Tuesday, December 1, 2009

लिजलिजी कौम

कल मम्मी, मैं और भुवन लक्ष्मी नगर तक गए। यूँ ही थोड़ा बहुत घूमने के लिए। कल मंगलवार तो सो पूरा लक्ष्मी नगर खचाखच भरा हुआ था। घूमने फिरने के बाद जब हम लोग वहाँ से बाहर की सड़के ले लिए बढ़े तो पीछे से किसी ने मेरी कमर पर हाथ मारा। मैं पलटकर देखती तब तक वो आदमी आगे बढ़ गया। मैं उस पर चिल्लाई। देखने में वो आदमी पूरी तरह से नशे में लग रहा था। ऐसे में मम्मी ने कहा उसे क्या कहोगी वो ख़ुद ही होश में नहीं हैं। भुवन हमसे कुछ दूरी पर था। जब उसे ये बात मालूम हुई उसने कहा कि मुझे उसे मारना चाहिए था। मैंने मम्मी की दलील उसके आगे रख दी कि वो नशे में धुत था। हम जब मुख्य सड़क पर पहुंचे तो देखा कि वही आदमी किसी और लड़की के पीछे चल रहा है। लड़की को उसने उसी तरह पीछे से मारा और लड़की अकेली थी सो घबराकर आगे बढ़ गई। इसके बाद नशे में धुत वो आदमी एक दम आराम से चलता हुआ किसी और लड़की की तलाश में निकल पड़ा। ये देखकर मुझे अपनी बेवकूफी पर अफसोस हुआ। खैर, मैं उस लड़की तरह अकेली नहीं थी। हम तीनों उस आदमी की ओर बढ़े और जैसे ही भुवन ने उसे पकड़कर दो थप्पड़ मारे उसका पूरा नशा पेशाब के रास्ते बाहर निकल गया। उस आदमी ने पलटकर किसी तरह की कोई हाथापाई नहीं की चुपचाप मार खाता रहा। मुझे ये देखकर आश्चर्य हुआ कि वो आदमी कितना लिजलिजा है। कोई औकात नहीं है उसकी, कोई दम नहीं है उसमें। ऐसे में मैं अगर अकेली होती तो ज़रूर उससे डर जाती और उसे कुछ ना कहती जैसा कि उस लड़की ने किया। मुझे अफसोस के ही रोज़ाना इस तरह के लिजलिजे और गंदी मानसिकतावाले लोगों से दो-चार होने के बावजूद मैं इन्हें कुछ नहीं कह पाती हूँ। मैं डर जाती हूँ। मुझे अपने आसपास मौजूद भीड़ पर यकीन नहीं है कि वो मेरी मदद को आगे आएगी। मैं ख़ुद शारीरिक रूप से सक्षम भी नहीं हूँ कि उससे अकेले ही निपट लूं। मैंने अपनी आनेवाली ज़िंदगी के लिए इतना तो तय कर ही लिया है कि मेरे जब भी बच्चे होगे मैं उन्हें शारीरिक रूप से इतना तो सक्षम बनाऊंगी ही कि वो ऐसी लिजलिजी कौम से ना डरे...

8 comments:

अजय कुमार said...

सही सबक दिया

अंशुमाली रस्तोगी said...

बस, इस डर को अपने मन-दिमाग से बाहर कर दें। ताकत है आपमें पुरुष-उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने की बस किसी तरह से उसे बाहर निकालना है।

खुला सांड said...

ऐसे मौके पर डरने के बजाय दो चप्पत रशीद कर देनी चाहिए फिर आस पास के लोग अपने आप संभाल लेंगी उसे!!!

वन्दना said...

bilkul sahi kaha aapne......magar khud mein bhi thodi himmat rakhni chahiye .........ek baar aap pahal karengi to sath jaroor milega.aakhir kab tak darenge?

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

इस सोच को दूर दूर तक फैलाने की आवश्यकता है।
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अदभुत है हमारा शरीर।
क्या अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद सफल होगा?

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

इस सोच को दूर तक ले जानी की जरूरत है।
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अदभुत है हमारा शरीर।
क्या अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद सफल होगा?

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

इस सोच को दूर दूर तक फैलाने की आवश्यकता है।
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अदभुत है हमारा शरीर।
क्या अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद सफल होगा?

HARI SHARMA said...

हिम्मत तो दिखानी ही चाहिये. कमी उस लिजलिज़े प्राणी की परवरिश की है जिसे औरो को भुगतना पडता है.
http://hariprasadsharma.blogspot.com/