Thursday, August 6, 2009

अनोखी दोस्ती...

कौवा-कौवा... कौवा-कौवा...
दादा और पोते की ये पुकार सुनते ही सैकड़ों कौवे उनके आसपास इक्ठ्ठे हो जाते हैं। चुपचाप सब आकर बैठ जाते हैं। दादा और पोते मिलकर कौवों को खाना खिलाने लगते हैं। पनीर के छोटे-छोटे टुकड़े हवा में उड़ते हैं और कौवे उसे मुंह में डाल लेते हैं। ये वर्णन किसी पंचतंत्र की कहानी का नहीं बल्कि दिल्ली के विकासपुरी इलाके़ में रहनेवाले खन्नाजी के घर का हैं। खन्नाजी दिल्ली के ही रहनेवाले हैं और पिछले 40 सालों से वो कौवों के दोस्त हैं। उनकी एक आवाज़ पर सैकड़ों कौवे उनके आसपास आ जाते हैं। नवीन खन्ना का नाम तीन बार लिम्का बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज़ हो चुका हैं उसके इन्हीं दोस्तों की वजह से। खन्नाजी बताते हैं कि जब वो कालकाजी इलाक़े में रहते थे वो रोज़ाना पक्षियों को खाना डालते थे। एक दिन उन्होंने खाना नहीं डाला तो छत पर एक कौवे ने उन्हें अपनी मधुर आवाज़ से पुकारा और फिर जो उनकी दोस्ती हुई वो 20 साल तक बरक़रार रही। खन्नाजी कौवों पर कई शोध कर चुके हैं। कौवों के ज़रिए ही उन्हें दिल्ली में आए भूकंप का पूर्वानुमान लग पाया था। मैंने जब ये पूछा कि कौवों को तो हम अपशगुन मानते हैं तो वो हंस पड़े। उन्होंने कहा कि कौवे उनके ही नहीं उनके परिवार के हर सदस्य के दोस्त हैं और कौवे अपने आप में बेहद शांत जीव हैं। कौवा कभी लड़ता नहीं हैं । लड़ाई हुई भी तो जो उम्र में बड़ा होता है वो चुप हो जाता हैं। खन्नाजी का ये कोवा प्रेम उनके बच्चों से होकर उनके पोते तक पहुंच गया हैं। खन्नाजी का पोता शौर्य सुबह उठते से ही कौवों के पास जाने की ज़िद्द करता हैं। खन्नाजी रोज़ाना इनसे मिलने और उन्हें खिलाने के लिए पार्क में जाते हैं और दादा पोते को देखकर उनसे मिलने दूर-दूर से कौवे आते हैं...

4 comments:

हिमांशु । Himanshu said...

विचित्र है यह । यह सब कुछ संभव हुआ होगा कौवों के प्रति तीव्र संवेदना और आत्मीय भाव से ।

आभार ।

‘नज़र’ said...

वाक़ई अनोखी
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'विज्ञान' पर पढ़िए: शैवाल ही भविष्य का ईंधन है!

vinay said...

yeh pashu pakshi to sneh ke bhukey hote hai,aisa maine kahi aur bhi suna tha parntu yaad nahin aa rha

ओम आर्य said...

jara hat ke hai baate ......badhaaee