Wednesday, March 3, 2010

नशे की दुनिया

भुवन
ऑफ़िस आते जाते रोज़ाना ही एक न एक नशेड़ी सड़क पर औंधे मुंह गिरा पड़ा नज़र आ जाता हैं। हम तरक्की कर रहे हैं। पहले बस में धक्के खाते थे और अब झट से मैट्रो से उड़कर ऑफ़िस पहुंच जाते हैं। लेकिन, सड़क से आसमान तक पहुंच जाने के बाद भी क्या आम आदमी की हालत में कुछ सुधार आया है। मेरा ऑफ़िस जहांगीरपुरी के पास है और इस इलाक़े में मज़दूरों की संख्या शायद सबसे ज़्यादा है। दिनभर मंडी में बदन तोड़ मेहनत करने पर शाम को मिलता है इन्हें कुछ दस या बीस रुपए। ऐसे में ये लोग इस बीस रुपए का खाना नहीं खाते बल्कि दस रुपए की बचत करते हुए नशा कर लेते हैं। खाना खाते ही कुछ देर में पच जाएगा लेकिन नशा घंटों तक बेसुध रखेगा। तब न भूख लगेगी न प्यास। भूख इंसान से जो कराएं वो कम। रोज़ाना सड़कों के किनारे और कभी-कभी बीच में पड़े इन लोगों को देख चार साल पुरानी यादें ताज़ा हो जाती हैं। कॉलेज में डॉक्यूमेन्ट्री बनाना कोर्स का हिस्सा थी। ऐसे में मैंने स्टेशनों और गंदी बस्तियों में रहनेवाले नशेड़ी बच्चों को अपना विषय बनाया था। पहले दिन जब अपना कैमरा उठाए में पुराने भोपाल के एक एनजीओ शेल्टर होम में गया तो वहाँ का नज़ारा मेरे लिए बिल्कुल अलग था। फटे पुराने और गंदे कपड़ों में छोटे-छोट बच्चे इधर-उधर खेल रहे थे। कुछ गाना गा रहे थे कुछ पढ़ रहे थे, तो कुछ बस यूँ ही शून्य को निहार रहे थे। वहाँ काम करनेवालों ने बताया हम यूँ ही रोज़ाना यहाँ आते हैं और सुबह से शाम तक बैठे रहते हैं। जैसे ही बच्चे आते हैं हम उनकी मदद के लिए तैयार हो जाते हैं। कुछ एक बच्चे तो ऐसे होते है जो इतना भयंकर नशा करते हैं कि उन्हें संभालना ही सबसे बड़ी चुनौती होती हैं। उन्होंने बताया कि पहले वो बस्तियों में जाकर ऐसे बच्चों को यहाँ लाते थे लेकिन, इनके माँ-बाप ही इन्हें ऐसे रखना चाहते हैं ऐसे में वो इन्हें लाने नहीं देते थे। ये जानकर बहुत दुख हुआ और हैरानी भी की माँ-बाप ख़ुद ही बच्चों को नर्क में डाल देते हैं। अगर वो पाल नहीं पाते हैं तो वो उन्हें पैदा ही क्यों करते हैं। खैर, ऐसे बच्चों को कैमरे क़ैद किया और कइयों से बात की। इस गंदगी और नशे की दुनिया में लिप्त इन बच्चों में ज़िंदा बचपना देख लगाकि कितना क्रूर भी हो सकता है भाग्य। इसके बाद में अपना कैमरे लिए पहुंच गया स्टेशन के आसपास पड़े कूड़े के ढ़ेरों पर। हाथों में सूलोशन से भीगे कपड़े थामे देखा एक सुन्दर भविष्य के विकृत होते स्वरुप को। आगे बढ़ता गया और देखता गया कि कैसे इंसान की ज़िंदगी किसी गंदी नाली में पड़े कीड़े से भी बदतर हो सकती है। आज जब देश की राजधानी में पड़े इन नशेड़ियों को देखता हूँ तो लगता है कि इनका बचपन भी कुछ ऐसे ही बीता होगा। अपने ज़िंदा माँ बाप की इन नाजायज़ औलादों का कोख में ही मर जाना शायद बेहतर होता हैं। इन लोगों के लिए ये दुनिया ख़ूबसूरत नहीं बल्कि सज़ा है।

1 comment:

vinay said...

भावुक कर दिया आपने ।