हफ्ते मैंने एक रिपोर्ट तैयार की। रिपोर्ट किसी एक कमांडो या फिर केवल ऑनर कीलिंग से कुछ आगे थी। मुद्दा था- एक ऐसा समाज जहाँ एक इंसान आज़ादी से जी सकें। जहां किसी भी बात पर खौफ इतना ना बढ़ जाए कि मरना या मारना ही अंतिम रास्ता रह जाए। दरअसल जब शूटिंग की शुरुआत की थी तो दिमाग में केवल ऑनर कीलिंग के नाम पर हो रही युवाओं की मौत और लव कमांडो जैसी संस्थाएं ही दिमाग में थी। लेकिन, एक दिन शूट के दौरान महिला आयोग के सामने एक ऐसे जोड़े से मुलाक़ात हुई जोकि घरवालों से छुपकर भाग रहा था। उनकी गलती उनका प्यार था। बातों बातों में ही उन्होंने बताया कि वो एक ही जाति के हैं और दोनों के गोत्र भी अलग है। मैं चौंक गई। मुझे लगाकि ये तो समाज के नियमों के एकदम अनूकुल है फिर क्या परेशानी। तो मालूम हुआ कि माँ बाप को बस इस बात पर एतराज़ है कि उन्होंने अपनी मर्ज़ी से शादी क्यों की। मेरा दिमाग चकरा गया। अब तक समाज के नाम पर होनेवाली गुन्डागर्दी का ये एक नया कोण था। कही ये तो नहीं कि समाज के नाम पर लोग केवल अपनी मर्ज़ी को चलाना चाहते हैं। वो अपने बच्चों को अपनी जमा की गई उस पूंजी के बराबर मानते हैं जोकि निर्जीव होती हैं। जिसके पास खुद का दिमाग या उससे बढ़कर एक दिल नहीं होता है। शायद आज ज़रूरत एक जातिविहीन समाज से बढ़कर कुछ ऐसे माता-पिता और बुज़ुर्गों की हैं जोकि युवाओं को इंसान समझकर उन्हें सही गलत समझाए लेकिन, उन पर अपनी समझ ना थोपे। एक बच्चे को पालनेवाला, उसे सिखानेवाला, उसे समझानेवाला हरेक बात का अर्थ और हिदायत देनेवाला एक बड़ा ही होता है। ऐसे में जब बुज़ुर्ग खुद ही एक बच्चे को परिपक्व और समझदार होने में मदद करते हैं तो फिर क्यों उसकी ही सोच को एक दिन वो नकार देते हैं। शायद वो उस बच्चे को हाड़ मांस का न मानते हुए चाबी से चलनेवाला गुड्डा समझ लेते हैं जोकि उतना ही चलेगा जितनी हम चाबी भरेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत में- आज ही टीवी पर एक नई फिल्म आक्रोश का पहला प्रोमो देखा। मुद्दा यही है। प्रोमो एक बेहतर फिल्म के साथ एक बेहतर सामाजिक शोध की उम्मीद जागानेवाला हैं...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4446548575427574290?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4446548575427574290/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4446548575427574290' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4446548575427574290'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4446548575427574290'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/07/blog-post_30.html' title='चाबी से चलनेवाला गुड्डा'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-6597261802246554978</id><published>2010-07-20T08:51:00.000-07:00</published><updated>2010-07-20T08:53:21.978-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>मानसिक तनाव</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;आज ऑफिस से आते वक़्त मैट्रो से बाहर निकलकर जब मैं फुट ओवर ब्रिज पर चढ़ी तो एक अडीब घटना हुई। दरअसल सभी लोग ब्रिज के एक कोने से चलकर जा रहे थे। बाजू की पूरी जगह खाली थी। सभी एक लाइन से एक पीछे एक चले जा रहे थे। मैं भी उनके पीछे चल दी। थोड़ी देर के बाद मुझे लगाकि मैं इनके पीछे क्यों चल रही हूँ... तब अचानक से मुझे लगाकि आज हम सभी भाग रहे हैं। क्यों भाग रहे हैं ये कोई नहीं जानता है। हम सिर को झुकाए एक दूसरे के पीछे बस एक अंधी दौड़ में चल रहे हैं। इस दौड़ में शामिल होकर कई बार हम एक ऐसे तनाव में घिर जाते हैं कि हम जानते ही नहीं है कि हम क्या कर रहे हैं। मेरे एक पहचान के या फिर ये कहूँ कि मित्र के साथ भी यही हो रहा है। वो पूरी तरह से इस अंधी दौड़ में शामिल हो चुके हैं। कभी उनके माता-पिता उन्हें इसमें झोंक देते हैं तो कभी जाने अंजाने उनके दोस्त उन्हें इसमें डाल देते हैं। वो खुद क्या चाहते हैं वो नहीं जानते हैं। इसी दौड़ में वो अपने आपको बहुत पहले ही खत्म कर चुके हैं। और, आज हालात ऐसे है कि वो इस दौड़ में दौड़ते हुए इसने थक गए है कि अपनी इस थकान को निकालने के लिए आसरा खोजते रहते हैं। पहले तो लोग सहारा दे देते थे लेकिन, अब सब किनारा करने लगे हैं। दरअसल जो भी उन्हें सहारा दे रहे थे वो भी तो भाग ही रहे हैं। वो कब तक और कहाँ तक किसी और को सहारा देंगे। सहारों के साथ जीनेवाले और अकेले कुछ न कर पानेवाले इस सज्जन के हालात अब कुछ ऐसे है कि उनका फ्रस्टेशन का स्तर खतरे के निशान को पार कर चुका है और अब ज़रा सी भी बात या फटकार या समझाइश पर ये कुछ ऐसे बौखलाते कि जैसे पागल कुत्ते की दुम पर किसी ने पैर रख दिया हो। ऐसे में बौखलाए, बड़बड़ाते और बदतमीज़ी करते इंसान को कुछ कहने का मन भी नहीं करता...&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-6597261802246554978?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/6597261802246554978/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=6597261802246554978' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6597261802246554978'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6597261802246554978'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/07/blog-post_20.html' title='मानसिक तनाव'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4225131398866660755</id><published>2010-07-13T04:51:00.000-07:00</published><updated>2010-07-13T04:52:55.180-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>शहरी गाय</title><content type='html'>घर में जब भी खाना बनता है एक हिस्सा गाय और एक हिस्सा कुत्ते का ज़रूर निकलता हैं। अगर श्राद्ध का समय है तो कौवे के लिए भी। बचपन से ही घर के सामने टहल रही गाय को आजा-आजा गाय-गाय करके रोका है और डर-डरकर रोटी खिलाई हैं। एक बार ऐसी दौड़ लगाई थी कि पैर का नाखून ही टूट गया था। खैर, ये बातें किसी महानगर की नहीं है बल्कि छोटे शहरों की है। दिल्ली में तो गाय के दर्शन ही दुर्लभ है। और, किसी पालतू के पास तक आप पहुंच भी जाए तो उसका मालिक यूं घूर के देखता हैं जैसे रोटी ना कोई जहर हो आपके हाथ में जो आप गाय को खिला रहे हैं। दिल्ली आने के कुछ ही दिनों बाद मम्मी ने कहा था कि हर सोमवार को मंदिर में दिया लगाना और मंगलवार को गाय को रोटी खिलाना। न तो मैं मंदिर जा पाती थी और न ही मुझे मंगलवार को गाय मिल पाती थी। ऑफिस के आने के बाद गाय को ढ़ूढने में हालत खराब हो जाती थी। मम्मी के कई अजीब और छोटे शहरों की सोचवाले सुझावों के बाद अंततः मैंने ये काम बंद कर दिया। शहर में यूं ही कही कोई गाय किसी कचरे के डब्बे के पास खड़ी मिल जाती है। उसके मुंह में कचरा भरा होता हैं। ऐसे में जहां मेरे जैसे लोग चाहकर भी गाय को रोटी नहीं खिला पाते हैं ऐसे में गाय को कचरा खाते देख दुख होता था। इस सबके बीच मुझे गौ-ग्रास सेवा के बारे में पता चला। ये दिल्ली के कुछ इलाकों में चल रही है। इसमें कुछ साइकलों पर टीन के डब्बे लिए लोग सुबह-सुबह कॉलोनी की गलियों में घूमते हैं। घंटी बजाते हैं और लोग अपनी घर का बासी बचा खाना इन डब्बों में डाल जाते हैं। ये खाना लगभग तीन-चार घंटे तक इकठ्ठा किया जाता हैं इसके बाद इस खाने को दिल्ली की किसी भी गौ शाला में भेज दिया जाता हैं। ऐसा करने के पीछे वजह है गायों का सड़क के किनारे रखे कचरे डब्बों से खाना नहीं खाना। दिल्ली में अधिकतर गौ शाला वाले अपनी गायों को यूं ही सड़क पर छोड़ जाते हैं और कचरा खानेवाली इन्हीं गायों से निकला दूध फिर लोग पीते हैं। ऐसे में इस दूध की पौष्टिकता का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं। ऐसे में इस सेवा के ज़रिए दिल्ली के कुछ मुठ्ठीभर इलाकों में ही सही लेकिन, कुछ जगह तो कम से कम गायों को कुछ ढ़ंग का खाना नसीब हो रहा हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4225131398866660755?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4225131398866660755/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4225131398866660755' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4225131398866660755'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4225131398866660755'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='शहरी गाय'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-2697990384789821603</id><published>2010-06-14T05:18:00.000-07:00</published><updated>2010-06-14T05:19:20.172-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीवी की कहानी दर्शक की ज़ुबानी...'/><title type='text'>टोटल रीकॉल</title><content type='html'>&lt;span style="color:#660000;"&gt;छुट्टी के दिन वैसे तो कई काम होते हैं लेकिन, कई बार ऐसा भी लगता है कि कोई काम ही नहीं है। ऐसे में साथ देता हैं टीवी। आज हमारे सामने इतने सारे चैनल के ऑप्शन है कि ये समझ ही नहीं आता हैं कि क्या देखे और क्या न देखे। ऐसे में मेरा हाथ लगातार रिमोट के बटनों में घुमता रहता है। लेकिन, कल मेरा हाथ रुक गया। टाइम्स नॉओ पर टोटल रीकॉल आ रहा था। उत्पल दत्त के बारे में। उनकी की गई फ़िल्में, उनके निभाए किरदार और उनकी ज़िंदगी के कई अनछुए पहलू। एक बार देखना शुरु किया तो उसके खत्म होने तक वही लगा रहा। यहां तक कि ब्रेक में भी चैनल नहीं बदला। ऐसा कई सालों बाद मैंने किया होगा। हालांकि नीचे चल रहे ढ़ेरों स्क्रोल और अजीब सी विंडों में बहुत भरा भरा परेशान कर रहा था फिर भी मैंने उसे पूरा देखा। कारण सिर्फ़ इतना कि कार्यक्रम का कन्टेन्ट बहुत बेहतरीन था। अफसोस की हिन्दी में ऐसे कार्यक्रम मुझे आजकल नज़र नहीं आते। इस कार्यक्रम को मैं पहले भी देखती थी और मुझे ये हमेशा से ही अच्छा लगता हैं। लेख का मक़सद बस इतना कि अगर आपने आजतक नहीं देखा तो एक बार ज़रूर देखे। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-2697990384789821603?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/2697990384789821603/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=2697990384789821603' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2697990384789821603'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2697990384789821603'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='टोटल रीकॉल'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-1378692145596223005</id><published>2010-05-06T00:30:00.000-07:00</published><updated>2010-05-06T00:31:04.846-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीवी की कहानी दर्शक की ज़ुबानी...'/><title type='text'>मिस्टर एण्ड मिसेस शर्मा इलाहबादवाले</title><content type='html'>सब टीवी वैसे तो सबका प्रिय चैनल बन चुका हैं। ख़ासकर मेरी तरह रहनेवाले अकेले रहनेवाले लोगों का। दिनभर की थकान के बाद टीवी पर भी किसी तरह की लड़ाई देखने का मन मेरा तो नहीं होता हैं। ऐसे में लापतागंज से लेकर सजन रे झूठ मत बोलो ये सारे कार्यक्रम मैं देखती हूँ। लेकिन, आजकल इंतज़ार है एक नए धारावाहिक का। मिस्टर एण्ड मिसेस शर्मा इलाहबादवाले। धारावाहिक का नाम और राजेश जैसे हास्य में पारंगत कलाकार को देखने से तो यही लग रहा हैं कि ये एक बेहतरीन धारावाहिक होगा। छोटे से शहर से मुबंई आए इस आत्ममुग्ध जोड़े के किस्सों का इंतज़ार है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-1378692145596223005?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/1378692145596223005/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=1378692145596223005' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/1378692145596223005'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/1378692145596223005'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/05/blog-post_06.html' title='मिस्टर एण्ड मिसेस शर्मा इलाहबादवाले'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-2619349833612783174</id><published>2010-05-03T23:32:00.001-07:00</published><updated>2010-05-03T23:32:50.334-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>आखिर हम हैं कैसे...</title><content type='html'>हम रोज़ाना कुछ न कुछ नया सीखते हैं। घर में रहते हुए भी और घर से निकलकर भी। ख़ासकर अगर हम अकेले किसी सफ़र पर हो। ऐसे समय में हम इतने अकेले होते हैं कि चुपचाप दूसरों को देखते रहते हैं और उनकी हरक़तों को पढ़ते रहते हैं। आज भी ऐसा ही हुआ। मैट्रो के सफ़र के दौरान दो बार मुझे ऐसे बुज़ुर्ग दिखे जो टीनएजर बच्चों को बातें सिखाने की कोशिश कर रहे थे। बुज़ुर्ग पूरे मन से बच्चों को नसीहतें दे रहे थे कि पहले उतरनेवालों को जगह दो, मैट्रो में मस्ती मत करो और भी बहुत कुछ। वही दूसरी ओर वो युवा उनकी बातें अनमने ढंग से इधर उधर करके सुन रहे थे। बुज़ुर्ग के जाते ही वो पीछे से बोलते हैं क्या यार बकवास करते रहते हैं। दरअसल में हम जब बड़े हो रहे होते हैं तो हमें बड़ों की नसीहतें बहुत भारी और झिलाऊ लगती हैं। हम पहले तो उन्हें सुनना नहीं चाहते और सुन भी लेते हैं तो उसे मानने से कतराते हैं। वही जब हम बड़े हो जाते हैं तो अपनी ही इस बात को भूलकर सलाहें देना शुरु कर देते हैं। मैं न तो टीनएजर हूँ और नहीं इतनी बड़ी कि मेरे कोई बहुत बड़े अनुभव हो। मैं कही बीच में लटकी हुई हूँ। युवाओं की उस चीढ़ को भी समझती हूँ और बुज़ुर्गों की उस सलाह के मायने को भी। लेकिन, फिर भी मैं तब से यही सोच रही हूँ कि आखिर हम हैं कैसे...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-2619349833612783174?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/2619349833612783174/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=2619349833612783174' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2619349833612783174'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2619349833612783174'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='आखिर हम हैं कैसे...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-8884475168903931837</id><published>2010-04-27T07:54:00.000-07:00</published><updated>2010-04-27T07:59:19.785-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>रूम पर आए नए मेहमान...</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/S9b7rK2NZvI/AAAAAAAAAWQ/r51s-2PorQ0/s1600/images.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 113px; FLOAT: left; HEIGHT: 96px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5464831916925347570" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/S9b7rK2NZvI/AAAAAAAAAWQ/r51s-2PorQ0/s200/images.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मेरे दिल्ली के तीसरी मंज़िल पर तपते हुए कमरे में आजकल कुछ नए मेहमान आने लगे हैं। साल 2006 में दिल्ली आने के बाद शहर को समझने और कुछ संभलने के बाद उसके अगले ही साल से मैंने अपने रूम के आगे एक मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर रखने लगी थी। कुछ दिनों बाद गर्मियों के दिनों में पानी के साथ ही बाजरा भी डालने लगी। सुबह जब ऑफिस के लिए निकलती तो इस उम्मीद के साथ कि आज शआम को कुछ दाने कम मिलेंगे। लेकिन, हर बार मुझे निराशा हाथ लगती। खैर, पूरे चार साल के बाद कुछ दिन पहले गर्मियों के मौसम को देखते हुए मैंने एक बार फिर उम्मीद के साथ पानी और बाजरा रखना शुरु किया। एक दिन अचानक आवाज़ें सुनाई दी। बाहर आकर देखा तो बाजरे के दानों पर कई अलग-अलग किस्म की चिड़िया झूम रही थी। पानी भी पी रही थी कुछ। सच में इतनी खुशी मुझे शायद ही कभी हुई हो। आजकल तो हालात कुछ ऐसे हैं कि अगर सुबह-सुबह पानी और बाजरा नहीं रखा तो उनका चिल्ला शुरु हो जाता हैं। सच कहूँ तो केवल इन मेहमानों के समय रहते सत्कार करने के चक्कर में मैं समय पर उठ जाती हूँ। खुश भी रहती हूँ कि कोई तो है दोस्त जो मेरे घर नियम बांधकर आते हैं और मुझे अपने मासूम से मतलब के लिए ही सही डांटता भी हैं। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-8884475168903931837?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/8884475168903931837/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=8884475168903931837' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8884475168903931837'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8884475168903931837'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/04/blog-post_27.html' title='रूम पर आए नए मेहमान...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/S9b7rK2NZvI/AAAAAAAAAWQ/r51s-2PorQ0/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-1826468400502510014</id><published>2010-04-13T01:17:00.000-07:00</published><updated>2010-04-13T01:18:49.176-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>उम्मीद की गठरी...</title><content type='html'>&lt;strong&gt;पंकज रामेन्दू&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उम्मीद की गठरी को जब से उठाया,&lt;br /&gt;तब से मैंने ये पाया कि मैं कायर हो गया&lt;br /&gt; गठरी को सिर पर उठाये में&lt;br /&gt; जिंदगी की पटरी पर फिसलता हूं संभलता हूं&lt;br /&gt;लेकिन बोझ से झुकी हुई मेरी पीठ&lt;br /&gt; अक्सर मेरा मुंह धरती की ओर मोड़ देती है&lt;br /&gt;मैं आसमानी रंग नहीं देख पाता हूं&lt;br /&gt;इस  गठरी में सबकी अपनी-अपनी पोटली है..&lt;br /&gt;जिसके बीच मेरे ख्वाबों की पोटली ऐसी है&lt;br /&gt;जैसे रेहड़ी पर बिकते हुए सस्ते कपड़े&lt;br /&gt;जिनमें अपने पसंद का कपड़ा निकालने में कई बार उम्र गुज़र जाती है.&lt;br /&gt;फिर भी मैं लगा हुआ हूं,&lt;br /&gt;डरते हुए, सहमते ,हुए&lt;br /&gt;शायद मुझे वो कपड़ा मिलेगाजो मेरे पसंद को होगा&lt;br /&gt;मरे नाप का होगा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-1826468400502510014?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/1826468400502510014/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=1826468400502510014' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/1826468400502510014'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/1826468400502510014'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='उम्मीद की गठरी...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-3805427021513453135</id><published>2010-03-22T01:01:00.000-07:00</published><updated>2010-03-22T01:03:13.651-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैट्रो का सफर...'/><title type='text'>बेचारे पुरुष...</title><content type='html'>&lt;span style="color:#330000;"&gt;महिलाओं को समाज में समान दर्जा दिलवाने के लिए कई लोग कई तरह से लड़ाइयाँ लड़ रहे हैं। और, ये बात सच भी है कि इसके लिए उन्हें बहुत लंबा संघर्ष करना पड़ रहा हैं। दिल्ली को यूँ तो महिलाओं के लिए सुरक्षित कतई नहीं माना जा सकता है फिर भी दिल्ली की मैट्रो में हालात कुछ बेहतर हैं। या फिर ऐसा कहे कि पुरुषों को यहाँ मैंने कभी-कभी डरते भी देखा हैं। दरअसल, हर दूसरे दिन मुझे ये महसूस होता है कि मुझे देखकर सीट पर बैठा पुरुष कुछ अनमना-सा होने लगता हैं। इधर-उधर देखने लगता हैं। असल में मैट्रो में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों से साथ ही कुछ सीटें ऐसी होती हैं जिन पर लिखा होता हैं कि ज़रूरतमंद को सीट दे। ये वाक्य ऐसा है कि पढ़कर लगता हैं हो गई ये भी महिलाओं के लिए। ऐसे में सीट पर बैठे पुरुष के आगे जैसे ही महिला आकर खड़ी हुई वो पहले पीछे मुड़कर सीट की ओर देखने लगता हैं। अगर पीछे वो पीला परचा चिपका हो तो अचानक पुरुष को नींद आने लगती है। वो आंखें बंद कर लेता हैं। उस समय वो बिल्ली-सा लगता है जोकि दूध पीकर आँखें बंद कर लेती हैं कि अब उसे कोई नहीं देख सकता। सीट अगर पूरी तरह से अनारक्षित हो तब भी मैट्रो में लगातार हो रहा अनाउन्समेंट कि महिलाओं, विकलांगों और वरिष्ठ नागरिकों को सीट दे उनके मन में छूरी की तरह घुपता रहता हैं। पुरुष भीड़ में खड़ी सामान संभाल रही महिलाओं को देखते हैं और मुंह फेर लेते हैं। लेकिन, मुंह फेरने से कान में जा रही आवाज़ आना बंद नहीं होती हैं। बेचारे पुरुष... &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-3805427021513453135?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/3805427021513453135/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=3805427021513453135' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3805427021513453135'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3805427021513453135'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/03/blog-post_22.html' title='बेचारे पुरुष...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-5515331971981249255</id><published>2010-03-14T22:07:00.000-07:00</published><updated>2010-03-14T22:09:16.374-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>जो दबता है, उसे दबाना बनता है...</title><content type='html'>&lt;span style="color:#000000;"&gt;आम जनता को सेवाएं देनेवाली कंपनियों के विज्ञापनों को देखकर आपको एक पल के लिए लगेगा कि ये लोग मुनाफ़े का धंधा नहीं बल्कि पुण्य का काम कर रहे हैं। ऐसे ही कई सेवा कंपनियों के विज्ञापन तो ऐसे होते हैं कि बस एक फोन किया आपकी दुनिया बदल गई। लेकिन, जब यही कंपनियाँ असलियत के धरातल पर उतरती हैं तो किसी दैत्य से कम नज़र नहीं आती हैं। एक लोन लेने के लिए पलकें बिछाए और फोन पर फोन घुमानेवाली कंपनियाँ लोन के लिए अर्ज़ी देने पर ऐसा व्यवहार करती हैं कि जैसे उधार दे रही हो। मैं फिलहाल ऐसे ही अनुभव से गुजर रहा हूँ। बड़ी मुश्किल और मशक्कत के बाद मैंने कम्प्यूटर खरीदा है। उसे खरीदे हुए तीन महीने होनेवाले है इंटरनेट कनेक्शन नहीं लगवा पाया हूँ। किसी के दाम ज़्यादा, तो किसी की स्पीड कम, तो किसी का कवरेज नहीं, तो कोई मेरे रहने-खाने से लेकर सोने तक का हिसाब साथ मांगता है। ऐसे में दम साधकर एक कनेक्शन आखिरकार मैंने ले ही लिया। कनेक्शन लिए हुए चार दिन हो गए है और आज तक एक्टिवेशन के नाम पर कुछ नहीं। फोन कर-करके और लड़-लड़कर ऐसी हालत हो गई है कि अगर आज वो कनेक्ट हो भी जाए तो शायद मेरा इस्तेमाल करने का मन ना हो। ऐसे में जब भी उस कंपनी का ग्राहक सेवा से जुड़ा विज्ञापन देखता हूँ तो मन और बिगड़ जाता हैं। लेकिन, फिर लगता है कि कमी ख़ुद में ही है। एक ग्राहक के रूप में हम अपने अधिकारों के बारे न तो कुछ जानते हैं और ना ही जानना चाहते हैं। ग्राहकों के क्या हक़ है, हम क्या-क्या कर सकते हैं इसकी जानकारी हमें ना के बरारबर हैं। ऐसे में अगर हमारे साथ कंपनी इस तरह का बर्ताव करते है तो इसमें ग़लत क्या है। जो दबा है उसे तो हरेक दबाता ही हैं... &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-5515331971981249255?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/5515331971981249255/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=5515331971981249255' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5515331971981249255'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5515331971981249255'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/03/blog-post_14.html' title='जो दबता है, उसे दबाना बनता है...'/><author><name>Bhuwan</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-3747745860866577695</id><published>2010-03-04T23:05:00.000-08:00</published><updated>2010-03-04T23:06:57.814-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ अलग'/><title type='text'>क्या करें क्या ना करें...</title><content type='html'>प्यार करना बच्चों का खेल नहीं और उससे भी मुश्किल है उस प्यार को ज़िंदगीभर शादी के रूप में निभाना। आज के इस समाज में प्रेम विवाह में जो तेज़ी आई बदलाव तो दर्शाती है साथ ही युवाओं की फैसले लेने की क्षमता भी बताती है। ये बात अलग है कि पिछले पाँच से छः सालों में हुए ये फैसले आनेवाले कुछ दस सालों में बताएंगें कि फैसले सही थे या ग़लत। प्रेम विवाह के लिए असहमति रखनेवाले माता-पिता बच्चों से पल्ला झाड़ लेते हैं लेकिन, इसे स्वीकृति देनेवाले भी आनेवाली परिस्थितियों में बच्चों का साथ ना निभाने की धमकी साथ दे देते हैं। सारांक्ष ये कि प्रेम विवाह ढ़ेढ़ी खीर हैं। लेकिन, पिछले कुछ दिनों से आसपास के अनुभवों को सुनकर लगता है कि अरेन्ज शादियाँ इनसे भी मुश्किल हैं। मेरी दोस्त की शादी कुछ महीनों बाद है वो प्रेम विवाह कर रही है। उसकी बड़ी बहन की शादी अभी नहीं हुई है वजह ये कि उसके माता-पिता बहन के मुताबिक़ लड़का नहीं खोज पा रहे हैं। मेरे बड़े भाई के लिए लड़की खोजना भी हमारे लिए मुश्किल का काम बनाता जा रहा है। इतनी सारी बातों का ध्यान रखना, हर कसौटी पर लड़का और लड़की को परखना कोई आसान काम नहीं। कल मेरी दोस्त का फोन आया उसे देखने एक लड़का आनेवाला है। वो लड़के से माता-पिता की इजाज़त से फोन पर बात कर चुकी है। लड़का उसे अच्छा और समझदार लगा। इसी बीच उसके पिता उससे मिलने गए और उन्हें वो कुछ ख़ास नहीं लगा। माँ-बाप हमेशा ही बच्चों के लिए बेस्ट खोजते हैं और उन्हें अपने बच्चे सबसे सुन्दर लगते हैं। मेरी दोस्त बीच में फंसा हुआ-सा महसूस करने लगी है। बातों-बातों में ही उसने कहा कि क्या यार ऐसी ही परिस्थिति में पड़ना तो अपनी पसंद से ही ना कर लेती मैं शादी। सच है माता-पिता की उम्मीदों, सामनेवाले इंसान और उसके परिवार की उम्मीदों सभी का बोझ आज उसके कंधों पर हैं। ऐसे में फैसला लेना और उस सही या ग़लत फैसले को ज़िंदगीभर ढोना बहुत ही भयानक होगा। समाज बदल रहा है लेकिन, सिर्फ़ प्रेम विवाह के मामले में नहीं बल्कि अरेन्ज शादियों के मामले में भी। अब माता-पिता अपनी मर्ज़ी चलाते हैं तो लेकिन, बच्चों के कंधों पर पसंद-नापसंद की शर्त पर...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-3747745860866577695?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/3747745860866577695/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=3747745860866577695' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3747745860866577695'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3747745860866577695'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/03/blog-post_3113.html' title='क्या करें क्या ना करें...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-3245097149884515464</id><published>2010-03-04T02:10:00.000-08:00</published><updated>2010-03-04T02:11:13.390-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>अति सर्वत्र वर्जयेत</title><content type='html'>अति किसी बात की ग़लत होती है। ये बात जानते हुए और मानते हुए भी मुझे लगता है कि कई बार मैं अति कर जाती हूँ। नियमों का पालन करने के मामले में कुछ हद से ज़्यादा हूँ। कुछ खाने के बाद अगर डस्टबीन ना मिले तो फेंकनेवाला कचरा हाथों में या बैग में लिए घूमती रहती हूँ। बस में पीछे से चढ़ने और आगे से उतरने की कोशिश करती हूँ। बस स्टॉप पर ही खड़ी रहती हूँ, ये बात अलग है कि बस कभी-कभी ही स्टॉप पर रुकती हैं। ख़ुद तो नियमों का पालन करती हूँ लेकिन, समस्या ये है कि चाहती हूँ कि लोग भी ऐसा ही करें। उनके ऐसा नहीं करने पर मन दुखी हो जाता है। सच में नियमों के पालन की ये अति मुझे बहुत दुख देती है। दिल्ली में विश्व स्तर की मैट्रो चल जाने के बाद उम्मीद थी कि सिविक सेन्स में सुधार आएगा। लेकिन, अफसोस ऐसा कुछ हुआ नहीं। सिविक सेन्स में ये कमी पढ़े-लिखे लोगों में ज़्यादा नज़र आती है। कल ही एक पढ़े-लिखे लड़के को मैट्रो में थूकते देखा। मन तो ऐसा हुआ कि उसके एक थप्पड़ मार दूँ। नहीं तो उसे दो बातें ही सुना दूँ। लेकिन, मैं कुछ नहीं बोल पाई चुपचाप वहाँ यूँ ही खड़ी रही। मैं कई बरा ये समझ नहीं पाती हूँ कि क्या सच मे पढ़ाई लोगों को सभ्य बनाने का माद्दा रखती हैं...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-3245097149884515464?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/3245097149884515464/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=3245097149884515464' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3245097149884515464'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3245097149884515464'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/03/blog-post_04.html' title='अति सर्वत्र वर्जयेत'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-5913408905369168513</id><published>2010-03-03T00:27:00.000-08:00</published><updated>2010-03-03T00:28:23.979-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>नशे की दुनिया</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;em&gt;भुवन&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;         ऑफ़िस&lt;/span&gt; आते जाते रोज़ाना ही एक न एक नशेड़ी सड़क पर औंधे मुंह गिरा पड़ा नज़र आ जाता हैं। हम तरक्की कर रहे हैं। पहले बस में धक्के खाते थे और अब झट से मैट्रो से उड़कर ऑफ़िस पहुंच जाते हैं। लेकिन, सड़क से आसमान तक पहुंच जाने के बाद भी क्या आम आदमी की हालत में कुछ सुधार आया है। मेरा ऑफ़िस जहांगीरपुरी के पास है और इस इलाक़े में मज़दूरों की संख्या शायद सबसे ज़्यादा है। दिनभर मंडी में बदन तोड़ मेहनत करने पर शाम को मिलता है इन्हें कुछ दस या बीस रुपए। ऐसे में ये लोग इस बीस रुपए का खाना नहीं खाते बल्कि दस रुपए की बचत करते हुए नशा कर लेते हैं। खाना खाते ही कुछ देर में पच जाएगा लेकिन नशा घंटों तक बेसुध रखेगा। तब न भूख लगेगी न प्यास। भूख इंसान से जो कराएं वो कम। रोज़ाना सड़कों के किनारे और कभी-कभी बीच में पड़े इन लोगों को देख चार साल पुरानी यादें ताज़ा हो जाती हैं। कॉलेज में डॉक्यूमेन्ट्री बनाना कोर्स का हिस्सा थी। ऐसे में मैंने स्टेशनों और गंदी बस्तियों में रहनेवाले नशेड़ी बच्चों को अपना विषय बनाया था। पहले दिन जब अपना कैमरा उठाए में पुराने भोपाल के एक एनजीओ शेल्टर होम में गया तो वहाँ का नज़ारा मेरे लिए बिल्कुल अलग था। फटे पुराने और गंदे कपड़ों में छोटे-छोट बच्चे इधर-उधर खेल रहे थे। कुछ गाना गा रहे थे कुछ पढ़ रहे थे, तो कुछ बस यूँ ही शून्य को निहार रहे थे। वहाँ काम करनेवालों ने बताया हम यूँ ही रोज़ाना यहाँ आते हैं और सुबह से शाम तक बैठे रहते हैं। जैसे ही बच्चे आते हैं हम उनकी मदद के लिए तैयार हो जाते हैं। कुछ एक बच्चे तो ऐसे होते है जो इतना भयंकर नशा करते हैं कि उन्हें संभालना ही सबसे बड़ी चुनौती होती हैं। उन्होंने बताया कि पहले वो बस्तियों में जाकर ऐसे बच्चों को यहाँ लाते थे लेकिन, इनके माँ-बाप ही इन्हें ऐसे रखना चाहते हैं ऐसे में वो इन्हें लाने नहीं देते थे। ये जानकर बहुत दुख हुआ और हैरानी भी की माँ-बाप ख़ुद ही बच्चों को नर्क में डाल देते हैं। अगर वो पाल नहीं पाते हैं तो वो उन्हें पैदा ही क्यों करते हैं। खैर, ऐसे बच्चों को कैमरे क़ैद किया और कइयों से बात की। इस गंदगी और नशे की दुनिया में लिप्त इन बच्चों में ज़िंदा बचपना देख लगाकि कितना क्रूर भी हो सकता है भाग्य। इसके बाद में अपना कैमरे लिए पहुंच गया स्टेशन के आसपास पड़े कूड़े के ढ़ेरों पर। हाथों में सूलोशन से भीगे कपड़े थामे देखा एक सुन्दर भविष्य के विकृत होते स्वरुप को। आगे बढ़ता गया और देखता गया कि कैसे इंसान की ज़िंदगी किसी गंदी नाली में पड़े कीड़े से भी बदतर हो सकती है। आज जब देश की राजधानी में पड़े इन नशेड़ियों को देखता हूँ तो लगता है कि इनका बचपन भी कुछ ऐसे ही बीता होगा। अपने ज़िंदा माँ बाप की इन नाजायज़ औलादों का कोख में ही मर जाना शायद बेहतर होता हैं। इन लोगों के लिए ये दुनिया ख़ूबसूरत नहीं बल्कि सज़ा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-5913408905369168513?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/5913408905369168513/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=5913408905369168513' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5913408905369168513'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5913408905369168513'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='नशे की दुनिया'/><author><name>Bhuwan</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4071685877900431580</id><published>2010-02-25T22:05:00.000-08:00</published><updated>2010-02-25T22:08:24.826-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>ताजनगर के लोग- हिम्मत और संयम की मिसाल</title><content type='html'>गुड़गांव जिले का एक गांव ताजनगर। एक ऐसा गांव जिसके बारे में गुड़गांव शहर में रहनेवाले लोग ही बहुत कम जानते हैं। कुछ दिनों पहले अख़बार में ख़बर पढ़ी कि गांववालों ने वहाँ ख़ुद ही एक रेल्वे स्टेशन बना लिया है। ख़बर कुछ ऐसी थी कि मेरे साप्ताहिक कार्यक्रम के लिए एक दम सटीक लगी। इसके बारे में कुछ शुरुआती जानकारी जुटाई और निकल पड़े हम उसकी कहानी कैमरे के ज़रिए लोगों तक पहुंचाने के लिए। गुड़गांव तक का सफ़र तो आसान था लेकिन इसके बाद शुरु हुई परेशानी। किसी को मालूम ही नहीं कि कहाँ ये गांव। फिर भी जब हम आगे बढ़े तो लोगों के मुंह से इस गांव का नाम सुनकर लगाकि हाँ सही रास्ते पर हैं हम। थोड़े और नज़दीक जाने पर लोगों के मुंह स्टेशन की तारीफ़ें भी सुनने को मिलने लगी। जैसे ही हमारी गाड़ी उस खुले स्टेशन तक पहुंची सामने से एक ट्रेन आती नज़र आई। बस मेरे कैमरामैन भागे उसे कैप्चर करने के लिए। फिर शुरु हुई मेरी ज़िंदगी की एक अनोखी रिपोर्ट की शूट। गांववाले हमारे वहाँ आने से अति उत्साहित थे। एक बुज़ुर्ग हरियाणवी सज्जन ने मेरे बिना पूछे ही सारी कहानी सुनाना शुरु कर दी। टीवीवालों से वो भी थोड़ा बहुत रू-ब-रू हो चुके थे। स्टेशन के उद्घाटन के दिन सासंदजी आएं थे तो कुछ टीवीवाले भी साथ थे। एक के बाद एक कई बुज़ुर्गों ने मुझे वहाँ घेर लिया हरेक के पास एक कहानी थी। उनमें से एक को भी कहीं न जाना था। लेकिन, 30 साल के इंतज़ार और कड़ी मेहनत से बने उनके इस स्टेशन को वो यूँ बैठे निहारते रहते हैं। उन्होंने बताना शुरु किया कि कैसे दिल्ली के इतने क़रीब होने पर भी उन्हें वहाँ तक पहुंचने में कितनी तकलीफ़ होती थी। कैसे एक गांव से दूसरे गांव तक जाने में उन्हें दो से तीन घंटे लग जाते थे। वो कई बार सरकार से एक स्टेशन की गुहार लगा चुके थे। आसपास के गांवों के स्टेशन लगभग दस किलोमीचर की परिधि में ही है यहीं वजह थी कि उनका स्टेशन नहीं बन पा रहा था। सरकार से निराश गांववालों ने एक बार फिर लालू प्रसाद के रेलमंत्री बनने पर उनसे गुहार लगाई और रेलमंत्री ने बस इतना कहा कि बनाओ स्टेशन बस मुनाफ़ा होना चाहिए। इसके बाद गांववालों ने इंजीनियर्स की देखरेख में अपने पैसे और श्रम से स्टेशन बनाना शुरु किया। किसी ने तीन हज़ार दिए तो किसी ने तीन लाख़। इससे भी बढ़कर लोगों ने अपना समय और श्रम इस स्टेशन को दिया। और, पाँच जनवरी दो हज़ार दस याने कि आज़ादी के कुछ त्रैंसठ साल बाद ताजनगर में रूकी पहली ट्रैन। इसके बाद से अब यहाँ कुल सोलह लोकल ट्रैन रूकती हैं। भले ही कुछ सेंकेड के लिए लेकिन रूकती है। यहाँ के लोगों के चेहरे की खुशी आपको भी खुश कर दे। बुज़ुर्गों की झुर्रियों के बीच में खुशी एक दम घुली हुई आप देख सकते हैं। मैं वहाँ दिन भर रही। एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक गए फिर वही वापस आए। पूरे समय वो बुज़ुर्गों की टोली हमारे साथ थी। सच इतने सालों के इंतज़ार और मेहनत के बाद अगर आपको वो मिल जाए जिसका इंतज़ार था तो शायद ऐसा ही हाल होता होगा। एक बुज़ुर्ग ने हमें बताया कि गांव के पुरुषों को लगता था कि अगर स्टेशन बन गया तो हमारी बीवियाँ हमसे रूठकर मायके चली जाया करेंगी तो वो यहाँ स्टेशन नहीं चाहते थे। ये सुनकर हम सभी खूब हमें। ताजनगर दिल्ली के इतने पास है फिर भी शहर और शहरी दांव पेंचों से एक दम जुदा है। गांव के लोगों को प्यार और स्नेह देखकर लगा कि सच में आज भी मासूमियत और मेहनत ज़िंदा हैं। मैं के शहरों के आसपास आज भी हम के गांव मज़बूती से खड़े हुए हैं। आखिर में वो कविता जोकि मैंने अपने एंकर में इस्तेमाल की है। ये कविता मेरे पापा (श्री राजा दुबे) ने लिखी है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;हाथ में हाथ और हिम्मत साथ हो तो&lt;br /&gt;कोई पत्थर नहीं जो हिल ना सकें&lt;br /&gt;हौसलें गर बुलंद हो तो&lt;br /&gt;कोई मंज़िल नहीं जो मिल न सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिम्मतवाले ही आगे बढ़ पाते हैं&lt;br /&gt;कठिन काम को वो आसान बनाते हैं&lt;br /&gt;संकल्पों के धनी कहां रुकते हैं बीच में&lt;br /&gt;वो तो मंज़िल पाकर ही हर्षाते हैं।&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4071685877900431580?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4071685877900431580/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4071685877900431580' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4071685877900431580'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4071685877900431580'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/02/blog-post_25.html' title='ताजनगर के लोग- हिम्मत और संयम की मिसाल'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4229723887669626542</id><published>2010-02-17T23:05:00.000-08:00</published><updated>2010-02-17T23:06:04.077-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ अलग'/><title type='text'>बिंदास होने के मायने...</title><content type='html'>आजकल मैट्रो स्टेशन्स पर चारों ओर बिंदास टीवी के विज्ञापन नज़र आ रहे हैं। इन विज्ञापनों में कुछ आधुनिक सोचवाले युवा अपने बिंदास होने का अर्थ समझा रहे हैं। वो बता रहे हैं कि मैं बिंदास हूँ इसका मतलब ये नहीं कि मैं ड्रग्स लेता हूँ या फिर मैं भगवान में विश्वास नहीं रखती। आधुनिक सोचवाले युवा का इस्तेमाल इसलिए क्योंकि ऐसे भी कई युवा मौजूद है जो है तो युवा लेकिन उनकी सोच पुरानी ही है। खैर, ये विज्ञापन आपको एक मिनिट ऐसे युवाओं के बारे में सोचने के लिए मज़बूर करते हैं। आसपास खड़े ऐसे ही कुछ ढ़ीली जींस पहने हुए और बाल बिखराएं हुए युवाओं को ध्यान से देखने पर मज़बूर करते हैं। पिछले ही दिनों एक न्यूज़ चैनल पर मैंने चैनल वी के दो वीजे का इन्टरव्यू देखा। लंदन से भारत ये दोनों युवा अपने हिसाब से जीते हैं और अपने हिसाब से देश और उसकी समस्याओं को देखते हैं। उन्हें इस बात से भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन उनके बारे में क्या कहता हैं। दरअसल हरेक इंसान अपने हिसाब से जीना चाहता हैं लेकिन, हरेक में ऐसे रहने का माद्दा नहीं होता हैं। कोई समाज से डरता हैं तो कोई परिवार से तो कोई अस्वीकार हो जाने से डरता हैं। ऐसे में हम अंदर से कितने भी बिंदास क्यों न हो हम बाहरी रूप में बहुत सामाजिक होते हैं। बिंदास के ये विज्ञापन आपको अपने अंदर झांकने का एक मौक़ा दे रहे हैं। ज़रा एक बार रूककर सोचिए कि क्या आप भी बिंदास हैं...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4229723887669626542?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4229723887669626542/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4229723887669626542' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4229723887669626542'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4229723887669626542'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/02/blog-post_17.html' title='बिंदास होने के मायने...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-2448223456758771602</id><published>2010-02-12T03:08:00.000-08:00</published><updated>2010-02-12T03:09:20.517-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ अलग'/><title type='text'>अति सामाजिक होना मेरे बस की बात नहीं...</title><content type='html'>मैं आजकल कुछ परेशान हूँ। मुफ़्त में मिल रही सुविधाओं से। आज सुबह ही गुगल की नई नेटवर्किंग साइट बज़्ज़ के बारे में सुना तो लगाकि अब लोग इसमें भी जुटेंगे। लेकिन, आज इस बज़्ज़ को जब मैंने मेरे जीमेल खाते में देखा तो कुछ हैंरान हुई। फिर जब उसे खोला तो मालूम चलाकि मैं भी इसकी सदस्य हूँ और लगभग पचास लोगों को फ़ॉलो भी कर रही हूँ। मैं हैरान हो गई। मुझे लगा कि ये क्या हुआ। मुफ़्त में खाते खोलना मुझे ग़लत लगा। अरे, मुझसे तो पूछा होता। खैर, ये बात सिर्फ़ यही तक सीमित कहाँ। फेसबुक पर भी ऐसा ही कुछ है। झट से आपके खेल के स्कोर दूसरे को चैलेन्ज करने पहुंच जाते हैं और पता नहीं किस-किस को खेलने के लिए उकसा आते हैं। ऑर्कुट में एकदिन अचानक से ही आपको मालूम चलता हैं कि आप के पास एक चैट लिस्ट भी है। माना कि ये सभी मुफ़्त में हमें कई सुविधाएं दे रही हैं लेकिन, इसका अर्थ ये तो नहीं हुआ कि हमसे बिना पूछे ही ये हमारे खाते संचालित करने लगे। इस तरह के मामलों में मैं कुछ कच्ची हूँ। सोशल वेब साइट की सदस्य होने के बावजूद भी बेहद अनसोशल हूँ। मेरी ही तरह और भी कई लोग हैं जोकि इन सामाजिक सरोकारवाली तक़नीक़ का असल चेहरा देख नहीं पाते हैं। मुझे रोज़ाना चार से पाँच मेल आते हैं कि फलां इंसान आपको ढ़िंमका साइट पर देखना चाहता हैं तो फलां तलां पर... इन मेल्स को डिलीट करने पर दूसरे दिन रिमान्डर भी आता हैं और फिर एक धमकी कि, देख लो नहीं तो आप एक्सपायर हो जाएगे (मतलब मरने से नहीं बल्कि खाते के बंद होने से है। ये वो खाता है जो आपने नहीं आपके एवज में उस साइट ने स्वयम् ही खोल दिया है।)&lt;br /&gt;मैं इस इन्टरनेट के मेरी निजी ज़िंदगी (या फिर ये कहे कि मेरे निजी मेल अकाउन्ट) में दखल से बेहद परेशान हूँ। कई बार तो इन साइट्स ने मुझे के पीछे लगा दिया जिनसे मेरी लड़ाई तक हो चुकी है। या फिर ऐसे को मेरी तरफ से जन्मदिन की बधाई चली गई जिससे अपनी मर्ज़ी से बात बंद की थी। ये अंतरजाल की जबरिया दोस्ती मेरे लिए एक बहुत ही बड़ी उलझन हैं और साथ ही लोगों का इसके प्रति उत्साह दूसरी तरह की परेशानी का सबब...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-2448223456758771602?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/2448223456758771602/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=2448223456758771602' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2448223456758771602'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2448223456758771602'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='अति सामाजिक होना मेरे बस की बात नहीं...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-801946331730003067</id><published>2010-01-25T03:13:00.000-08:00</published><updated>2010-01-25T03:14:33.682-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>बंदर और इंसान सब परेशान...</title><content type='html'>पिछले दिनों मैं एक स्टोरी पर काम कर रही थी। स्टोरी थी- दिल्ली के सरकारी ऑफ़िसों में हड़कंप मचानेवाले बंदरों को डराने के लिए नौकरी पर रखे गए लंगूरों पर। दरअसल लंगूरों को सरकार ने नौकरी पर रख लिया। हर महीने एक बंधी बंधाई तनख्वाह मिलती हैं और उनका काम होता है बंदरों को डराकर भगाने का। लंगूर अपने मालिक के साथ आता हैं। जैसे ही कही बंदर घूस आते हैं लंगूर के मालिक को मोबाइल पर फोन कर दिया जाता हैं और वो झट से बंदर लेकर आ जाता हैं। जिस लंगूर से मैं मिली वो था- राजा। कैमरे की तरफ देखता ही नहीं था वो। मालिक के साथ बाइक पर बैठकर आता था और गुड़ मुगंफली की चिक्की मन लगाकर खाता था। स्टोरी के लिए जब इन्टरव्यू लेने की बात हुई तो मैं मिली इक़बाल मलिक से। उनसे बातचीत में मालूम चलाकि दिल्ली के भाटी माइन्स में रोज़ाना सरकारी गाड़ी ऐसे उत्पाती बंदरों को छोड़कर आती हैं। मन बनाया वहाँ जाने का। जाकर देखा तो इंसान और बंदर दोनों की ही हालत खराब हैं। बंदर ठंड में और उस अंजान जगह में बीमार पड़े हैं। दरअसल उस खुली जगह में भी उनके हिसाब के पेड़-पौधे और पानी नहीं हैं। खाना नहीं होने की वजह से वो बाहर निकलकर पास के भाटी गांव में आ जाते हैं। वहाँ इंसानों के घरों में घुस जाते हैं, खाना खा लेते हैं और बच्चों को काट लेते हैं। ऐसे में वो भी परेशान हैं। इसी विषय पर मेरा कल का कार्यक्रम है। अगर मौक़ा मिले तो ज़रूर देखें लोकसभा टीवी पर रात साढ़े आठ बजे। देखें कि कैसे बंदरों से परेशान इंसानों ने खु़द को बचाने के लिए बंदरों के साथ-साथ कुछ इंसानों को भी परेशानी में डाल दिया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-801946331730003067?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/801946331730003067/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=801946331730003067' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/801946331730003067'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/801946331730003067'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/01/blog-post_25.html' title='बंदर और इंसान सब परेशान...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4612119990880799108</id><published>2010-01-22T21:56:00.001-08:00</published><updated>2010-01-22T21:56:59.724-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>आसपास की कोई ख़बर नहीं...</title><content type='html'>मेरी एक सहकर्मी ने कुछ ही दिनों पहले शादी हुई है। वो क्रिश्चन है। उसने शादी एक बिहारी कायस्थ से की है। कल यूँ ही मेरी उससे बात हुई। मैंने पूछा कि ससुराल में निभाना मुश्किल लग रहा होगा। उसने हंसकर जवाब दिया बिल्कुल नहीं। इसके बाद उसने अपने परिवार का इतिहास बताया कि उसके परिवार में सभी ने अपनी पसंद से शादी की हैं। उसके परिवार में हर जाति और धर्म के सदस्य हैं। ये बात सुनकर मुझे बहुत ही अच्छा लगा। उसने बताया कि कैसे उसकी क्रिश्चन माँ धन तेरस पर बर्तन खरीदती हैं या फिर वो कैसे अपनी बंगाली मौसी के ससुराल में दुर्गा पूजा के लिए जाते हैं। ज़रा सोचिए कि एक ऐसा परिवार जहाँ आपको साल की पहली तारीख से लेकर आखिरी तक त्यौहारों को मनाने का मौक़ा मिलें। जहाँ सिर्फ़ होली या दीवाली ही नहीं बल्कि ईद और क्रिसमस का भी इतंज़ार रहे। उसके परिवार के बारे में सुनने के बाद से ही मैं यही सोच रही हूँ कि वो कितनी भाग्यशाली है कि एक ही जन्म में उसे इतने सारे धर्मों, त्यौहारों और रीति-रिवाज़ों को मनाने का मौक़ा मिल गया। अगर मैं अपने ही घर की बात करूं तो मेरे घर में भी त्यौहार तो कई मनते हैं लेकिन, सिर्फ़ वही जिनसे हमारी धार्मिक आस्थाएं जुड़ी हैं। इसके अलावा और कोई त्यौहार हमने कभी नहीं मनाया। इतना ही नहीं कभी किसी दूसरे धर्म के दोस्त के साथ उसके त्यौहार भी नहीं मनाए। सच तो ये है कि कभी दिमाग में ही नहीं आया कि गुरुपर्व के दिन किसी गुरुद्वारे में जाया या फिर किसी रविवार को चर्च। ऐसा न करने का अफसोस इसलिए क्योंकि अपने ही देश, अपनी ही संस्कृति से जुड़ी कितनी ही बातें मैं आजतक नहीं जान पाई हूँ। अब मैं जब भी मेरी सहकर्मी को देखती हूँ मुझे बहुत अच्छा लगता है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4612119990880799108?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4612119990880799108/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4612119990880799108' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4612119990880799108'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4612119990880799108'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html' title='आसपास की कोई ख़बर नहीं...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-6988671578632501476</id><published>2010-01-19T23:27:00.000-08:00</published><updated>2010-01-19T23:28:23.518-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><title type='text'>काली पन्नी...</title><content type='html'>काले रंग का सबसे बढ़िया इस्तेमाल शायद छुपाने में होता है। अंधेरे में आप कुछ भी कर सकते हैं। कार के शीशों पर काली फ़िल्म भी इसीलिए चढ़ाई जाती है। घरों में भी ऐसे ही शीशे काम आते हैं। और, ऐसी ही होती है काली पन्नियाँ। दबी छुपी चीज़ों की खरीददारी में सबसे ज़्यादा काम आनेवाली। सामान्यतः ये पन्नियाँ डस्टबीन पॉलिथीन के रूप में काम आती हैं। माने कि कचरा इसमें भरिए और फिर फेंकने जाईए। आपके घर की गंदगी को कोई और न देख पाएं। मेरे एक मित्र है उनके हाथ में हर छुट्टी के दिन काली पन्नी होती हैं। दरअसल वो चिकन लेकर आते हैं। जोकि दुकानदार हमेशा काली पन्नी में ही देता हैं। अब मुझे ये नहीं मालूम की वो ऐसा क्यों करता हैं। ऐसे ही कल मुझे मेडिकल स्टोरवाले ने काली पन्नी पकड़ाई। मैं वहाँ सैनेटरी नेपकिन लेने गई थी। दुकानदार ने बहुत दबे छुपे अंदाज़ में उसे नीचे रखकर काली पन्नी में पैक किया और फिर मुझे दिया। मुझे ये बात हमेशा से ही अखरती है कि आखिर ऐसा क्यों। मैंने कई बार अपनी दोस्तों को दबे छुपे अंदाज़ में नैपकिन खरीदते देखा हैं। दुकान पर जाते ही कई बार वो अंकलजी से पूछती है कि अंटी कहाँ हैं। अंकल भी झट से समझ जाते हैं और अंटी को भेज देते हैं। आखिर नैपकिन जो खरीदना हैं। हमारे समाज ऐसी कई बातें हैं जोकि आज भी छुप-छुप के होती हैं। नैपकिन का एड आते ही मम्मी का चैनल बदल देता आज भी कायम हैं। मैं हमेशा से ही इस बात का विरोध करती रही हूँ। लेकिन, हर बार मुझे चुप करा दिया जाता है। मेरे मुताबिक़ इस तरह से हम काले रंग का दुरुपयोग करते हैं। इस तरह की बातों को छुपाने के पीछे का अर्थ मेरी समझ से परे हैं। आखिर इसमें ऐसा क्या है जो प्राकृतिक नहीं हैं। या फिर ऐसी क्या है जिस बात पर शर्मिंदा हुआ जाए...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-6988671578632501476?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/6988671578632501476/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=6988671578632501476' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6988671578632501476'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6988671578632501476'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/01/blog-post_19.html' title='काली पन्नी...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-7188920580336556754</id><published>2010-01-19T01:14:00.000-08:00</published><updated>2010-01-19T01:16:39.477-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ अलग'/><title type='text'>पर्वतारोहियों को नज़दीक से समझे...</title><content type='html'>पिछले कुछ दिनों से मेरी तबीयत बहुत खराब थी। पहले ठंड लग गई, फिर आखों में इन्फ़ेक्शन हो गया और फिर एक आंख में हैमरेज़ हो गया। इन सभी कारण से मैं ब्लॉगिंग से दूर रही लेकिन, ऑफ़िस लगातार आती थी और काम भी उसी गति से चलता रहा। मुझे दिल्ली की इस ठंड ने अंदर तक हिलाकर रखा है। मुझसे ये ठंड बिल्कुल सहन नहीं हो रही है। ऐसी ही बीमारी में मैं पिछले दिनों एक ऐसी जगह शूट पर गई जहाँ जाकर मेरे अंदर की ठंड और बढ़ गई। ये जगह थी - माउन्टनियरिंग म्यूज़ियम। दिल्ली के बीचों-बीच ऐसी शांत जगह कि कल्पना शायद ही किसी ने की हो। इस म्यूज़ियम में पर्वतारोहण से जुड़ी हर चीज़ मौजूद हैं। हमारे देश में कब कौन किस पर्वत पर चढ़ा, कितनी बार चढ़ा, कैसे चढ़ा सब यहाँ आकर मालूम चल जाता है। ये म्यूज़ियम अपने आप में बेहतरीन हैं। यहाँ कई तरह की जानकारियाँ मौजूद हैं। नक्शे हैं, वो उपकरण हैं जो कि पर्वतारोहियों ने इस्तेमाल किए हैं और साथ ही पर्वतों से जुड़ी सारी कहानियाँ तस्वीरों से बयां हैं। यहाँ एवरेस्ट के नामकरण से लेकर फूलों की घाटी को खोज तक को समझा जा सकता हैं। दिल्ली की व्यस्त ज़िंदगी के बीच अगर आपको पर्वतों से प्यार है तो आप भी यहाँ ज़रूर जाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-7188920580336556754?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/7188920580336556754/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=7188920580336556754' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7188920580336556754'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7188920580336556754'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='पर्वतारोहियों को नज़दीक से समझे...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-8611225393440063808</id><published>2009-12-26T02:31:00.000-08:00</published><updated>2009-12-26T02:32:13.389-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोगलापन...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>क्या हैं हमारी असल सोच...</title><content type='html'>एक लड़का अगर ये कहे कि मैं अपने माँ-बाप की मर्ज़ी से शादी करूंगा तो पूरा समाज उसकी तारीफ करता हैं। अगर, वही ये कह दे कि अपनी मर्ज़ी से करूंगा तो हरेक के मन में एक खटास आ जाती हैं। मैं बहुत समय से इस बात से जूझ रही हूँ कि क्या सही और क्या ग़लत। कुछ दिन पहले ही एक सहकर्मी ने बातों-बातों में कहा कि शादी तो मैं अपनी मर्ज़ी से ही करूंगी। हर काम माँ-बाप की मर्ज़ी से किया इतना तो स्वार्थी हुआ ही जा सकता हैं। दूसरी तरफ आज एक ऐसी पोस्ट पढ़ी जिसमें युवा बच्चों की माँ इस बात से संतुष्ट नज़र आई कि उसके बेटे लड़कियों के साथ नहीं घूमते या फिर वो अरैंज मैरिज करेंगे। इस सबके बीच एक धारावाहिक का आना जिसमें ब्राह्मण के बेटे और कायस्थ की बेटी के प्रेम को ज़ोर शोर से दिखाया जा रहा हैं। मैं उलझन में हूँ कि असल में सही क्या है। खई बार मैंने सुना है कि भई वो तो बच गए। उनके तो सभी बच्चों ने माँ-बाप की मर्ज़ी से शादी की हैं। माँ-बाप बच्चों की शादी तक दम साधे बैठे रहते हैं कि क्या होगा। क्या अपनी मर्ज़ी से जीवन साथी चुनना इतना ग़लत हैं। क्या अपनी मर्ज़ी से जीवनसाथी चुनना स्वार्थ है। क्या माँ-बाप का अपनी मर्ज़ी थोपना स्वार्थ नहीं है। मेरी दोस्त की बड़ी बहन के लिए कई सालों से लड़का खोजा जा रहा है। वो एक एमएनसी में काम करती हैं और अकेले रहती हैं। लेकिन, न तो उनका कोई अफेयर है और ना ही वो किसी से शादी करना चाहती हैं। ऐसे में उनके माता-पिता लड़का खोज रहे हैं लेकिन, उनके समाज (जाति) में उनके स्तर का लड़का नहीं मिल रहा हैं। अब जाति के बाहर लड़का खोज रहे हैं। हो सकता हैं उनकी शादी जाति के बाहर हो माँ-बाप की मर्ज़ी से। ये बात मेरी मम्मी को भी सही लगी। लेकिन, अगर वो ख़ुद अपनी मर्ज़ी से अगर जाति के बाहर शादी कर लेती तो वो ग़लत हो जाता हैं। आखिर में क्या है सही और क्या है ग़लत। हम क्या करना चाहते हैं हमारी सोच क्या हैं असल में...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-8611225393440063808?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/8611225393440063808/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=8611225393440063808' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8611225393440063808'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8611225393440063808'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/12/blog-post_26.html' title='क्या हैं हमारी असल सोच...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-8109101261351335918</id><published>2009-12-21T03:44:00.000-08:00</published><updated>2009-12-21T03:45:58.839-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फ़िल्मी चक्कर...'/><title type='text'>फ़ोटो के ज़रिए सिनेमा का नया रूप...</title><content type='html'>फोटो। दस या ग्यारह साल का एक बच्चा जोकि बाकी बच्चों की ही तरह स्कूल जाता है। घर भी सामान्य घरों-सा ही है उसका। फिर भी वो अलग था। वो कुछ अलग करना चाहता था। उसकी एक सोच थी जोकि ओरों से अलग थी। वो सोचता था कि कैसे बनती हैं फ़िल्में। कैसे दिन से रात और रात से दिन हो जाता हैं। फोटो ने जानना चाहा कि फ़िल्मों की शुरुआत कैसे हुई। उसे इन बातों का जवाब मिला उसकी सोच से और खोज से। उसकी सोच में उसका एक साथी था। वो उसे उकसाता था कि वो पढे़ और खोजे कि कब, कैसे और कहाँ हुई फ़िल्मों की शुरुआत। और, बड़ा होकर फोटो बन जाता है ख़ुद एक निर्देशक। फोटो नाम है एक फिल्म का जोकि मैंने इस शनिवार को देखी। लोकसभा टीवी हर शनिवार को राष्ट्रीय अवॉर्ड से सम्मानित एक फिल्म दिखाता हैं। ये फ़िल्म वो बिना किसी एड ब्रैक के दिखाता हैं। फिलहाल वीक एंड क्लासिक के नाम से दिखाई जानेवाली इस सीरीज़ में बच्चों की फ़िल्में दिखाई जा रही हैं। इसी का हिस्सा थी ये फ़िल्म- फ़ोटो। मुझे लगता है कि ये फ़िल्म ज़्यादा लोगों ने नहीं देखी होगी। लेकिन, इसे आप ज़रूर देखें। ख़ासकर बच्चों को ये फ़िल्म ज़रूर दिखाए। इस फ़िल्म के ज़रिए बच्चे समझ पाएंगे सिनेमा के मायने और अगर आपको लगता हैं कि सिनेमा बेकार हैं तो आपको भी देखना चाहिए ये फ़िल्म। आप भी जानेंगे कि सिनेमा भी कला हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-8109101261351335918?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/8109101261351335918/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=8109101261351335918' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8109101261351335918'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8109101261351335918'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/12/blog-post_21.html' title='फ़ोटो के ज़रिए सिनेमा का नया रूप...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-3981443796436706006</id><published>2009-12-17T00:10:00.000-08:00</published><updated>2009-12-17T00:11:29.292-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><title type='text'>लड़की हो तो ग़लती तुम्हारी...</title><content type='html'>आज सुबह-सुबह टीवी ऑन करते ही अरूणा के बारे में ख़बर देखी। अरूणा मुंबई के एक अस्पताल में पिछले 36 साल से पड़ी हुई हैं। वो एक नर्स थी और वो जब चौबीस साल की थी अस्पताल के ही एक वार्ड बॉय ने उसके साथ बलात्कार किया था। तब से ही वो उसी अस्पताल के एक बेड पर पड़ी हुई है। 60 की हो चुकी अरूणा के लिए कुछ स्वयंसेवी सस्थाएं मौत मांग रही हैं। उनका कहना है कि उसे जबरन में खाना खिलाना बंद कर देना चाहिए जिससे कि वो एक शांत मौत मर सकें। बलात्कार के उस आरोपी को सात साल की सज़ा हो चुकी हैं जिसे वो भुगत भी चुका हैं। लेकिन, असल सज़ा तो अरूणा भुगत रही है। जिस पर अत्याचार हुआ वही उस अत्याचार की सज़ा भी भोग रही हैं। अरूणा की कहानी दिल को हिला देनेवाली है। लेकिन, वो अकेली नहीं है। लड़कियों के साथ होनेवाले अपराधों पर अगर एक नज़र डाले तो यही मिलेगा कि आरोपी से ज़्यादा उसकी शिकार हुई महिला भोगती हैं। और, इस सबके बाद सुनने को मिलते हैं कुछ बयान जैसे कि लड़की का बलात्कार जिसने किया वो उसका दोस्त था तो ग़लती उसकी भी हैं या फिर एक लड़की रात के दो बजे दिल्ली की सड़क पर क्यों ड्राइव कर रही थी। अरूणा सुन्दर थी। काम काज में। हरेक से अच्छे से बात करती थी। अब ये उसकी ही ग़लती थी कि उसमें ये गुण थे कि वो आकर्षित करें। लेकिन, वो उतनी भी आकर्षक नहीं थी कि इस घटना के बाद भी उसके घरवाले उसका साथ निभाते या वो लड़का उसके साथ रहता जो उससे शादी करनेवाला था। ग़लती सिर्फ़ लड़कियों की होती हैं। उनके साथ कोई भी गुनाह हो ग़लती उनकी ही होती हैं। वो ग़लती है कि वो लड़की है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-3981443796436706006?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/3981443796436706006/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=3981443796436706006' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3981443796436706006'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3981443796436706006'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/12/blog-post_17.html' title='लड़की हो तो ग़लती तुम्हारी...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-2502922399069695778</id><published>2009-12-12T02:07:00.000-08:00</published><updated>2009-12-12T02:09:08.277-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फ़िल्मी चक्कर...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शुरुआत'/><title type='text'>काली राजकुमारी...</title><content type='html'>बात कुछ पुरानी है। मेरे मामा की बेटी गर्भवती थी। एक दिन मेरे पापा ने सपना देखा कि वो अस्पताल में हैं और सभी लोग बच्चे के जन्म की खुशी मना रहे हैं। पापा ने ये बात जब मेरी मामी को बताई तो मामी का सवाल था- बच्चा दामादजी जैसा ही लग रहा था ना। ये सवाल इसलिए क्योंकि वो ज़्यादा सुन्दर और गोरे है। ऐसे ही मेरी नानी एक बार हमारे साथ मिस इंडिया प्रतियोगिता देख रही थी। वो उसे देख बहुत मायूस हुई उनका कहना था कि इसमें से एक भी लड़की गोरी नहीं हैं। सभी सांवली या दबे रंगवाली ही हैं। ये है हमारे इस समाज की सोच। पहले तो ये गोरा रंग लड़कियों के लिए सुन्दरता का पैमाना था लेकिन, आज तो लड़के भी टॉल, डार्क और हैन्डसम की जगह फ़ेयर और हैन्डसम होना चाहते हैं। मेरे घर के पास रहनेवाली 5 साल की बच्ची को भी ये बात मालूम है कि सांवली है और उसकी 2 साल की बहन गोरी। वो कई बार ये बोल चुकी हैं कि मैं तो गंदी लगती हूँ। ये है हमारा समाज। खैर, कई सालों तक मैं भी इसी काम्प्लैक्स में जी चुकी हूँ। मेरे घर में मेरा रंग ही दबा हुआ है बाक़ी सब गोरे है खा़सकर पापा। मैं कई बार उनसे इस बात पर लड़ाई भी कर चुकी हूँ कि जब मैं आप सी दिखाई देती हूँ तो आप सी गोरी क्यों नहीं हूँ। लेकिन, आज मैं इस बारे नहीं सोचती हूँ। गोरेपन का पैमाना तय करनेवाली सिनेमा भी अब इससे ऊपर उठ रही हैं और परिवर्तन की इसी बयार में शामिल हुआ है- वॉल्ट डिज़नी। अपनी नई फ़िल्म दि प्रिन्सेस एण्ड दि फ़्राग के ज़रिए पहली बार एक अश्वेत राजकुमारी दर्शकों के सामने होगी। ये फ़िल्म मुझे इसलिए दिलचस्प लग रही है क्योंकि इसे बच्चे देखेंगे। बच्चों का मन सबसे कोमल होता हैं। इस उम्र में जो बात बैठ गई वो हमेशा बनी रहती हैं। उसे दूर करना बहुत मुश्किल होता हैं। ऐसे में अगर आज बच्चा ये देखेगा कि सुन्दरता का पैमाना रंग नहीं तो शायद ये एक अच्छी पहल साबित हो...&lt;div&gt;इस फ़िल्म का प्रोमो आप &lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=i2sfvJEbdRM"&gt;यहाँ&lt;/a&gt; देख सकते हैं...&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-2502922399069695778?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/2502922399069695778/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=2502922399069695778' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2502922399069695778'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2502922399069695778'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/12/blog-post_12.html' title='काली राजकुमारी...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-7942644411487195974</id><published>2009-12-11T02:33:00.000-08:00</published><updated>2009-12-11T02:35:42.667-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फ़िल्मी चक्कर...'/><title type='text'>इकोनोमी मील या हैप्पी मील...</title><content type='html'>रॉकेट सिंह देश के युवाओं के उस अस्सी फ़ीसदी हिस्से को दर्शाता है जोकि सपनों में भी किसी कंपनी में किसी ठीक-ठाक पोस्ट पर होने के सपने देखता हैं। वो पैसे जोड़ता भी है तो स्कूटर या बाइक के लिए। ऐसा ही था सिड- जोकि एमटीवीनुमा युवा को दर्शाता है। जोकि सपने देखते ही नहीं है दरअसल वो रातभर मस्ती में जो रहते हैं। दोनों ही एक ही देश में रहते हैं। एक ही हवा में कभी-कभी सांस लेते हैं (कभी-कभी इसलिए क्योंकि एसी की हवा अस्सी फ़ीसदी के हिस्से नहीं आती है)। मैक-डी में बर्गर भी दोनों ही खाते हैं भले ही एक इकोनामी मील खाए और दूसरा हैप्पी मील। खैर, मुद्दा ये है कि फ़िल्म एक ऐसा ज़रिया है जिससे कि हम दोनों ही तरह के युवाओं को देख सकते हैं। ये समझ सकते हैं कि हम कहाँ हैं और हम कैसे हैं। कुछ दिन पहले ही एक ख़बरिया चैनल पर रॉकेट सिंह के प्रमोशन के लिए इकठ्ठा हुए फिल्म से जुड़े लोगों का इंटरव्यू देखा। लेखक का ये दावा था कि ये उन अस्सी फ़ीसदी युवाओं के लिए हैं। ये फ़िल्म उन्हें अपनी सी लगेगी। रणबीर कपूर जोकि ख़ुद ओरिजनल नाइकी पहननेवाले हैं फिलहाल डुप्लीकेट नाइकीवाले बने हुए है। मैं ख़ुद इकोनोमी मील खानेवाली जमात में शामिल हूँ। मैं इस बात से खुश हूँ कि इस तरह की फिल्में बन रही है। नहीं तो हमारी सिनेमा या तो लंदन घूमनेवाले और कार में चलनेवाले यूथ की होती है या फिर धारावी की गंदगी में सने हुए लफंगों की। रॉकेट सिंह को देखकर मैं ये उम्मीद करती हूँ कि चश्मे बद्दूर के ओमी, बोजो और नेहा जैसे हम युवाओं की बदलती कहानी भी फिल्मवालों को भाने लगेगी। उम्मीद है फिल्म को अधिक से अधिक युवा देखेंगे। फिल्म महज मल्टीप्लैक्स के आंकड़ों में हिट होकर नहीं रह जाएगी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-7942644411487195974?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/7942644411487195974/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=7942644411487195974' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7942644411487195974'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7942644411487195974'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/12/blog-post_11.html' title='इकोनोमी मील या हैप्पी मील...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-3265451953943424895</id><published>2009-12-07T04:19:00.000-08:00</published><updated>2009-12-07T04:21:22.382-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>नियमों का पालन करनाः क्यों मज़ाक करते हो...</title><content type='html'>कभी-कभी सभ्य होना या फिर नियमों का पालन करना एक बोझ-सा लगता है। मैं आजकल मैट्रो से ऑफ़िस आती हूँ। अक्षरधाम मैट्रो स्टेशन तक पहुंचने के लिए एक लंबी चौड़ी व्यस्त सड़क को पार करना होता है। इसके लिए मैट्रो की तरफ से एक लोहे का फ़ुट ओवर ब्रिज बनाया गया है। इस फ़ुट ओवर ब्रिज पर कई बार मुझे लगता है मैं अकेली ही चढ़ती हूँ। ऊपर से जब नीचे देखती हूँ तो कई ऑफ़िस और कॉलेज जानेवाले सड़क को कूद-फांदकर पार करते दिखाई देते हैं। इसके बाद मैट्रो में कई ऐसी बातें होती देखती हूँ जिन्हें देख मन कचवा जाता है। आज सुबह ही लगभग 20 या 21 साल के एक लड़के से मैंने जबरन बात की। ये लड़का देखने में किसी दुकान या फिर ऑफ़िस में चपरासी या ऐसी ही कोई नौकरी करता होगा। लड़का ज़ोर-ज़ोर से मोबाइल पर गाने सुन रहा था। मेट्रो में संगीत बजाना मना है। क्योंकि, गाड़ी में लगातार वो सूचना देते रहते हैं जिसे सुनकर ही यात्रियों को आगे की सही जानकारी मिलती हैं। ऐसे में गाड़ी में जो़र से संगीत बजाना मना है। इसके बावजूद वो लड़का पूरे आराम से गाने सुन रहा था। लड़का बैठा हुआ था और मैं खड़ी। मैं बिल्कुल लड़के के आगे खड़ी हो गई और उसे घूरना शुरु कर दिया। लड़का कुछ परेशान होने लगा। मुझे लगा कि शायद वो अपनी ग़लती मेरे बिना कहे समझ जाएगा। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। वो कुछ असहज तो हुआ लेकिन, उसने अपने मोबाइल पर बज रहा वो गाना बंद नहीं किया। बाराखंबा आते-आते मुझे लगा कि राजीव चौक पर तो मैं उतर जाऊंगी और ये तो यूँ गाने बजाता रहेगा। फिर मैंने उस गर्दन ज़मीन में घुसाए हुए लड़के के कंधे पर हाथ रखा वो घबरा गया। मैंने उससे पूछा कि क्या आप मेट्रो में पहली बार चढ़े हैं। वो कुछ नहीं बोला। मैंने फिर वही सवाल किया। इस बार उसने कहा कि नहीं। तो मैंने कहा- तो क्या आपको ये मालूम नहीं कि यूँ मेट्रो में लाउडस्पीकर पर संगीत चलाना मना हैं। लोग इस गाड़ी में हो रही घोषणाओं को सुन रहे हैं उन्हें परेशानी होगी। आपके पास इतना महंगा और सुन्दर मोबाइल है तो इयरपीस भी होगा। वैसे भी वो तो मुफ़्त में मिलता है। आपको इतनी तो समझ होनी चाहिए। मैं बोलती रही और वो चुपचाप सुनता रहा। मेरा स्टॉप आ गया और मैं उतर गई। मैं परेशान हूँ ऐसे लोगों से जोकि एक समाज का हिस्सा होकर भी अकेले अपनी सोचते हैं। खैर, वो अकेला नहीं हैं उसकी पूरी एक जमात हैं। जोकि हम जैसे नियम माननेवालों से बड़ी है। इस जमात में फ़ुट ओवर की जगह सड़क कूदनेवाले, मेट्रो के फ़्लोर पर बैठनेवाले, संगीत सुननेवाले, उतरनेवालों को रास्ता ना देनेवाले और उन्हें धक्का देनेवाले, स्टेशन पर चुपचाप फ़ोटो खिंचनेवाले शामिल हैं। मेट्रो में चलनेवाले भले ही पढ़े-लिखे और कुछ एलीट लगे लेकिन, अंदर से वो भी बसों में आगे से चढ़नेवाले और स्टॉप के पहले या रेड पर चढ़ने-उतरनेवाले ही हैं...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-3265451953943424895?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/3265451953943424895/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=3265451953943424895' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3265451953943424895'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3265451953943424895'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/12/blog-post_07.html' title='नियमों का पालन करनाः क्यों मज़ाक करते हो...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-5149430786416309066</id><published>2009-12-05T00:24:00.000-08:00</published><updated>2009-12-05T00:25:22.678-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोगलापन...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>चौंचलेबाज़ी...</title><content type='html'>&lt;div&gt;आज सुबह-सुबह मैं अपनी कैमरा टीम के साथ यमुना किनारे गई। यमुना दिल्ली के अंदर बहनेवाली थी इसलिए अगर कोई बताता नहीं तो लगता कि कोई नाला बह रहा है। आज वर्ल्ड वॉलेन्टियर डे है। माने कि आप किसी अच्छे काम के लिए श्रमदान करें। यही वजह थी कि कुछ स्वयंसेवी संगठनों ने कुछ स्कूली और कॉलेज के बच्चों को इकठ्ठा किया था। यमुना की सफाई कर रहे ये लोग कुछ-कुछ अंग्रेज़ लग रहे थे। हालांकि वहाँ कुछ अंग्रेज़ भी मौजूद थे जिनसे मैने पूछा था कि इस सब क्या औचित्य। खैर, इन एडिडास और नाइकी पहने बच्चों को हावड़ा, ग्लवज़, रबर के जूते और टी-शर्ट सबकुछ दिया गया था। ये सभी यमुना के किनारों से गंदगी निकाल रहे थे और एक जगह इकठ्ठा कर रहे थे। कुछ भारतीय एनजीओ और ख़बरिया चैनलों के साथ कुछ अंग्रेज़ी एनजीओ की इस मुहिम में सरकारी स्कूल के और आश्रय सेन्टरों में रहनेवाले बच्चे भी आकर मिल गए थे। ऊपरी तौर पर ये पूरी मुहिम एक सार्थक प्रयास लग रही थी लेकिन, अंदर ही अंदर वहाँ मौजूद भारत में रहनेवाले और केवल अंग्रेज़ी बोलनेवाले और पहननेवालों को देखकर खोखलापन महसूस हो रहा था। आधे से ज़्यादा युवा वहाँ फ़ोटो खिंचावाने आए थे। कुछ वहाँ होनेवाले अंग्रेज़ी गानों के कॉन्सर्ट को सुनने के लिए रूके लग रहे थे। ये युवा पीढ़ी की वो जमात दिख रही थी जो घर में शायद ही कभी अपना कमरा साफ करती हो या फिर वो जोकि कार से कोल्ड ड्रिंक का केन यूँ ही सड़क पर फेंक देती है। मैं जानती हूँ कि इस तरह के प्रयासों को सिरे से नकारना ग़लत होगा लेकिन, इस अभियान में इमानदारी मुझे कुछ कम लगी। आते समय देखा कि यमुना के किनारे पर खाने-पीने का सामान और पन्नियों और बोतलों का कचरा पड़ा हुआ था। साथ ही मेरे ड्राइवर को अफसोस था कि बैन्डवाले सरदारजी(रॉक बैन्ड के लीड सिंगर) ने केवल अंग्रेज़ी में गाने गाएं पंजाबी या हिन्दी में एक तो गा देता।  &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;जाते-जाते इतना कि यमुना की सफाई करनेवालों के सामन ही कइयों ने उसमें पन्नियाँ फेंकी। युवाओं ने उन्हें समझाने की कोशिश की। वो उनके सामने हाँ- हाँ करके निकल गए। जाते-जाते इतना बोल कि इनके एक दिन के चौंचले में हम रोज़ का काम छोड़ दे क्या... &lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-5149430786416309066?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/5149430786416309066/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=5149430786416309066' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5149430786416309066'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5149430786416309066'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/12/blog-post_05.html' title='चौंचलेबाज़ी...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-5664457832415838884</id><published>2009-12-01T23:48:00.001-08:00</published><updated>2009-12-01T23:48:41.818-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>लिजलिजी कौम</title><content type='html'>&lt;div&gt;कल मम्मी, मैं और भुवन लक्ष्मी नगर तक गए। यूँ ही थोड़ा बहुत घूमने के लिए। कल मंगलवार तो सो पूरा लक्ष्मी नगर खचाखच भरा हुआ था। घूमने फिरने के बाद जब हम लोग वहाँ से बाहर की सड़के ले लिए बढ़े तो पीछे से किसी ने मेरी कमर पर हाथ मारा। मैं पलटकर देखती तब तक वो आदमी आगे बढ़ गया। मैं उस पर चिल्लाई। देखने में वो आदमी पूरी तरह से नशे में लग रहा था। ऐसे में मम्मी ने कहा उसे क्या कहोगी वो ख़ुद ही होश में नहीं हैं। भुवन हमसे कुछ दूरी पर था। जब उसे ये बात मालूम हुई उसने कहा कि मुझे उसे मारना चाहिए था। मैंने मम्मी की दलील उसके आगे रख दी कि वो नशे में धुत था। हम जब मुख्य सड़क पर पहुंचे तो देखा कि वही आदमी किसी और लड़की के पीछे चल रहा है। लड़की को उसने उसी तरह पीछे से मारा और लड़की अकेली थी सो घबराकर आगे बढ़ गई। इसके बाद नशे में धुत वो आदमी एक दम आराम से चलता हुआ किसी और लड़की की तलाश में निकल पड़ा। ये देखकर मुझे अपनी बेवकूफी पर अफसोस हुआ। खैर, मैं उस लड़की तरह अकेली नहीं थी। हम तीनों उस आदमी की ओर बढ़े और जैसे ही भुवन ने उसे पकड़कर दो थप्पड़ मारे उसका पूरा नशा पेशाब के रास्ते बाहर निकल गया। उस आदमी ने पलटकर किसी तरह की कोई हाथापाई नहीं की चुपचाप मार खाता रहा। मुझे ये देखकर आश्चर्य हुआ कि वो आदमी कितना लिजलिजा है। कोई औकात नहीं है उसकी, कोई दम नहीं है उसमें। ऐसे में मैं अगर अकेली होती तो ज़रूर उससे डर जाती और उसे कुछ ना कहती जैसा कि उस लड़की ने किया। मुझे अफसोस के ही रोज़ाना इस तरह के लिजलिजे और गंदी मानसिकतावाले लोगों से दो-चार होने के बावजूद मैं इन्हें कुछ नहीं कह पाती हूँ। मैं डर जाती हूँ। मुझे अपने आसपास मौजूद भीड़ पर यकीन नहीं है कि वो मेरी मदद को आगे आएगी। मैं ख़ुद शारीरिक रूप से सक्षम भी नहीं हूँ कि उससे अकेले ही निपट लूं। मैंने अपनी आनेवाली ज़िंदगी के लिए इतना तो तय कर ही लिया है कि मेरे जब भी बच्चे होगे मैं उन्हें शारीरिक रूप से इतना तो सक्षम बनाऊंगी ही कि वो ऐसी लिजलिजी कौम से ना डरे...&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-5664457832415838884?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/5664457832415838884/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=5664457832415838884' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5664457832415838884'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5664457832415838884'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='लिजलिजी कौम'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-2177844289016900176</id><published>2009-11-28T03:48:00.000-08:00</published><updated>2009-11-28T03:50:06.749-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोगलापन...'/><title type='text'>मेरा एक तरफा होना ग़लत था...</title><content type='html'>&lt;p class="MsoNormal" style="margin-bottom:0cm;margin-bottom:.0001pt;line-height: normal;mso-pagination:none;mso-layout-grid-align:none;text-autospace:none"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: small;"&gt;मेरी पिछली पोस्ट पर आई प्रतिक्रियों से मुझे ये तो समझ आया ही कि सिर्फ़ महिलाओं के साथ शादी के मामलों में अन्याय नहीं होता है बल्कि पुरुषों के साथ भी होता है। लेकिन, साथ ही ये भी महसूस हुआ कि पुरुष किसी भी सूरत पर महिलाओं को समाज की ग़लत हरक़तों के लिए ज़िम्मेदार मानने में कोताही नहीं बरतना चाहते हैं। अपने लेख में मैंने केवल महिलाओं के दुख को लिखा लेकिन, मैं ये स्वीकार करती हूँ कि इस तरह के धोखे किसी के भी साथ हो सकते हैं। लेकिन, एक बात ये भी है कि पुरुष के पास अपनी जीवन साथी की कमी को कही न कही जाकर पूरा करने के साधन स्त्रियों से ज़्यादा हैं। खैर, मैं कल से कुछ परेशानी में हूँ। जोकि आज ब्लॉग पर एक सज्जन की पोस्ट को पढ़कर और बढ़ गई। कुछ दिनों पहले ख़बर मिली कि मेरे पहचान क्षेत्र की एक लड़की ने अपने प्रेमी को धोखा दिया। लड़की उस लड़के से पिछले 5 सालों से प्यार कर रही थी और उनकी जल्द ही शादी होनेवाली थी। बावजूद इस सबके लड़की ने किसी और लड़के से संबंध रखे। मेरी मित्र मंडली में उस लड़की की बेवफ़ाई के किस्से तैर रहे हैं। मैं भी उसे ग़लत मानती हूँ। लेकिन, एक बात से मुझे एतराज है। वो लड़का जिससे लड़की के बाद में संबंध बने वो ये जानता था कि इसका प्रेमी है और वो पूरे तरीक़े से मन बहला रहा था। इसके बावजूद कोई लड़के को ग़लत नहीं मान रहा हैं। सभी का कहना है कि लड़की उत्तेजित करे तो लड़का बेचारा क्या करें। यही बात आज सुबह पढ़ी पोस्ट में थी जहाँ सज्जन लड़कियों पर पूरे समाज की ज़िम्मेदारी डाल रहे थे। वो भी सिर्फ़ बच्चे पैदा करने के रूप में। समस्या ये है कि हम जब भी किसी विशेष लिंग से जुड़े मुद्दों पर बात करते हैं। तो हम ख़ुद का फ़ेवर करने लगते हैं और दूसरे को ग़लत मान लेते है। इतनी समझ रखनेवाले हम लोग शायद बिना किसी कि ओर झुके कोई बात तय नहीं कर सकते हैं।   &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-size:10.0pt; font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:&amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-2177844289016900176?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/2177844289016900176/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=2177844289016900176' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2177844289016900176'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2177844289016900176'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/11/blog-post_28.html' title='मेरा एक तरफा होना ग़लत था...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-8106661051554282745</id><published>2009-11-25T06:07:00.000-08:00</published><updated>2009-11-25T06:12:57.891-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><title type='text'>झूठ की बुनियाद पर खड़े रिश्ते...</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#663300;"&gt;कल कुरबान फ़िल्म की समीक्षा पढ़ी। समीक्षा पढ़ने के बाद जो बात मन में आई जो वो थी महिलाओं की स्थिति। हर किसी ने फ़िल्म की समीक्षा में आंतकवाद की चर्चा की और यही विषय भी था। लेकिन, मेरा मन इस बात पर टिक गया कि- कैसे एक लड़की को शादी के बाद ये बात मालूम चलती है कि उसका पति आंतकवादी है। असलियत भी यही है कि लड़कियों को ससुराल के बारे में और अपने पति के बारे में कई बातें शादी के बाद ही पता चलती है। कुछ बातें छोटी होती हैं तो कुछ बड़ी। लेकिन, शादीशुदा लड़कियाँ जिन्हें माँ-बाप सर से उतरा हुआ बोझ समझते हैं और ससुरालवाले अपनी जायदाद कुछ कहने की हैसियत नहीं रखती हैं। मेरी मम्मी को शादी के बाद मालूम हुआ कि मेरे बाबा नॉनवेज खाते थे। बाबा अंग्रेज़ों की सेना में थे और चार गोलियाँ खाकर बर्मा (शायद) से पैदल आए थे। ऐसे में उन्हें जो मिल जाता था वो खा लेते थे। बहुत मुश्किल से वो ये खाना छोड़ पाए थे। हो सकता है किसी को ये बात बहुत बड़ी ना लगे। लेकिन, एक विशुद्ध शाकाहारी ब्राह्मण परिवार में पली बढ़ी लड़की के लिए ये चौंकानेवाला था। मेरी एक भाभी को शादी के बाद ये मालूम हुआ कि भैया के आगे दे दो दांत नकली हैं। ये पता चलने पर जब भैया ने पूछा कि क्या तुम्हें बुरा लगा? तो भाभी ने जवाब में ना कहा। वो और क्या कहती? अगर कहती कि लगा तो क्या हो जाता। ऐसा ही कोई सच अगर लड़की के बारे में शादी के बाद पता चलता तो क्या वो बात भी इतने सामान्य रूप से दब जाती। ऐसे कई किस्से हमारे आसपास हमें मिल जाएगे। ऐसा कई बार सुनने को मिल जाता हैं कि झूठ बोलकर शादी कर दी गई। कुछ साल पहले की बात है मेरी एक मौसी के लिए रिश्ता आया था। बातचीत आगे बढ़ी तो मालूम चला कि लड़का विधुर है। मौसी तब तक उस लड़के से एक दो बार मिल चुकी थी और शायद सपने संजोना भी शुरु कर चुकी थी। लेकिन, सब कुछ ख़त्म हो गया था। उन्होंने किसी से कुछ नहीं बोला। बोलती भी क्या। लड़के की शारीरिक बनावट या मानसिक कमियों से लेकर उसकी नौकरी-चाकरी और पिछली ज़िंदगी की बातें परिवार हमेशा ही छुपाता है। ये सोचकर कि शादी के बाद अगर लड़की को मालूम भी चला तो वो और उसका परिवार क्या कर पाएगा। वैसे ही लड़कियों की परवरिश ही कुछ ऐसी होती है कि वो सामाजिक रूप से पंगु हो जाती है। अपनी परेशानी लड़की माँ-बाप को अगर बताती भी है तो वो उसे एडजस्ट करने की सलाह दे देते हैं और अपने पति से किसी भी तरह की उम्मीद उसके लिए बेवकूफी से ज़्यादा कुछ नहीं होगी। अगर वो इतना समझदार होता तो शादी से पहले ही अपने घरवालों के झूठ उसे बता देता। शादी एक इंसान की ज़िंदगी का सबसे अहम बंधन है खा़सकर हमारे समाज में जहाँ उसे किसी भी तरह निभाना ही होता हैं। लेकिन, फिर भी इस बंधन में झूठ और फ़रेब की इतनी गांठे होती हैं कि लड़की चाहे भी तो उन्हें खोलकर ख़ुद को आज़ाद नहीं कर सकती हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#663300;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#663300;"&gt;कुरबान में करीना का किरदार शायद आसपास फैले हुए आंतकवाद को देखकर सकते में होगा लेकिन, अगर उस जगह मैं होती तो शायद आंतकवाद से ज़्यादा उस इंसान के झूठ से सकते में होती जिसके भरोसे मुझे ज़िंदगी बितानी थी...&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#FFCCCC;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-8106661051554282745?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/8106661051554282745/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=8106661051554282745' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8106661051554282745'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8106661051554282745'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/11/blog-post_25.html' title='झूठ की बुनियाद पर खड़े रिश्ते...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-2739269750143723951</id><published>2009-11-21T04:56:00.001-08:00</published><updated>2009-11-21T04:56:48.433-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोगलापन...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>बिना शादी किए प्रेमी के साथ रह रही प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ भाग गई...</title><content type='html'>हरेक इंसान अपनी ज़िंदगी में एक ना एक बार ये ज़रूर बोलता है- ज़माना बदल गया है। हमारे वक़्त में तो सब कुछ कितना अच्छा था और ऐसी ही कई बातें। हरेक इंसान ये जानता हैं कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। अपनी सुविधा के अनुसार हर कोई बदल जाता हैं। पहले बस से चलनेवाला कुछ दिनों बाद ऑटो की सवारी करता हैं और फिर ख़ुद की कार की। ऐसे ही परिवर्तन हमारी सोच में होते हैं और रिश्तों में भी। पुराने वक़्त में शादी से पहले लड़का-लड़की एक दूसरे को देखते भी नहीं थे और आज के समय में माँ-बाप खु़द उन्हे कहते हैं घूमने फिरने के लिए। प्रेम विवाह भी अब बीती बात हो गई। अब तो ज़माना है लीव इन रिलेशनशीप का। मैंने कइयों को ये बोलते सुना है कि लव मैरिज़ भी टिकती नहीं हैं। प्यार में अंधे होकर शादियाँ करनेवाले जब परिवार के बोझ से दबते हैं तो टूट जाते हैं। बात शायद ठीक हो क्योंकि जब बात प्यार की होती हैं तो बस दो इंसान को आपसी तालमेल की ज़रूरत पड़ती हैं लेकिन, शादी के बाद दो परिवारों का तालमेल शुरु होता हैं। लेकिन, लीव इन में तो वो भी ज़िम्मेदारी नहीं। इसमें तो आप बिना किसी उम्मीद के बिना किसी ज़िम्मेदारी के सामनेवाले के साथ रहते हैं। जब लगे कि अब निभानी मुश्किल है आगे बढ़ जाओ। कई बार ये महसूस होता हैं कि ऐसे रिश्तों से जन्मे बच्चों का भविष्य क्या होगा। बच्चा बड़ा होगा और कहेगा कि मेरे मम्मी और पापा मेरे जन्म से लेकर आज तक कुछ 10 साथी बदल चुके हैं। मेरे पापा की और मेरी मम्मी की ओर अलग-अलग हम कुछ 10 भाई-बहन हैं। सबुकछ आधुनिक हो जाएगा। बच्चों और माँ-बाप के बीच का अंतर ख़त्म हो जाएगा। जो आज एक परिवार का हिस्सा नहीं बनना नहीं चाहते हैं। हर तरह की ज़िम्मेदारी से दूर रहना चाहते हैं। बिना किसी परेशानी के संबंध चाहते हैं वो क्या बच्चे चाहेंगे। मूंगफली की तरह आई-पिल खानेवाली, हर हफ्ते वीक एंड पर सबसे दूर भागनेवाली, ऑफ़िस के बाद मोबाइल स्विच ऑफ़ करनेवाली इस जनरेशन से क्या बच्चों को पालने और बड़ा करने की फुल टाइम जॉब हो पाएगी। मैं भी इसी पीढ़ी की हूँ और जब भी मेरी शादी के बारे में बातचीत होती हैं तो मुझे मेरा बुरा स्वभाव, लोगों से दूर भागने का स्वभाव और जल्दी से खीज जानेवाला स्वभाव डराने लगता हैं। इन सब बदलावों के बीच भी कुछ ऐसा है जो आज भी वही हैं और वो है इंसान की नीयत। पिछले कई दिनों से ये ख़बरें आ रही है कि लव मैरिज में भी अब दहेज मांगा जाने लगा है। शायद लड़केवालों को ये समझ में आ गया कि लड़का तो अब वही करेगा जो वो चाहेगा ऐसे में इसी रिश्ते का दोहन करना सीखना होगा। साथ ही साथ लड़कियों के माँ-बाप का ये भ्रम भी टूट गया कि अगर लव मैरिज हुई तो दहेज नहीं लगेगा। कुछ 10 दिन पहले की ख़बर और चौंकानेवाली थी। एक लड़के ने लड़की की हत्या कर दी मामला बना दहेज का। लड़का-लड़की लीव इन में रहते थे। याने कि अब हम ज़िम्मेदारी नहीं उठाना चाहते हैं लेकिन, फ़ायदों को छोड़ना भी नहीं चाहते हैं। ये कहानी यही ख़त्म नहीं होती हैं। लीव इन में रहनेवाले जोड़े अब बेवफाई भी करते हुए दिखाई देते हैं। मेरे आसपास ही मुझे कुछ ऐसे जोड़े दिखे जो कि लीव इन में रहते हैं और साथ ही में छुपकर रिश्ता भी रखते हैं। मुझे ये समझ नहीं आया कि जब आप एक नो प्रॉफ़िट नो लॉस के रिश्ते में हैं तो दूसरे को छुपकर क्यों निभा रहे हैं। बिंदास छोड़कर जाइए और रहिए दूसरे के साथ। कुछ ही दिनों में ये सुनने को मिलेगा कि बिना शादी किए प्रेमी के साथ रह रही प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ भाग गई...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-2739269750143723951?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/2739269750143723951/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=2739269750143723951' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2739269750143723951'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/2739269750143723951'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/11/blog-post_21.html' title='बिना शादी किए प्रेमी के साथ रह रही प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ भाग गई...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-6360762709360536372</id><published>2009-11-16T06:04:00.001-08:00</published><updated>2009-11-16T06:04:56.474-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>मैडम आप प्लीज़ लेडीज़ सीट पर बैठ जाइए</title><content type='html'>&lt;div&gt;मैडम आप प्लीज़ लेडीज़ सीट पर बैठ जाइए। अभी भीड़ बढ़ेगी और महिलाएं आकर हमें उठा देगी। मैं बिना कुछ कहे अनारक्षित सीट से उठकर महिला सीट पर बैठ गई। वो दोनों सज्जन पुरुष मेरे पीछे कि अनारक्षित सीट पर बैठ गए। इसके बाद उनके बीच बातचीत की शुरुआत हुई। मुद्दा बनी वो महिलाएं जोकि बसों में अनारक्षित सीटों पर बैठती हैं। सज्जन पुरुषों को समस्या थी कि आखिर क्यों वो सामान्य सीटों पर बैठती हैं उन्हें सिर्फ़ महिला सीट पर बैठना चाहिए। कैसे वो महिला सीट पर बैठे पुरुषों को यूँ ही उठा देती हैं। सीधे कहे तो सीट पाने के लिए महिलाओं की कुटिलता पर सज्जन विचार कर रहे थे। बसों में होनेवाली ऐसी बातों को सामान्यतः मैं सिर्फ़ सुनती हूँ। जवाब नहीं देती हूँ। पहली वजह कि सामनेवाला मुझे संवेदनहीन लगता है और दूसरी कि अकेली होती हूँ सो डर भी लगता है। खैर, इस बार मैं बोल उठी। पहले तो उन्हें ये समझाया कि महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों के होने का अर्थ ये नहीं है कि महिलाएं सामान्य सीटों पर नहीं बैठ सकती हैं। इसका अर्थ ये है कि पुरुष महिला सीट पर तब ही बैठ सकते हैं जब तक कि कोई महिला उन्हें उठने के लिए ना कहें। दूसरा कि ये व्यवस्था इसलिए है कि अधिकांश पुरुषों इस विवेक की कमी होती हैं कि वो किसी महिला को देख सीट छोड़ दें। (हालांकि महिलाओं में भी इस विवेक की कमी देखी गई हैं कि वो किसी वृद्ध या विकलांग को देख सीट छोड़ दें)। महिलाओं की सीट की मांग हरेक पुरुष को तब तक नाज़ायज़ लगती है जब तक कि वो महिला उसकी रिश्तेदार ना हो। नहीं तो सीट न देने के लिए सोने या फिर अगले स्टॉप उतरने के कई बहाने जानते हैं। मेरे उन्हें इतना कहने से ही वो दोनों सज्जन बैचेन हो चुके थे। कुछ जैसा कि हमेशा होता है बात को बस सुन रहे थे। किसी ने न तो मेरा साथ दिया और न ही विरोध किया। कई बार पुरुषों को लगता है कि महिलाओं की सीट खाली करने की मांग ग़लत है जब वो हर काम में बराबरी करती हैं तो इसमें क्यों नहीं। बात सही भी है। लेकिन, ऐसी कई बातें हैं जो कि दोनों में अलग है। महिलाएँ हर महीने माहवारी को झेलती बिना किसी परेशानी के। दर्द और उस परेशानी को झेलते हुए भी वो महीनेभर एक सा काम करती हैं। शायद ही कोई पुरुष किसी महिला को देखकर ये बता सकता हैं कि उसकी माहवारी चल रही हैं। या फिर ऐसे कई शारीरिक अंतर महिलाओं को पुरुषों से एक हाथ नीचे करने की कोशिश करते हैं। फिर भी महिला कभी ये कहकर कि मेरी माहवारी चल रही हैं या फिर मैं गर्भवती हूँ कहकर सीट खाली नहीं करवाती हैं। कई बार तो अगर बस में खड़े होने की ठीक से जगह हो तो उठाती भी नहीं। इसके बाद मैं एकदम चुप हो गई। उन सज्जनों ने भी कुछ नहीं किया। मैंने एफ़एम की आवाज़ बढ़ाई और बस से बाहर देखने लगी।  &lt;/div&gt;&lt;div&gt;आखिर में सिर्फ़ एक बात लड़का जब दिनभर ऑफ़िस से काम करके आता हैं तो माँ हर चीज़ उसके हाथ में रखती हैं। वही जब लड़की (बेटी या बहू) काम करके आती हैं तो कानों में सिर्फ़ एक बात सुनाई पड़ती है- चलो अब हाथ मुंह धोकर किचन में आ जाओ...       &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-6360762709360536372?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/6360762709360536372/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=6360762709360536372' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6360762709360536372'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6360762709360536372'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/11/blog-post_16.html' title='मैडम आप प्लीज़ लेडीज़ सीट पर बैठ जाइए'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-5653961158191271997</id><published>2009-11-13T01:12:00.001-08:00</published><updated>2009-11-13T01:12:59.103-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><title type='text'>चोर-चोर कज़िन हो गए</title><content type='html'>बात बहुत बड़ी नहीं है। फिर भी मज़ेदार है और बदलाव की सूचक है। कल रोज़ाना की तरह 10 बजते ही सब टीवी ट्यून किया। लापतागंज जो देखना था। इतने से ही दिनों ये मेरा पसंदीदा हो गया है। कसी स्क्रीप्ट, बेहतरीन संवाद और बढ़िया एक्टिंग के चलते ये मुझे पसंद हैं। खैर, कल के एपिसोड का छोटा-सा संवाद मेरे दिमाग़ में अभी तक घूम रहा है। सीन कुछ यूँ था कि गांव का रहनेवाला दूसरे से पूछता है कि- भैया आपका हमारी मौसी से रिश्ता क्या है। जवाब में गांववाले का भांजा बोलता है- कि मामाजी आपकी मौसी की मामी की चाची की.... तब ही उसका मामा चुप करवाकर बोलता है कि- हम उनके कज़िन हैं... इसके बात आगे बढ़ जाती हैं। लेकिन, मेरा दिमाग़ वही अटका हुआ है। ये संवाद जताता है कि कैसे गांव में भी शहरी या कहे विदेशी कल्चर को अपनाया जा रहा है। कैसे ममेरा भाई भी कज़िन है और चाचेरा भाई भी कज़िन हैं। कई बार मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि किसी को भाई या बहन बोलने में जो महसूस होता है वो कज़िन बोलने में नहीं। खैर, अब मैं इस चिंता में हूँ कि चोर-चोर मौसेरे भाई अगर कल को चोर-चोर कज़िन हो गए तो किसी को कैसे मालूम चलेगा कि चोर का बाप मामा है या चाचा...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-5653961158191271997?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/5653961158191271997/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=5653961158191271997' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5653961158191271997'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5653961158191271997'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/11/blog-post_13.html' title='चोर-चोर कज़िन हो गए'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-658985008335365120</id><published>2009-11-08T18:44:00.000-08:00</published><updated>2009-11-08T18:45:35.260-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीवी की कहानी दर्शक की ज़ुबानी...'/><title type='text'>दया का थप्पड़...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SveCPwpUgnI/AAAAAAAAAV8/eoFG3pEmbL8/s1600-h/cid.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 93px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SveCPwpUgnI/AAAAAAAAAV8/eoFG3pEmbL8/s200/cid.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5401929485322060402" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पिछले बाहर सालों से हर शुक्रवार की रात दस बजे मुझे क्या करना है ये तय है। दस बजते ही मैं टीवी के सामने बैठ जाती हूँ। चैनल होता है सोनी और सीरियल होता है सीआईडी। साल 1997 में शुरु हुआ ये सीरियल आज तक चल रहा है। आज भी उसे देखना उतना ही रोमांचकारी है जितना कि 12 साल पहले था। अंतर इतना है कि पहले ये आधे घंटे का आया करता था और आज ये एक घंटे का है। आज मैं इसे अकेले बैठकर देखती हूँ और 12 साल पहले पापा से लड़ झगड़कर देखती थी। उस वक़्त दस बजे ही डीडी मैट्रो पर आज तक आया करता था। पापा देखते थे आज तक और मैं और भैया बैचेन रहते थे सीआईडी के लिए। इस सीरियल में मुझे जो सबसे ज़्यादा पसंद है वो है दया। कुछ हफ़्ते पहले दिखाया कि दया मर गया मैं इतनी उदास हो गई कि पूछिए मत। जो मिले उसे कहूँ कि दया मर गया ये कैसे हो गया। कुछ ने मुझे पागल कहा और कुछ मुझ पर हंसने लगे। खैर, वो सही सलामत हैं। दया का थप्पड़ ऐसा है कि एक बार में अपराधी तोते की तरह बोलने लगता है और तो और दया ने अगर जंगल में भी अगर थप्पड़ मारा तो अगले ही शॉट में अपराधी सीआईडी के ऑफ़िस में। सीआईडी अपना-सा लगता है। ऐसा लगता है कि बस ये सब कुछ असल है और ये सभी पात्र मेरे दोस्त है। पिछले हफ़्ते ही शनिवार को मुझे सुबह 6 बजे ऑफ़िस पहुंचना था फिर भी मैं 12 तक जागी सिर्फ़ दया का थप्पड़ देखने के लिए...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-658985008335365120?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/658985008335365120/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=658985008335365120' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/658985008335365120'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/658985008335365120'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/11/blog-post_08.html' title='दया का थप्पड़...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SveCPwpUgnI/AAAAAAAAAV8/eoFG3pEmbL8/s72-c/cid.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-3654211849115410816</id><published>2009-11-06T01:37:00.001-08:00</published><updated>2009-11-06T02:58:04.486-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ अलग'/><title type='text'>बिना शादी किए दिल्ली में रहना...</title><content type='html'>मौसी दिल्ली में क्यों रहती है? क्या उनकी शादी हो गई हैं?&lt;br /&gt;ये मासूम से सवाल मेरी भांजी ने मेरी मम्मी से पिछले दिनों पूछे। मेरी मौसेरी बहन कुछ दिन पहले भोपाल गई थी। जब मम्मी ने उनकी बेटी को ये बताया कि दीप्ति मौसी दिल्ली में रहती है, तो उसने ये सवाल कई बार मम्मी से पूछा कि बिना शादी के कैसे वो दिल्ली चली गई। मेरी भांजी की उम्र 5 साल है। जब मम्मी ने ये बात मुझे बताई तो मैं खूब हंसी। लेकिन, इस सवाल के पीछे एक बहुत अहम बात छुपी हुई है। आखिर 5 साल की बच्ची के दिमाग़ में ये कैसे आया कि लड़कियां केवल शादी के बाद ही घर से बाहर जाती हैं। आज से वक़्त में तो ये बात और अखरती हैं। पहले के समय की बात और थी कि लड़कियाँ शादी करके ही बाहर निकलती थी लेकिन, आज तो नौकरी से लेकर पढ़ाई तक के लिए लड़कियाँ घरों से बाहर आ रही हैं। लेकिन, शायद आगर गिनती की जाए तो आज भी घरों में ही रह जानेवाली लड़कियों की संख्या ज़्यादा होगी। परिवार के माहौल का बच्चों पर कितना असर होता हैं ये इस बात से भी समझा जा सकता हैं कि जब मैं छोटी थी अपनी मौसियों की शादियाँ होते देखती थी लेकिन, मेरी एकमात्र बुआ की शादी नहीं होती थी। मैं पापा से कहती थी कि- मौसी की शादी होती है, बुआ की नहीं। मेरे पापा बस हंसकर रह जाते थे। मैं ये समझ ही नहीं पाती थी कि किसी की मौसी किसी और की बुआ भी तो होती है। खैर, मेरी बुआ ने शादी क्यों नहीं कि ये बात मुझे बहुत साल बाद समझ आई। लेकिन, मुझे लगता है कि इन बातों को हंसकर नहीं टालना चाहिए। ज़रूरत है उस बच्ची को ये समझाने कि आखिर क्यों दीप्ति मौसी बिना शादी किए दिल्ली में रह रही हैं...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-3654211849115410816?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/3654211849115410816/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=3654211849115410816' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3654211849115410816'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3654211849115410816'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='बिना शादी किए दिल्ली में रहना...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-1965533249798137589</id><published>2009-10-27T03:21:00.000-07:00</published><updated>2009-10-27T03:23:03.979-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोगलापन...'/><title type='text'>दोहरे मापदंड...</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आज सुबह के अखबार में ख़बर पढ़ी कि कैसे एक उत्तर-पूर्वी लड़की की एक लड़के ने हत्या कर दी। हर अख़बार ने इस बात पर ज़ोर दिया कि वो लड़का एक सभ्रांत परिवार का था और ख़ुद भी बहुत पढ़ा लिखा था। आईआईटी से पीएचडी कर रहे इस 34 वर्षीय लड़के की इसी पढ़ाई की दुहाई दी जा रही थी कि कैसे पढ़ाई तक एक मनुष्य को सभ्य नहीं बना सकती है। ख़बर विचलित करनेवाली है। ये सच है कि हमारी सोच यही है कि एक अच्छे परिवार के पढ़े लिखे युवा ग़लत हरकतें कम करते हैं। जबकि शायद ऐसा नहीं है क्योंकि सभ्रांत परिवार और पढ़ाई सभ्य होना कुछ हद तक ही सिखाती है। ये बातें इंसान व्यवहारिकता से आती है। घर में माता-पिता क्या सिखा रहे हैं, आपको किस दह तक आज़ादी मिल रही हैं और आपके दोस्त कैसे हैं। ये सब पढ़ाई लिखाई से भी ज़्यादा मायने रखता है। खैर, सुबह से इन्हीं सब मुद्दों पर बहस के साथ-साथ लड़की का उत्तर-पूर्व का होना भी बहस का मुद्दा था। अख़बार में भी ये लिखा था कि इन क्षेत्र की रहनेवाली लड़कियों का दोस्ताना स्वभाव और पहनावा यहां के लोगों के लिए अजूबा होता है। पुलिस तक इन्हें अंग्रेज़ी मैडम कहते हैं। इन ढेर सारी बातों के बीच कई बातें हुई लेकिन, जो मन को चुभी वो बात थी मेरे एक सहयोगी की। उसके मुताबिक़ लड़कियों को पहनावे और स्वभाव को मर्यादा में रखना चाहिए इनसे ही लड़के उत्तेजित होते हैं और ऐसी हरक़तें करते हैं। सिर्फ़ इस एक लाइन ने लड़की को भी अपराधी बना दिया। दोहरे मापदंडों का हमारे समाज में कोई अंत नहीं...   &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-1965533249798137589?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/1965533249798137589/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=1965533249798137589' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/1965533249798137589'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/1965533249798137589'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='दोहरे मापदंड...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-639709871869168184</id><published>2009-09-16T07:33:00.000-07:00</published><updated>2009-09-16T07:34:14.142-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंटरनेट के झरोखे से...'/><title type='text'>पढ़ना ज़रूरी है...</title><content type='html'>इंटरनेट की दुनिया में घूमते हुए आज एक ऐसी रिपोर्ट देखी जिसे देखकर लगाकि मेरी दुखती रग पर किसी ने हाथ रख दिया। अमेरिकन पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेस के चैनल NOW की वेबसाइट पर &lt;a href="http://www.pbs.org/now/shows/407/"&gt;बेनिफ़िट्स डिनाईड&lt;/a&gt; के नाम से एक रिपोर्ट मौजूद है। एक साल पहले की आधे घंटे की ये रिपोर्ट अमेरिका के सर्विस सेक्टर में फ़्री लान्सर के रूप में काम कर रहे लोगों के अधिकार के बारे में बात करती हैं। इस रिपोर्ट का सार है कि कैसे फ़्री लान्सर के रूप में या फिर कॉन्ट्रेक्ट के रूप में लोगों से काम करवाया जा रहा है। ये काम उतना ही होता है जितना कि संस्था का कोई कर्मचारी करता होगा लेकिन, क्योंकि ये फ़्री लान्सर के रूप में काम करते हैं इसलिए उन्हें सुविधाओं से वचिंत रखा जाता है। हमारे देश का हाल भी कुछ ऐसा ही है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल अमेरिकन पत्रकारों का ज़्यादा है। जैसा कि हमारे देश में भी है। हमारे देश में यही सूरते हाल हैं। मीडिया में काम करनेवालों को न तो किसी तरह का हेल्थ कवर मिलता है और न ही कोई और सुविधा। जहाँ कर्मचारियों को समय पर तनख्वाह न मिलती हो वहाँ इन सब की बात ही बेमानी है। जितनी भी लिखा पढ़ी होती है वो पूरी तरह से संस्था के हक़ की होती है। आप भी ज़रूर देखे इस रिपोर्ट को जाने कि क्या है हमारे हक़ और कहाँ खड़े है हम...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-639709871869168184?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/639709871869168184/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=639709871869168184' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/639709871869168184'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/639709871869168184'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/09/blog-post_16.html' title='पढ़ना ज़रूरी है...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-5376337771066892823</id><published>2009-09-11T07:55:00.000-07:00</published><updated>2009-09-11T07:58:51.560-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><title type='text'>ये जीना भी क्या जीना है लल्लू...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SqplLtLIhiI/AAAAAAAAAVs/LFHLTf_rhao/s1600-h/cb1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SqplLtLIhiI/AAAAAAAAAVs/LFHLTf_rhao/s200/cb1.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5380223956626736674" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;   दिल्ली कभी-कभी सुन्दर शहर लगता है। ऐसा मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि अधिकतर यहाँ की अव्यवस्थाएं मुझमें खीज पैदा कर देती हैं। मुझे लगता है कि क्या यार क्या शहर है ज़रा-सी बारिश से थम जाता है। किराए पर चढ़ कमरे ऐसे बने हैं कि मुर्गी के दबड़े ज़्यादा अच्छे होंगे। खैर, जब भी मैं दिल्ली के इस हाल से और खा़सकर अपने ही बेहाल से दुखी हो जाती हूँ &lt;a href="http://memsaabstory.wordpress.com/2008/08/24/chashme-buddoor-1981/"&gt;चश्मे बद्दूर&lt;/a&gt; देख लेती हूँ। फ़िल्म एक क्लासिक है और कहानी से लेकर अभिनय तक सबकुछ बेहतरीन है। लेकिन, उससे भी बेहतरीन है दिल्ली... चौड़ी-चौड़ी खाली सड़कें, किराएदारों के लिए ही सही लेकिन अच्छे फ़्लैट, मिलनसार लोग और हवा में घुला हुआ एक इत्मीनान। किसी का भी ऐसे शहर में रहने के लिए जी मचला जाए। चश्मे बद्दूर साल 1981 में आई थी। संई परांजपे के निर्देशन में बनीं ये एक बेहतरीन कॉमेडी थी। दिल्ली में बेचलर्स की ज़िंदगी बिता रहे तीन दोस्तों के आगे पीछे बुनी हुई ये फ़िल्म आपके मूड को कभी भी फ़्रेश कर सकती है। फ़ारुख शेख, रवि वासवानी, दीप्ति नवल, दीना पाठक, सईद जा़फ़री सभी का अभिनय बेहतरीन। कई बार इस फ़िल्म को देखते हुए मन में आया कि काश ज़िंदगी एक फ़िल्म की ही तरह होती हमेशा हैप्पी एंडिंग। असलियत इतनी सुन्दर नहीं है। यहाँ तो रोज़ाना मकान मालिक से लेकर बस के कन्डक्टर तक, ऑफ़िस से लेकर दुकानदार तक से बकझक होती ही रहती है। यहाँ बने दोस्तों को मैं अंगुलियों पर गिन सकती हूँ और अपने आप बन गए दुश्मनों की तो लिस्ट बन चुकी हैं। ज़िंदगी इतनी भी बुरी नहीं... ये कह कर मैं दिल को बहला लेती हूँ।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SqplIH5LuUI/AAAAAAAAAVk/i1GtDVXoUvk/s1600-h/cb.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SqplIH5LuUI/AAAAAAAAAVk/i1GtDVXoUvk/s200/cb.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5380223895079729474" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://memsaabstory.wordpress.com/2008/08/24/chashme-buddoor-1981/"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://memsaabstory.wordpress.com/2008/08/24/chashme-buddoor-1981/"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;                     फिर भी फ़िल्म और असलियत के इस अंतर को समझने के बाद भी जब भी चश्मे बद्दूर देखती हूँ एक टीस-सी उठती है कि काश मैं होती ओमी, बोजो और सिद्धार्थ में से एक...  &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-5376337771066892823?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/5376337771066892823/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=5376337771066892823' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5376337771066892823'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/5376337771066892823'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/09/blog-post_11.html' title='ये जीना भी क्या जीना है लल्लू...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SqplLtLIhiI/AAAAAAAAAVs/LFHLTf_rhao/s72-c/cb1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-3366361660221489957</id><published>2009-09-09T08:39:00.001-07:00</published><updated>2009-09-09T08:39:41.610-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>मेरा दिल्ली में रहना...</title><content type='html'>&lt;div&gt;तू तो दिल्ली में रहती हैं, तुझे क्या परेशानी है। यार काश मैं भी दिल्ली में रहती...&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ऐसा कहते ही उनसे एक आह भरी और आज उस पर जो बीती वो मुझे सुना दी। मैं बात कर रही हूँ, मेरी उस दोस्त की जिसने अपनी ज़िंदगी में कुछ भी अपने मन से नहीं किया है। हरेक काम वो अपने माता-पिता की मर्ज़ी से करती आई हैं। उसे इस बात का बहुत कोफ़्त है कि उसके माता-पिता को उस पर बिल्कुल यक़ीन नहीं है। ये सच भी है कि स्कूल या कॉलेज के दिनों में वो कभी हमारे साथ भी कही घूमने नहीं जाती थी। उसके माता-पिता उसे कभी नहीं जाने देते हैं। इसके पीछे शायद ये भावना हो कि उन्हें बेटी पर यक़ीन न हो लेकिन, मुझे ऐसा लगता है कि शायद उन्हें इस दुनिया पर यक़ीन नहीं हैं। खैर, माता-पिता और बच्चों के बीच के मनमुटाव नअ नहीं लेकिन, जो नया है वो ये कि - तू तो दिल्ली में रहती हैं, तुझे क्या परेशानी है। यार काश मैं भी दिल्ली में रहती... मैं तब से इस बात का मतलब खोज रही हूँ...&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-3366361660221489957?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/3366361660221489957/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=3366361660221489957' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3366361660221489957'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/3366361660221489957'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/09/blog-post_09.html' title='मेरा दिल्ली में रहना...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4975798648940091027</id><published>2009-09-05T03:57:00.000-07:00</published><updated>2009-09-05T03:58:13.970-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><title type='text'>मोरा संईया मो से बोले ना...</title><content type='html'>&lt;div&gt;पिछले कुछ दिनों से मेरा पुरानी दिल्ली में आना जाना कुछ ज़्यादा ही हो रहा है। अपने कार्यक्रम के सिलसिले में मैं दिल्ली की इन तंगों से होकर कई दिलचस्प लोगों से मिल चुकी हूँ। निचली बस्तियों में रहनेवाले बच्चों के लिए काम करनेवाली संस्थाओं में काम करनेवालों से यहाँ रहनेवाले बच्चे सभी से मिलकर हर बार एक नया अनुभव होता हैं। हालांकि कइयों को इन एनजीओ की नीयत पर शक़ होता हैं लोगों को लगता हैं कि ये लोग पैसों के चक्कर में ये सब करते हैं और सरकार से मिलनेवाला पूरा पैसा खा जाते हैं। असलियत कुछ भी हो, ये लोग कुछ भी करते हो फिर भी कुछ तो फ़ायदा इन बच्चों को मिलता ही होगा। कल मैं ऐसे ही कुछ नौजवानों से मिल जोकि बच्चों के लिए काम करते हैं। हालांकि ये उनका मुख्य काम नहीं हैं। इनमें से कुछ छात्र थे तो कुछ संगीतकार। ये सभी निचली बस्तियों में काम करनेवाले एनजीओ से जुड़े हुए हैं। ये सभी बच्चों को कुछ सिखाते है। पढना-लिखाना या फिर कोई काम काज़ से जुडी़ बात नहीं। बल्कि ये युवा बच्चों की इन निचली बस्तियों को म्यूज़िक बस्ती में तब्दील करने का काम करते हैं। ये युवा बच्चों को संगीत सिखाते हैं। हर तरह का संगीत शास्त्रीय से लेकर जेज़ तक... साथ ही साथ संगीत की धुन को पकड़ना और उस पर थिरकता भी... बच्चे इन्हें देखते से ही इन पर झूम जाते हैं। खुश होकर उनके गले लग जाते हैं। मंत्र मुग्ध से जो ये कहते हैं वो वैसा ही करते हैं। इतना ही नहीं ये इन बच्चों को वो सभी वाद्ययंत्र दिखाते हैं जो उन्होंने शायद ही कभी देखे हो। लेकिन, आखिर संगीत की इन्हें क्या ज़रूरत... इन्हें तो ज़रूरत है शिक्षा की, ऐसे काम को सीखने की जो आगे चलकर दो पैसा कमाने में मदद कर सकें। लेकिन, म्यूज़िक बस्ती से जुड़े सुहैल और फ़ेथ की सोच अलग हैं। इनका मानना हैं कि संगीत वो ज़रिया है जो इन्हें ख़ुद को समझने में मदद करता हैं। दोस्ती करना सिखाता हैं। अपनी इस ज़िंदगी से ऊपर उठकर कुछ करने की हिम्मत देता हैं। बात कुछ अलग है और कुछ अटपटी भी हैं। लेकिन, जब इन छोटे-छोटे बच्चों को - मोरो संईया मोसे बोले ना... गाते और फिर खिलखिलाकर हंसते देखा तो ये अटपटा सा आइडिया भी बढ़िया ही लगा... &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4975798648940091027?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4975798648940091027/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4975798648940091027' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4975798648940091027'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4975798648940091027'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/09/blog-post_05.html' title='मोरा संईया मो से बोले ना...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-6985612131239533217</id><published>2009-09-03T06:08:00.001-07:00</published><updated>2009-09-03T06:08:33.102-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>ख़त्म होनेवाला है मुश्किल दौर...</title><content type='html'>ख़त्म होनेवाला है मुश्किल दौर। ये वो लाइन है जो अनिकेत ने कई बार लिखी थी और अब वो उसे बोलना सीख रहा था। अनिकेत की उम्र 19 साल है लेकिन, दिमागी रूप से वो 10 साल का भी नहीं है। मानसिक रूप से विकलांग अनिकेत दिल्ली के विशेष स्कूल मासूम दुनिया में पढ़ता है। ये स्कूल उसके मम्मी और पापा मिलकर चलाते है। दिल्ली के द्वारका इलाके में निचली बस्तियों में रहनेवाले मानसिक रूप से विकलांग बच्चों के लिए स्कूल चलानेवाली ये दंपति ख़ुद को ख़ास मानती हैं। श्री और श्रीमती न्याल का मानना है कि वो ख़ास है इसलिए ही भगवान नो उन्हें इतना ख़ास बच्चा दिया है। अपने एक शूट के सिलसिले में जब मैं वहां पहुंची तो उस वक़्त सभी बच्चे पढ़ाई कर रहे थे। यहां पढ़ाई उम्र के मुताबिक़ नहीं दिमागी समझ के मुताबिक़ तय होती है। इस मासूम दुनिया में अलग-अलग तरह के मानसिक विकलांगता से जुड़े बच्चे पढ़ते हैं। ऐसा नहीं है कि यहां ये बच्चे माता-पिता के साथ आते हो। अधिकतर माँ-बाप तो इन बच्चों को बोझ समझते है। ऐसे में इन दोनों ने मिलकर इन बस्तियों में जाकर ऐसे बच्चों इकठ्ठा किया था। यहाँ पढ़ रहे ये मासूम बच्चे अपने घरों से दुत्कारे हुए हैं। कुछ के माँ-बाप रिक्शा चलाते हैं तो कुछ के मजदूरी करते हैं। कई बच्चे ऐसे हैं जो उम्र में तो 30 साल के है लेकिन, ख़ुद से खाना तक नहीं जानते हैं। ऐसे में न्याल दपंत्ति इन्हें इतना सक्षम बना देते हैं कि ये बच्चे अपने बुनियादी कामों के लिए किसी पर निर्भर ना हो। श्री न्याल बताते है कि जब उन्हें ये मालूम चला था कि उनका छोटा बेटा मानसिक रूप से विकलांग है वो खूब रोए थे। लेकिन, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने बच्चे पर पूरा ध्यान दिया उसे विशेष स्कूल में पढ़ाया और उसकी परवरिश पूरे इत्मिनान और ध्यान से की। अपने बड़े बेटे को अपने पैरों पर खड़ा होने लायक़ कर देने के बाद न्याल ने तय किया कि वो सिर्फ़ अनिकेत के लिए ही कुछ नहीं करेंगे बल्कि उसके जैसे और भई बच्चों को पढ़ाएगे। इसके लिए उन्होंने कई निचली बस्तियों का दौरा किया, कई गालियाँ खाई लेकिन, हिम्मत नहीं हारी। जब भी वो ऐसे बच्चों के माता-पिता से बात करते वो इनका मज़ाक बनाते कहते कि कलेक्टर बना दोगे क्या इस पागल को। लेकिन, इनका जवाब एक ही होता कि- वो उन्हें इस समाज में जीना सिखा सकते हैं। अनिकेत अददान सामी का फ़ेन हैं और उसके गाने गाता हैं। ऐसे ही अखिल बहुत बेहतरीन माऊथ ऑर्गन बजाता है। अनिल ख़ूबसूरत पेंटिंग बनाता हैं। हरेक में एक खूबी है जो हमें नज़र नहीं आती हैं। न्याल दंपत्ति का मानना है कि ये बच्चे हमें सिखाते है कि हरेक काम आराम से करना चाहिए हमेशा भागते नहीं रहना चाहिए...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-6985612131239533217?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/6985612131239533217/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=6985612131239533217' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6985612131239533217'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/6985612131239533217'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='ख़त्म होनेवाला है मुश्किल दौर...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-8023007690649251263</id><published>2009-08-31T08:22:00.001-07:00</published><updated>2009-08-31T08:22:56.241-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीवी की कहानी दर्शक की ज़ुबानी...'/><title type='text'>घिन की हद...</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;पहले पान को चबाओ और फिर उसकी पीक को थूको और फिर उसे पी जाओ...&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;अपने साथी प्रतियोगी को गंदी से गंदी गाली दो और फिर उसके पैर पड़ो...&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;अगर अपने आत्मसम्मान को दांव पर लगाते हुए आप ये सब करते जाएगें तो आप जीत सकते है कुछ लाख़ या करोड़ रुपए। ये है आज के जमाने का छोटा रास्ता पैसे कमाने का। जैसे कि शाहिद कपूर का कमीने में एक संवाद है- कि शार्ट कट या छोटा शार्ट कट। तो मेहनत आज के वक़्त में आऊट डेटेड हो चुकी है। ऐसा नहीं है कि पुराने वक़्त में इंसान को शार्टकट पसंद नहीं थे। लेकिन, उन छोटे रास्तों के भी अपने नियम थे जोकि आज नहीं रह गए हैं। बदतमीज़ी की हदों को जो जितनी बदतमीज़ी से पार कर लेगा वो पैसा कमा जाएगा। निजी टीवी चैनलों पर इन शार्ट कट्स की भरमार हैं। बिंदास पर आनेवाला शो दादागीरी इतना वाहियात है कि जिसकी कोई हद नहीं। प्रतियोगियों से इतनी बदतमीज़ी की जाती हैं और प्रतियोगी आपस में इतनी गंदगी भरी बातें करते हैं कि कई बार लगता हैं कि इन्हें वयस्क प्रमाण पत्र देना चाहिए। रोडीज़ हो या फिर मुझे इस जंगल से बचाओ हर शो सबसे बड़ा बदतमीज़ खोजता है। जो सबसे बड़ा होता हैं वो जीत जाता हैं। पिछले कुछ सालों में टीवी ने अपनी शक्ल-सूरत बदल ली है या फिर ये कहे कि समाज ने बदल ली। बुनियाद और हम लोग को याद करनेवाले टीवी के साफ-सुथरे स्वरूप को बहुत मिस करते हैं। सच भी है कि समाज का रूप बदला तो है लेकिन, क्योंकि सास भी कभी बहू थी जितना नहीं। आज के धारावाहिकों में कोई भी गरीब कोई नहीं, आम परेशानियों से जूझता हुआ कोई नहीं। परेशानियाँ अगर है भी तो लार्ज़र देन लाइफ़ है। ऐसे में इनसे मन उचटना स्वाभाविक है और इस उचटे मन के लिए ही भारतीय टीवी के पर्दे पर आए ये शो। लेकिन, मन जोकि चंचल है और एक जगह ज़्यादा देर तक ठहरता नहीं है साफ-सुथरे रीयलीटी शो पर भी नहीं ठहरा। ऐसे में शुरु हुए ये घिन पैदा करनेवाले शो जिन्हें देखकर आप आसानी से गालियाँ सीख सकते हैं। ये शो गालियों के इनसाक्लोपीडिया होते हैं। इन्हें देखकर आप अपने दुश्मनों को ज़लील करना और दोस्तों को दुश्मन बनाना सीख सकते हैं।      &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-8023007690649251263?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/8023007690649251263/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=8023007690649251263' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8023007690649251263'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/8023007690649251263'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/08/blog-post_31.html' title='घिन की हद...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-940938146261397659</id><published>2009-08-21T02:55:00.000-07:00</published><updated>2009-08-21T02:56:04.497-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ अलग'/><title type='text'>बच्चों की बड़े होने में मदद करें...</title><content type='html'>क्या आपके बच्चे या छोटे-भाई बहन ने आपसे कभी किसी तरह के घरेलू शोषण की शिकायत की है? हो सकता है कि कभी की हो लेकिन, क्या आपने आपने बच्चे की इस बात को गंभीरता से लिया? उस इंसान से क्या कभी कोई बात की? असल में हमारा समाज ख़ुद को एकदम साफ सुथरा बनाए रखना चाहता है जोकि अच्छी बात है। लेकिन, इसके लिए समाज उपने अंदर की गंदगी को साफ नहीं करता है, बल्कि उसे चादर के नीचे ढ़क देते है। एक औसत भारतीय घर में ऐसी घटनाएं होती ही रहती है। अगर इन घटनाओं का सही आंकलन हो तो संभव है आंकड़ों और इन घटनाओं के दुष्प्रभावों को देखकर आप चौंक जाए। ये मुद्दा मैं इसलिए उठा रही हूँ क्योंकि कल ही मैंने एक कॉमिक पढ़ी। इसमें कहानी तो बच्चों की थी लेकिन, इसे पढ़ना हरेक इंसान के लिए ज़रूरी है। इसकी कहानी एक स्कूल के कुछ बच्चों की है ख़ासकर लड़कियों की जिनका उनके ही स्कूल का एक शिक्षक यौनशोषण करता है। डर के मारे बच्चियों किसी को कुछ नहीं बता पाती हैं लेकिन, इसका असर उनके व्यवहार और पढ़ाई पर साफ नज़र आता है। क्योंकि ये एक काल्पनिक कहानी है इसलिए किसी तरह से बच्चियों के माता-पिता को बात मालूम चल जाती हैं और उनके माता-पिता उन पर विश्वास करके उस इंसान के ख़िलाफ कार्रवाई भी करते है। जैसा कि हमेशा होता है हैप्पी एण्डिंग। लेकिन, इस अंत से मैं खुश नहीं हूँ। क्योंकि ये असलियत नहीं है। असलितय तो ये है कि सौ में से निन्यान्वे बार बच्चे माता-पिता तक ये बात लेकर ही नहीं जाते हैं। वजह सिर्फ़ इतनी कि हमारे घरों में आज भी अभिभावकों और बच्चों के बीच एक दूरी है। कई ऐसी बातें है जिनके बारे में हम बात नहीं कर सकते, कई बातें हैं जो माता-पिता हमसे नहीं कहते। सबकुछ रहता है पर्दे के पीछे। दूसरी वजह जोकि बच्चों को इन बातों की शिकायत से रोकती है वो है माता-पिता का अविश्वास और किसी तरह की कोई कार्रवाई न करना। कई बार माता-पिता अपने ही बच्चों की बातों को गंभीरता से नहीं लेते हैं और अगर ऐसी कोई बात हो तो उन्हें चुप करके बात को दबा देते है। अगर आप एक अभिभावक है तो ध्यान दे अपने बच्चे के दोस्तों पर, अपने रिश्तेदारों पर, उनके व्यवहार में अचानक आए किसी भी बदलाव पर। बच्चों के मामले में किसी पर भी यक़ीन न करें बले ही आपका रिश्तेदार या दोस्त हो। बच्चे कहाँ जाते हैं, कब आते हैं, किससे मिलते हैं, इन सब पर नज़र रखें। बच्चों से उनके शारीरिक बदलावों और यौन क्रियाओं के बारे में उनके मुताबिक़ बात करें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-940938146261397659?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/940938146261397659/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=940938146261397659' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/940938146261397659'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/940938146261397659'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/08/blog-post_21.html' title='बच्चों की बड़े होने में मदद करें...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4767932399085096139</id><published>2009-08-19T06:42:00.000-07:00</published><updated>2009-08-19T06:43:36.509-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>मैट्रो की ट्रैन के बाहर फैली अव्यवस्थाएं...</title><content type='html'>दिल्ली मैट्रो को लेकर पिछले कुछ समय से कई तरह की बातें चल रही हैं। ख़ासकर सुरक्षा को लेकर हरेक चिंतित दिख रहा हैं। जो चिंता में है, जो इस पर विरोध दर्ज़ करवा रहा हैं वो भी सफ़र करना मैट्रो में ही पसंद करता है। मैं कुछ ज़्यादा चिंतित नहीं हूँ। मेरे पास चिंतित न होने की कोई ख़ास वजह भी नहीं है। अपने ऑफ़िस आने के लिए मैं मैट्रो को प्राथमिकता देती हूँ। लेकिन, ऑफ़िस से जाते वक़्त मैं बस से ही सफ़र करती हूँ। सुबह मुझे मैट्रो स्टेशन तक पहुंचने में बड़ी मुश्किल होती है। मैट्रो फ़ीडर इतनी भरी हुई होती है कि लटकने को जगह न मिले। ऐसी सूरत में मैं सामान्य आरटीवी से यमुना बैंक के बाहर उतरती हूँ और वहाँ से रोज़ाना लगभग एक किलोमीटर पैदल चलकर स्टेशन पहुंचती हूँ। पैदल इसलिए कि, वहाँ खड़े रिक्शा इतनी सी दूरी के दस से पन्द्रह रुपए लेते हैं, जोकि मैं दे नहीं सकती। आते वक़्त मैट्रो स्टेशन तक पहुंचना मेरे लिए आसान है क्योंकि वो मेरे ऑफ़िस के सामने हैं। फिर भी मैं बस से आती हूँ। वजह फिर मैट्रो फ़ीडर। यमुना बैंक पर फ़ीडर के लिए इतनी लंबी लाइन होती हैं कि एक-एक घंटे तक का इंतज़ार करना पड़ जाता हैं। स्टेशन के बाहर खड़े रिक्शा और ऑटोवाले इस तरह से मुंह खोलते हैं कि जिसका कोई पार नहीं। मैट्रो बहुत ही आरामदायक है। मैट्रो ने सफर को आसान बना दिया है। लेकिन, सफर इतना भी आसान नहीं हुआ है कि रूम से निकलते हुए ये विश्वास हो कि मैं आराम से ऑफ़िस पहुंच जाऊंगी। मैट्रो फ़ीडर को लेकर मेरी ये शिकायत हो सकता है कि नाजायज़ हो। लेकिन, मैट्रो स्टेशन पर फैली अव्यवस्था एक गंभीर मुद्दा है। ख़बरनवीसों और मैट्रो के पुरोधाओं को मैट्रो के खंभे में पड़नेवाली दरारों के साथ-साथ इस तरह की अव्यवस्थाओं पर ध्यान देना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4767932399085096139?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4767932399085096139/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4767932399085096139' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4767932399085096139'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4767932399085096139'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/08/blog-post_19.html' title='मैट्रो की ट्रैन के बाहर फैली अव्यवस्थाएं...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-132232108277343659</id><published>2009-08-07T22:59:00.000-07:00</published><updated>2009-08-07T23:00:30.958-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>सब्र रखे इतना वक़्त कहाँ...</title><content type='html'>&lt;div&gt;आज हर कोई भाग रहा हैं। किसी को ऑफ़िस पहुंचने की जल्दी हैं, तो किसी को घर। हर कोई अपने आप में व्यस्त हैं। किसी के पास एक मिनिट शांति से बैठने की फ़ुर्सत नहीं हैं। हमारे जीवन की ये ज़िंदगी हमारे स्वभाव में भी नज़र आती है। किसी भी बात पर चिढ़ जाना, जल्द पहुंचने की हड़बड़ी में दूसरे को पीछे धकेलना आम बात हो गई हैं। हमारे इसी सब्र और सभ्यता का एक नमूना मैंने कल देखा। आईटीओ से लक्ष्मी नगर की तरफ़ जाते हुए ललिता पार्क बस स्टॉप के पास सड़क से नीचे पूरी एक कॉलोनी बसी हुई हैं। ये शायद लक्ष्मी नगर का ही हिस्सा है। इस कॉलोनी के एक मकान की दीवार पर लिखा हुआ है कि - यहाँ कचरा डालना मना है। जो भी यहाँ कचरा डालेगा उसका सर फोड़ दिया जाएगा। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;  पहली बार जब मैंने ये पढ़ा तो मैं चौंक गई। मैंने सोचा ये कौन सी सभ्यता है। कचरा डाल देने पर सीधे सर फोड़ देने की धमकी। लेकिन, शायद हमारे अंदर आज सब्र और सभ्य इन दोनों शब्दों के लिए कोई जगह नहीं रह गई हैं। यही वजह है कि आए दिन मोहल्लों में पानी की लाइन और एक दूसरे के आंगन में कचरा फेंक देने पर होनेवाली लड़ाइयाँ अख़बारों के साइड कॉलम में पढ़ने को मिल जाती हैं। हालांकि दुकानों के आगे- पता बताने के पाँच रुपए और गाड़ी खड़ी करने पर उसकी हवा निकाल दी जाएगी, जैसी चेतावनियाँ कई बार पढ़ी हैं। लेकिन, सर फोड़ देनेवाली धमकी पहली बार पढ़ने को मिली। मै कल से इस चेतावनी को लिखनेवाले की मनोदशा की कल्पना कर रही हूँ। क्या वो कचरा फेंकनेवालों से इतना परेशान हो चुका होगा कि अब किसी ने ये हरक़त की तो वो सीधे मार पीट पर उतर आएगा। क्या कभी उसने ऐसे लोगों को समझाने की कोशिश की होगी। यही सोचते-सोचते मुझे मुन्नाभाई पार्ट टू का वो दृश्य याद आ गया जहाँ गांधीजी मुन्ना के ज़रिए उस लड़के को शांत रहने की सलाह देते हैं जिसके घर के आगे एक दंबग आदमी रोज़ाना थूकता था। उस धमकी को पढ़ने के बाद एक बात तो तय है कि आज लोगों के पास किसी और को सुधारने का वक़्त और सब्र नहीं...   &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-132232108277343659?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/132232108277343659/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=132232108277343659' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/132232108277343659'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/132232108277343659'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/08/blog-post_07.html' title='सब्र रखे इतना वक़्त कहाँ...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-7450837142899576412</id><published>2009-08-06T03:17:00.000-07:00</published><updated>2009-08-06T03:18:58.885-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>अनोखी दोस्ती...</title><content type='html'>कौवा-कौवा... कौवा-कौवा...  &lt;div&gt;दादा और पोते की ये पुकार सुनते ही सैकड़ों कौवे उनके आसपास इक्ठ्ठे हो जाते हैं। चुपचाप सब आकर बैठ जाते हैं। दादा और पोते मिलकर कौवों को खाना खिलाने लगते हैं। पनीर के छोटे-छोटे टुकड़े हवा में उड़ते हैं और कौवे उसे मुंह में डाल लेते हैं। ये वर्णन किसी पंचतंत्र की कहानी का नहीं बल्कि दिल्ली के विकासपुरी इलाके़ में रहनेवाले खन्नाजी के घर का हैं। खन्नाजी दिल्ली के ही रहनेवाले हैं और पिछले 40 सालों से वो कौवों के दोस्त हैं। उनकी एक आवाज़ पर सैकड़ों कौवे उनके आसपास आ जाते हैं। नवीन खन्ना का नाम तीन बार लिम्का बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज़ हो चुका हैं उसके इन्हीं दोस्तों की वजह से। खन्नाजी बताते हैं कि जब वो कालकाजी इलाक़े में रहते थे वो रोज़ाना पक्षियों को खाना डालते थे। एक दिन उन्होंने खाना नहीं डाला तो छत पर एक कौवे ने उन्हें अपनी मधुर आवाज़ से पुकारा और फिर जो उनकी दोस्ती हुई वो 20 साल तक बरक़रार रही। खन्नाजी कौवों पर कई शोध कर चुके हैं। कौवों के ज़रिए ही उन्हें दिल्ली में आए भूकंप का पूर्वानुमान लग पाया था। मैंने जब ये पूछा कि कौवों को तो हम अपशगुन मानते हैं तो वो हंस पड़े। उन्होंने कहा कि कौवे उनके ही नहीं उनके परिवार के हर सदस्य के दोस्त हैं और कौवे अपने आप में बेहद शांत जीव हैं। कौवा कभी लड़ता नहीं हैं । लड़ाई हुई भी तो जो उम्र में बड़ा होता है वो चुप हो जाता हैं। खन्नाजी का ये कोवा प्रेम उनके बच्चों से होकर उनके पोते तक पहुंच गया हैं। खन्नाजी का पोता शौर्य सुबह उठते से ही कौवों के पास जाने की ज़िद्द करता हैं। खन्नाजी रोज़ाना इनसे मिलने और उन्हें खिलाने के लिए पार्क में जाते हैं और दादा पोते को देखकर उनसे मिलने दूर-दूर से कौवे आते हैं...  &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-7450837142899576412?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/7450837142899576412/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=7450837142899576412' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7450837142899576412'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7450837142899576412'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='अनोखी दोस्ती...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-875919210059578234</id><published>2009-07-28T02:07:00.000-07:00</published><updated>2009-07-28T02:08:44.569-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीवी की कहानी दर्शक की ज़ुबानी...'/><title type='text'>बेमेल के बीच होती प्रतियोगिता...</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#660000;"&gt;टीवी पर क्या दिखाया जा रहा हैं, क्यों दिखाया जा रहा हैं, जो दिखाया जा रहा है उसका स्तर क्या हैं। इश सब पर लगातार बहस चल रही है। सच का सामना और इस जंगल से मुझे बचाओ इस बहस के केन्द्र बिन्दु है। हालांकि राखी का स्वयंवर भी ख़ासी चर्चा में है लेकिन, अब जल्द ही उसका अंत होनेवाला है और अब दर्शकों को इतंज़ार है शादी के बाद होनेवाली नौंटकी का। इस सब के बीच पुराने फ़ार्मेट पर आगे बढ़ रहे कुछ रीयलीटी शो भी जारी है जैसे कि लिटिल चैम्प। वही कलर्स पर चल रहा इंडियाज़ गॉट टैलेन्ट पुराना कॉन्सेप्ट होने के बाद भी ताज़गी भरा है। वजह है उसके जज और उनकी पसंद की प्रतिभा। पिछले शुक्रवार को इस शो के सेमिफ़ाइनल शुरु हुए। नौ अलग-अलग प्रतिभाओ को एक साथ मंच पर उतारा गया और अब फ़ैसला जनता के हाथ में हैं कि वो किसे फ़ाइनल में पहुंचाती हैं। हालांकि मैं अलग-अलग तरह की प्रतिभाओ के एक साथ प्रतिस्पर्धा के विरुद्ध हूँ। कई साल पहले एक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में मेरी कविता को दूसरा पुरस्कार मिला था मैं जब दिल्ली उसे लेने आई तो मैंने निर्णायक मंडल से सिर्फ़ एक सवाल पूछा था कि आपने ये कैसे तय किया कि मेरी कविता प्रथम पुरस्कार वाली कहानी से कमतर थी। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया बस एक बच्ची की बात पर सब मुस्कुरा दिए। आज इंडियाज़ गॉट टैलेन्ट को देखकर मेरे मन में वही सवाल एक बार फिर खड़ा हो गया हैं। आखिर जनता ये कैसे तय करेगी कि एक 15 साल की बच्ची के गाने से बेहतर एक आदिवासी बच्चे का ब्रेक डांस है या फिर राजस्थानी गायकों से बेहतर पैर में स्टील की छड़ डाली सालसा डांसर हैं। यहाँ हरेक प्रतियोगी बेहतरीन है लेकिन, सभी की विधाएं अलग-अलग हैं। कई बार जो दिखने में अच्छा हो वो उतना अच्छा होता नहीं है और कई बार कुछ देखने तो बहुत आकर्षक नहीं होता लेकिन, असल में उस प्रतिभा को विकसित करने में बहुत मेहनत लगती है। कई लोग होंगे जो राजस्थानी लोक संगीत को बचाना चाहेंगे, तो कई लोग ऐसे होंगे जो कि एक 12 साल के आदिवासी बच्चे जिसने नाचने की कही कोई ट्रैनिंग नहीं ला फिर भी हूबहू माइकल जैक्सन की तरह नाचता है, को बचाना चाहते होंगे। हालांकि पहले सेमीफ़ाइनल के नतीज़े अभी आएं नहीं हैं लेकिन, मैं उत्सुक हूँ ये जानने के लिए कैसे जनता ये तय करती हैं कि नाचना बेहतर है या गाना.... &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-875919210059578234?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/875919210059578234/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=875919210059578234' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/875919210059578234'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/875919210059578234'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/07/blog-post_28.html' title='बेमेल के बीच होती प्रतियोगिता...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-1720753361098628657</id><published>2009-07-24T04:21:00.000-07:00</published><updated>2009-07-24T04:24:53.864-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जो यूँ ही मन में आ जाता है...'/><title type='text'>जो पैदल चलते हैं उन्हें इज़्ज़त नसीब नहीं...</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#990000;"&gt;इस महानगर में रहते हुए इस बात का अंदाज़ा हो गया है कि सड़क पर चलनेवालों की कोई क़ीमत नहीं है। यहाँ सड़क पर इज़्ज़त तब तक ही है जब तक कि आप किसी गाड़ी पर सवार है और अगर वो गाड़ी चार पहिए की हुई थी तो शान से आपकी गर्दन ऊंची हो जाएगी इतनी कि आसामान में नज़रें गड़ जाएगी। ये मैं इसलिए नहीं कह रही हूँ क्योंकि मैं पैदल या बस की सवारी करती हूँ। सड़क पर चलते हुए ये मैं रोज़ाना महसूस करती हूँ। मेरे मोहल्ले में यूँ तो एक ही बस स्टॉप है वो भी ऐसा कि अगर चार लोग खड़े हो जाए तो पाँचवे के लिए जगह नहीं। बस स्टॉप लगभग सड़क पर बना हुआ है ऐसे में सवारियाँ वही खड़ी रहती है। बसवाले कही भी बस रोकते है। ऐसे में सड़क पर चल रही हरेक गाड़ी बस के इंतज़ार में खड़ी सवारी पर चिल्लाती रहती है। इतना ही नहीं दूसरी सड़कों पर तो बस स्टॉप भी नहीं है और सड़क किनारे पैदल यात्रियों के लिए कोई रास्ता भी नहीं है। ऐसे में सड़क पार करने में ही पाँच से दस मिनिट तक लग जाते है और सड़क पर गाड़ियाँ दौड़ा रहे लोगों की गालियाँ और खाओ। कई बार तो मेरी सड़क पर ही लड़ाई हो जाती है मैं चिल्ला उठती हूँ कि क्या तुम लोगों के लिए जन्मों तक यही खड़ी रहूँ। सच में इस शहर में पैदल चलनेवालों के लिए कोई जगह नहीं है। सड़क पर भले ही कितना भी जाम लग जाए लेकिन, चलना किसी गाड़ी में ही चाहिए। कुछ भी ये सड़कें केवल गाड़ीवालों के लिए ही तो चौड़ी हो रही हैं। आप लाख़ ये सोचते रहे कि ट्रैफ़िक जाम करने के लिए प्रदूषण रोकने के लिए पब्लिक ट्रान्सपोर्ट का उपयोग करना चाहिए लेकिन, असलियत यही है कि चार क़दम की दूरी भी यहां गाड़ी से ही सम्मानजनक होती है। यहाँ पाँव के सहारे चलनेवालों&lt;/span&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;के लिए न तो इज़्ज़त है और न ही जगह है...&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-1720753361098628657?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/1720753361098628657/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=1720753361098628657' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/1720753361098628657'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/1720753361098628657'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/07/blog-post_24.html' title='जो पैदल चलते हैं उन्हें इज़्ज़त नसीब नहीं...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4189843031776685686</id><published>2009-07-20T04:48:00.001-07:00</published><updated>2009-07-20T04:48:51.298-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीवी की कहानी दर्शक की ज़ुबानी...'/><title type='text'>ये जीना भी कोई जीना है लल्लू...</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#660000;"&gt;मेरा सप्ताहांत टीवी देखकर ही बीतता है। फ़िलहाल टीवी के ट्रेन्ड के मुताबिक़ ये दिन पूरी तरह से टेलेन्ट शो के लिए समर्पित रहते हैं। ऐसे में मैं पूरे वक़्त यही देखती रहती हूँ। हालांकि ऐसे शो की समीक्षक आए दिन बखिया उखाड़ते रहते हैं, फिर भी मुझे इन्हें देखने में आनंद आता है। कइयों में सचमुच कई प्रतिभाशाली लोग आते हैं लेकिन, चैनल की नौंटकी के चलते ही मन कचवा जाता है। मम्मी के सुपर स्टार में भी यही हाल था। इसमें बच्चों के गाने पर कम और मम्मी के झगड़ों पर ज़्यादा ध्यान जाता था। ऐसा ही हाल है लिटिल चैम्प का है। इस शो में आए बच्चे इतना बढ़िया गाते है कि क्या कहने। उम्र 7 साल और गायकी ऐसी कि रोंगटे खड़े हो जाए। लेकिन, जजों की किचकिच और बच्चों के क्रिएट किए हुए मस्ती के पल देखकर मज़ा ख़त्म होने लगता है। लेकिन, फिर भी इन सारे सीरियलों को देखकर कभी-कभी मुझे ख़ुद पर शर्म आने लगती है। ऐसा लगता है कि इतनी बड़ी हो गई, पढ़ाई-लिखाई भी कर ली। लेकिन, फिर क्या। कुछ तो ऐसा किया ही नहीं मैंने कि कोई मुझे जाने। मुझमें तो ऐसी कोई प्रतिभा नहीं जिसका प्रदर्शन मैं भी कर सकूं। टीवी पर पसरे इस टेलेन्ट को देखकर लगता है कि मेरा ये जीना भी कोई जीना है... नौ साल की बच्ची स्टेज पर ऐसा भरतनाट्यम दिखाती है कि जज शेखर कपूर आंखें फाड़-फाड़कर बस देखते ही रह जाते हैं। या फिर 12 साल के अमरीक को जज कहते है कि ऐसा गाना गाओ कि जान पर बनी हो और बस यही बचने का रास्ता है। अमरीक ऐसा गाता है कि शेखर रो देते हैं और सोनाली अपनी ना को हाँ में बदल देती हैं। ये सब देखकर याद आया कि मैंने भी कभी शास्त्रीय नृत्य और संगीत सीखना शुरु किया था। चार साल सीखकर सब छोड़ दिया पढ़ाई के नाम पर। लेकिन, क्या हुआ पढ़ाई में भी तो मैं कोई तीर नहीं मार पाई। टेलेन्ट के इन शो देखकर अंदर ही अंदर खु़द पर गुस्सा आने लगता हैं। लगता है कि कितनी औसत हूँ मैं। मुझमें तो कोई हुनर ही नहीं है। तारे ज़मीन पर फ़िल्म की याद आ जाती है। लेकिन, उसके अंत में भी दिखाते है कि बच्चा चित्रकला प्रतियोगिता जीत जाता है। लेकिन, मुझे तो वो भी नहीं आती है...&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4189843031776685686?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4189843031776685686/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4189843031776685686' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4189843031776685686'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4189843031776685686'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/07/blog-post_20.html' title='ये जीना भी कोई जीना है लल्लू...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4133499259662241503</id><published>2009-07-18T05:59:00.000-07:00</published><updated>2009-07-18T06:04:28.965-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ अलग'/><title type='text'>सिक्कों के शौकिन...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SmHIHVum5bI/AAAAAAAAAUM/DZ98TWMEy0o/s1600-h/banknote1s.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 160px; height: 68px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SmHIHVum5bI/AAAAAAAAAUM/DZ98TWMEy0o/s200/banknote1s.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5359785059964872114" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#CC9933;"&gt;आज दिल्ली के राजेन्द्र नगर इलाक़े में रह रहे विशुद्ध दिल्लीवाले परिवार के घर जाना हुआ। मेरे कार्यक्रम के सिलसिले में वहां गई थी। यहाँ रहनेवाले सुमित एक कॉइन कलेक्टर है। उनके पास कई विरले सिक्के और नोट है। सुमित अपने बड़े भाई और दो दोस्तों के साथ मिलकर दिल्ली कॉइन सोसायटी नाम की एक संस्था चला रहे हैं। चार लोगों के साथ शुरु हुई ये सोसायटी अब तीन सौ लोगों का परिवार बन गई है। जब मैं उनके घर अपनी कैमरा यूनिट के साथ पहुंची तो प्यारी-सी तीन साल की द्ध्रति (सुमित की बेटी) ने हमारा स्वागत किया। सुमित एक ग्राफ़िक्स डिजाइनर हैं और एक एमएनसी के लिए काम करते हैं। मैंने पूछा कि महानगर की भाग-दौड़वाली ज़िंदगी में जहाँ इंसान को खु़द को ज़िंदा रखना दुभर लगता है ऐसे में इस शौक को कैसे ज़िंदा रखा है आपने। बेहद ही सरल और शांत स्वभाव के सुमित ने कहा कि बस ज़िंदा रखा है हमने ये हमारी ज़िंदगी का हिस्सा है इसके बिना तो जीवन की ही कल्पना नहीं की जा सकती हैं। सुमित को ये शौक़ उनके बड़े भाई से मिला है। ये दोनों ही भाई बचपन से सिक्के और नोट को इकठ्ठा करने में लगे हुए हैं। इनके साथ जुड़े इनके दो और साथी भी इस शौक को पूरे मन से निभा रहे है। पेशे से वकील और बैंक मैनेजर ये दोनों सज्जन सुमित और उनके भाई ऋषि के साथ मिलकर हर साल सिक्कों की प्रदर्शनी भी लगाते हैं। इनके पास दुनिया के अलग-अलग देशों के, अलग और अनोखे नोट मौजूद है। पाकिस्तान में हज पर जानेवाले यात्रियों के लिए अलग से छपाए गए नोट भी इनके पास है जो कि केवल सऊदी अरेबिया में ही मान्य है। नेपाल नरेश की ओर से जारी नोट, बर्मा से लेकर सूडान तक के नोट और एक मुस्लिम देश में छपे वो नोट भी इनके पास है जिन पर गणेशजी की तस्वीर मौजूद है।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SmHIHu0IzGI/AAAAAAAAAUU/1yLEXmMSbho/s1600-h/banknote9s.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 160px; height: 68px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SmHIHu0IzGI/AAAAAAAAAUU/1yLEXmMSbho/s200/banknote9s.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5359785066698951778" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हमारे देश में आज़ादी से पहले चलनेवाले नोट, आज़ादी के बाद छपे नोट, कुछ मिसप्रिंट हो चुके नोट, यूनिक नंबरवाले नोट सब कुछ इनके पास है। ये चारों अपनी व्यस्त ज़िंदगी से अपने इस शौक के लिए वक़्त चुरा ही लेते है। इन सभी का मानना है कि आप अगर चाहे तो अपने शौक को पूरा कर सकते है। अगर आप में से कोई भी सिक्कों को संग्रहित करने का शौक रखते हैं, तो आप इनसे सलाह ने सकते हैं साथ ही इनसे जुड़ भी सकते हैं। &lt;a href="http://www.delhicoinsociety.com/"&gt;बस यहाँ क्लिक कीजिए... &lt;/a&gt;  &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4133499259662241503?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4133499259662241503/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4133499259662241503' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4133499259662241503'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4133499259662241503'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/07/blog-post_18.html' title='सिक्कों के शौकिन...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SmHIHVum5bI/AAAAAAAAAUM/DZ98TWMEy0o/s72-c/banknote1s.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-389183540106635030</id><published>2009-07-15T04:47:00.001-07:00</published><updated>2009-07-15T04:55:22.792-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विज्ञापनों के ज़रिए...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ अलग'/><title type='text'>तिल देखा ताड़ देखा...</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#990000;"&gt;मध्यप्रदेश मेरा गृह राज्य है। यही वजह है कि प्रदेश के हर शहर, हर रीत, हर इंसान से मैं एक जुड़ाव महसूस करती हूँ। लेकिन, कुछ महीनों पहले ही मध्यप्रदेश पर्यटन निगम की ओर से जारी ये नया विज्ञापन देखा। ये एक बेहतरीन विज्ञापन है। आँखों के ज़रिए पूरे प्रदेश के बारे में बताता ये विज्ञापन एक अलग और कलात्मक सोच का बेहतरीन नमूना है। वैसे तो ये विज्ञापन अब कुछ पुराना हो चुका है और आप में से कइयों ने इसे कभी न कभी टीवी पर देख भी लिया होगा। लेकिन, फिर भी मैं इस विज्ञापन की लिंक&lt;a href="http://www.youtube.com/watch?v=Nr_Y6VTU6qo"&gt; यहाँ दे रही हूँ&lt;/a&gt;।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#990000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#990000;"&gt;&lt;img src="http://4.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/Sl3B9CR8ezI/AAAAAAAAAUE/8wv1o88VNHs/s200/eyes-mp-tourism-ad.png" style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 120px;" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5358652385969077042" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#990000;"&gt;&lt;a href="http://www.youtube.com/user/hgnishsihsa"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#990000;"&gt;&lt;a href="http://www.youtube.com/user/hgnishsihsa"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#990000;"&gt;&lt;a href="http://www.youtube.com/user/hgnishsihsa"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#990000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#990000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#990000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#990000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#990000;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#990000;"&gt;&lt;b&gt;&lt;i&gt; एक बार इसे ज़रूर देखे...&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-389183540106635030?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/389183540106635030/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=389183540106635030' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/389183540106635030'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/389183540106635030'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/07/blog-post_15.html' title='तिल देखा ताड़ देखा...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/Sl3B9CR8ezI/AAAAAAAAAUE/8wv1o88VNHs/s72-c/eyes-mp-tourism-ad.png' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-4086199073156577957</id><published>2009-07-13T07:02:00.000-07:00</published><updated>2009-07-13T07:06:04.594-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीवी की कहानी दर्शक की ज़ुबानी...'/><title type='text'>सच का सामना करते हुए हम लोग...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/Sls_H3jdajI/AAAAAAAAAT0/SBKrFewq0Pw/s1600-h/humlog.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 142px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/Sls_H3jdajI/AAAAAAAAAT0/SBKrFewq0Pw/s200/humlog.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5357945586091649586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#006600;"&gt;कल एनडीटीवी इंडिया पर चक्रव्यूह देखा तो मालूम चला कि हम लोग को प्रसारित हुए 25 साल बीत गए है। स्टूटियो में और कॉन्फ़्रैन्सिंग से जुड़े हर शख्स को हम लोग और बुनियाद जैसे सीरियलों की कमी अखर रही थी। हालांकि स्मृति इरानी को छोड़कर कोई भी और कलाकार आज के वक़्त का नहीं था। फिर भी ये बात तो माननी ही पड़ेगी कि इन 25 सालों में हम लोग बहुत कुछ बदल गए हैं। ख़ास करके टेलीविज़न के मामले में। लेकिन, कई लोग इसे बदलाव नहीं सिर्फ़ और सिर्फ़ पतन ही मानते हैं। जोकि मेरे ख्याल से ग़लत हो जाता है। कई जगह मैंने ऐसे लेख पढ़े हैं जिनमें आज के बेहूदें सीरियल्स की दुहाई दी जाती है। लेकिन, क्या सच में ये सभी बेहूदें है। क्योंकि जब शुरु हुआ था तो लोगों की घड़ियों की सूइयां थम जाया करती थी या फिर आज चल रहा बालिका वधू एक बेहतर बचलाव की उम्मीद लेकर आया है। माना कि जब ये सीरियल रबर की तरह खींचने लगते हैं तो वो झिलाऊ बन जाते हैं। लेकिन, आज का वक़्त उतना भी बुरा नहीं है। साराभाई वर्सेस साराभाई या फिर खिचड़ी या फिर बा बहू और बेबी इसके कुछेक उदाहरण हो सकते हैं। पहले हमारे देश के लिए टीवी ही एक अनोखी चीज़ थी और फिर उसमें सिनेमा की तरह एक कहानी को दिखाना और बडा़ आश्चर्य था। ये कुछ ऐसा ही था कि पहले के जो लोग सिनेमा देखने जाते थे उनके लिए हर हफ़्ते एक ही कहानी को धीरे-धीरे बढ़ते देखना कौतूहल का विषय था। लेकिन, समय बदला या फिर कहे कि भागने लगा। अब लोग एक हफ़्ते का इंतज़ार नहीं कर पाते हैं यही वजह है कि हम अब रोज़ाना के सीरियलों पर उतर आए हैं। पहले की तरह आज केवल एक ही चैनल भी नहीं हैं। अब पता नहीं कि लोग एक हफ़्ते तक उस सीरियल के लिए इतंज़ार करे न करे। और, इस सबसे बड़ी बात जो आज के वक़्त में बदली है वो है एकल परिवार जोकि शहरों में आकर बस गए हैं। उन शहरों में जहां न तो शाम को टहलने के लिए पार्क है और नहीं ऐसे पड़ोस जिनके साथ खाना खाकर ओटले पर वक़्त बिताया जा सके। आज तो ऐसी नौकरियाँ भी नहीं जो कि 5 बजे ख़त्म हो जाएं और पूरा परिवार सात बजे तक खाना खाकर साथ बैठा हो। शायद यही वजह है कि आज टीवी दोस्त बनता जा रहा है। अब तो परिवार में कोई सुबह की शिफ़्ट करता है तो कोई रात की। अब पड़ोस जब बात करनेवाला न हो तो इंसान टीवी को ही दोस्त बना लेता है। आज के इस दौर में टीवी पर जब निर्भरता इतनी बढ़ी है तो चैनल भी बढ़े है। ऐसे में एक इसांन एकसे ही सीरियल हर चैनल पर नहीं देख सकता है। औऱ, यही से जन्म होता है अलग-अलग तरह के फ़ार्मेट का। कोई घर की कहानी दिखाता है तो कोई कॉलेज की। कोई अस्पताल में रोमांस दिखाता है तो कोई गांव का भारत। ऐसे में कुछ कामयाब हो जाते है तो कुछ पीछे छूट जाते हैं। रीयलिटी शो भी इसी प्रपंच का हिस्सा है। आज के वक़्त में टीवी के साथ मिलनेवाला रिमोट सबसे घातक है।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/Sls_KoFr-oI/AAAAAAAAAT8/41fKnm_pWrA/s1600-h/t.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 80px; height: 80px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/Sls_KoFr-oI/AAAAAAAAAT8/41fKnm_pWrA/s200/t.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5357945633479850626" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दर्शक अगर चैनल पर किसी इंसान के जीवन का बहुत ही निजी सच देखकर रुकता है तो चैनलवाले सच का सामना भी करवा सकते हैं। वैसे, इन सच्चाइयों का सामना भी हम जैसे ही कुछ लोग करते है। आखिर एक मोटी रकम मिलती है ऐसा करने के एवज में...  &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-4086199073156577957?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/4086199073156577957/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=4086199073156577957' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4086199073156577957'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/4086199073156577957'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/07/blog-post_13.html' title='सच का सामना करते हुए हम लोग...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/Sls_H3jdajI/AAAAAAAAAT0/SBKrFewq0Pw/s72-c/humlog.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-7314042797166339266</id><published>2009-07-08T03:56:00.000-07:00</published><updated>2009-07-08T03:57:09.012-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंटरनेट के झरोखे से...'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ अलग'/><title type='text'>ग्लोबल विलेज का ग्लोबल शोक...</title><content type='html'>अख़बारों में ख़बरों के साथ-साथ निजी सुख-दुख की ख़बरें छपना एक बहुत ही सामान्य बात हैं। जन्मदिन की बधाई और मृत्यु के दुख में सभी को शामिल करने ये परम्परा अख़बारों तक ही सीमित लगती थी। लेकिन, फिर टीवी पर कुछ ऐसे मार्निंग शो शुरु हुए जिनमें कि जन्मदिन की बधाइयां दी जाने लगी। इसी तरह अख़बारों में शादी के लिए दिए जानेवाले विज्ञापनों को टक्कर दी मैट्रीमोनियल साइट्स ने जिसे अब टक्कर दे रहा है टीवी विवाह से जुड़े शो दिखाकर। लेकिन, आज नेट पर तफ़री करते हुए कुछ बेहद ही रोचक और नई चीज़ पर नज़र पड़ गई। भास्कर की वेब साइट पर पहली बार मैंने शोक समाचार देखे। मैंने आज से पहले कभी किसी साइट पर ऐसे समाचार नहीं देखे थे। मुझे ये अनोखे लगे। आखिर अख़बार तो किसी एक क्षेत्र विशेष में ही सर्कुलेट होता है। हाँ अगर अख़बार बहुत मशहूर हो तो एक दिन बाद भी कई शहरों में पहुंचता हैं और लोग उसे पढ़ते हैं। लेकिन, फिर भी वो ग्लोबल इंटरनेट पर चस्पा होकर ही बन पाता है। ऐसे में आप विश्व के किसी भी कोने में बैठकर अपने शहर की ख़बरों पर क्लिक करके उन्हें पढ़ सकते हैं। और, ऐसे में शोक को भी ग्लोबल कर देना एक नई पहल है। अब आप बर्घिंग्म में बैठकर भी ये जान सकते हैं कि भोपाल में किस के घर किसकी मृत्यु हो गई हैं। ग्लोबल विलेज का ग्लोबल शोक...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-7314042797166339266?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/7314042797166339266/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=7314042797166339266' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7314042797166339266'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7314042797166339266'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='ग्लोबल विलेज का ग्लोबल शोक...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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हैं और मालिक नहीं चाहता कि हम ऐसे विज्ञापनों को देखकर भ्रमित हो जाए और तनख़्वाह मांगने लगे...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8988204161220572200-7431093160296617341?l=hamaripulia.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hamaripulia.blogspot.com/feeds/7431093160296617341/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8988204161220572200&amp;postID=7431093160296617341' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7431093160296617341'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8988204161220572200/posts/default/7431093160296617341'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hamaripulia.blogspot.com/2009/06/blog-post_9563.html' title='आज पहली तारीख़ है...'/><author><name>Dipti</name><uri>http://www.blogger.com/profile/18360887128584911771</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/SK_Owj_pzLI/AAAAAAAAABI/HLB6aF7x5ow/S220/cartoons_15.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8988204161220572200.post-2341233482123894348</id><published>2009-06-30T05:00:00.001-07:00</published><updated>2009-06-30T05:02:54.024-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जीवन जीने का तरीक़ा...'/><title type='text'>हड्डियों का ढांचा...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_87YwQrkppbQ/Skn-om_iqOI/AAAAAAAAATs/dciGyReb7Nk/s1600-h/ma.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 108px;" 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