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Wednesday, April 13, 2011

जब साइकल से नापा दिल्ली को...

कई बार ऐसा होता है कि नौकरी करते-करते एक ऐसा वक़्त आ जाता है कि हम कुछ नए की तलाश में लग जाते हैं। वही कुछ ना मिल सकें तो कही और खोजना शुरु कर देते है। परिवर्तन की चाह स्थाई भाव की तरह हमारे साथ चिपका रहता है। लेकिन, मैं हमेशा से यथास्थिति को बनाएं रखने में यक़ीन रखती हूँ। जो जैसा है वैसा ही रहे कुछ ना बदले। जैसे ही कुछ बदलाव होते हैं मैं बैचैन होने लगती हूँ। दरअसल ये मेरे अंदर का डर और आत्मविश्वास की कमी है जोकि मुझे परिवर्तन के प्रति पहले से ही डरा देती हैं। खैर, नौकरी के मामले में मेरी राय बदलाव न होने के मामले में कुछ ज्यादा है। लेकिन, न चाहते हुए भी हर बार, हर नए हफ्ते में किसी नई परिस्थिति में पड़ जाती हूँ। मेरे साप्ताहिक कार्यक्रम सुर्खियों से परे के लिए मुझे ऐसी-ऐसी ख़बरें खोजनी और करनी पड़ती है जो मुझे कुछ नया अनुभव मुफ्त ही दे जाती है। कभी मुझे संसद भवन की रखवाली में लगे लंगूर से हाथ मिलाने पड़ता है, तो कभी गधों के लिए काम करनेवाले अंग्रेज़ जोड़े के साथ घूमना और कभी तो कपड़ों की धुलाई के नए तरीक़ों की छानबीन करनी पड़ जाती हैं। कइयों को लगता है कि मैं भाग्यशाली हूँ कि मुझे ऐसे मौक़े मिलते हैं लेकिन, मुझ जैसी आलसी के लिए ये मौक़े बहुत ही भारी होते हैं। और, आसली होने के बावजूद मेरे कामचोर न होने की वजह से हर बार ऐसी स्टोरी से मुझे दो चार होना ही पड़ता हैं। बात कुछ 15 दिन पहले की है जब मुझे डेल्ही बाय सायकल के बारे में जानकारी हुई। कुछ विदेशी जो कुछ साल से दिल्ली में रह रहे हैं, दिल्ली की सैर करवाते हैं। सैर का तरीक़ा ऐसा जो कोई भी पारंपरिक भारतीय पर्यटक कभी ना अपनाएं। साइकल पर सवार होकर ये लोग पर्यटकों को दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों की सैर करवाते है। जैसे कि पुरानी दिल्ली का वो इलाक़ा जिसे शाहजहां ने बसाया था या फिर यमुना के किनारे बसी दिल्ली या फिर अंग्रेज़ों के समय बसी दिल्ली। ये सभी सुबह-सुबह एक निश्चित समय पर पहुंचकर पर्यटकों को साइकल थमा देते हैं और आगे-आगे साइकल चलाते जाते हैं और पीछे पर्यटक। मैं भी इस टूर को शूट करने के लिए सुबह 6 बजे पहुंच गई पुरानी दिल्ली के डिलाइट सिनेमा के सामने। वहां मिली स्तासा। स्तासा इस ग्रुप की एक गाइड है। उसने हमें बताया कि कैसे वो पिछले पांच महीने से भारत में केवल इस ग्रुप के साथ इंटर्नशीप के लिए है। इसकी शुरुआत जैक ने की है जोकि नीदरलैण्ड से है। वो दिल्ली में नीदरलैण्ड के एक अखबार के संवाददाता के रूप आए थे। लेकिन, कुछ नए की चाह में उन्होंने दिल्ली को साइकल पर घुमाने की शुरुआत की। सुबह-सुबह पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में मैं साइकल चलाऊंगी ये मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। लेकिन, मैं चला रही थी। जिस दिल्ली में 6 साल से कुछ नहीं चलाया और शूट के चक्कर में उसे पूरा नाप लिया। उस दिल्ली में मैं साइकल चला रही थी, वो भी कुछ 15 साल बाद। मैं और मेरा कैमरामैन हम दोनों ने पूरे 11 किलोमीटर के टूर में कभी उनका पीछा किया तो कभी उनके आगे चले। मेरे कैमरामैन साइकल से ही ऑफिस आते हैं, तो साइकल नहीं लेकिन उसे चलाते हुए कैमरा हैंडल करना ज़रूरत भारी पड़ा होगा। पुरानी दिल्ली की गलियों में यूं साइकल पर देखकर लोग तो हमें कम चौंके मैं खुद ही अपने आपमें चौंकी हुई सी थी। स्तासा ने हमें तुर्कमान गेट, पुराने घर और मंदिर दिखाए। हालांकि इनके बारे में उसकी जानकारी मुझे कुछ कम लगी। कई बार मुझे उसे सही करना पड़ा। कामकाज स्पष्ट बोलना कितना ज़रूरी और हिम्मतवाला काम है ये मैंने उससे सीखा। स्तासा ने हमारे टूर के दो पर्यटकों को आधे टूर से ही लौटा दिया क्योंकि वो साइकल नहीं चला पा रहे थे। बिना किसी लाग लपेट के उसने कहां और वो दोनों चले भी गए। कोई भारतीय होता तो पैसे देने का रौब जमाते और साइकल ना आने की बात को छुपाने के पीछे दलील देते और वही झगड़ने लगते। स्तासा ने चांदनी चौक, फतेहपुरी मस्जिद, लाल किला और जामा मस्जिद भी दिखाई। इन्हें कई लोगों ने कई बार देखा होगा। लेकिन, जैसे मैंने देखा और जैसा महसूस किया वो यूनिक था। चांदनी चौक पर साइकल चलाना या फिर लाल किले के सामने भीड़ भाड़वाली सड़क को साइकल से क्रास करना। इस टूर में हमने नई दिल्ली को भी देखा और बदहाल यमुना नदी के साथ गंदी गौशालाओं को। इस सबके बीच कई बार ये महसूस हुआ कि अंग्रेज भारत गंदगी देखने ही आते हैं। इन टूर में भी अधिकतर अंग्रेज़ होते हैं। क्योंकि उन्हीं को भारत के इस चेहरे में दिलचस्पी है और वही है जोकि घूमने के उद्देश्य से लगातार तीन घंटे साइकल चला सकते हैं। हमारे लिए तो घूमने का अर्थ ही आराम होता है। मेरे लिए इस टूर को शूट करने से बड़ा अनुभव रहा यूं साइकल चलाना और दिल्ली के गली कूचों से गुज़रना। जहां कुछ लोग मुस्कुराते मिले तो कुछ छेड़ते और फब्तियाँ कसते। दो दिन तक उनका पीछा करने के बाद तीसरे दिन सुबह-सुबह में जल्दी ही उठ गई और लगा कि जैसे फिर चली जाऊं। मेरी यही तो परेशानी है बदलाव से डरती हूँ और अगर कुछ बदल जाएं तो बस उसी में ढल जाती हूँ...

Tuesday, February 8, 2011

स्त्रीलिंग होने का अर्थ...

दिल्ली में चलनेवाली मैट्रो ट्रेन में महिलाओं के लिए आरक्षित अलग कोच कई पुरुषों को ग़लत लगता है। पुरुषों की दलील है कि महिलाएं तो कंधे से कंधा मिलाकर चलती है। तो फिर क्यों अब वो अलग कोच चाहती है। महिलाओं की बराबरी पुरुषों को कितनी पसंद है और कितनी नापसंद इसका जवाब तो कोई पुरुष ही दे सकता है लेकिन, महिलाओं की हिम्मत को उनकी अकड़ और उनकी परेशानियों को उनकी ढाल माननेवाले पुरुषों के लिए ही एक सर्वे हुआ है। अगर वो चाहे तो इस लेख को पढ़ने के बाद महिलाओं की तकलीफ़ों को समझने और सही मानने की एक नए सिरे से कोशिश शुरु कर सकते हैं...

गैर सरकारी संगठनों की ओर से हुए एक सर्वे के मुताबिक़ भारत में केवल 12 फ़ीसदी महिलाओं को ही माहवारी के दौरान साफ़-सुथरे नैपकिन उपयोग के लिए मिल पाते हैं। ये आंकड़ा चौंकानेवाला है। कम से कम मेरे लिए। शहरों में रहनेवाली और जीने के लिए ज़रूरी चीज़ों को आसानी से पा लेनेवाली मुझ जैसी लड़की के लिए ये आंकड़ा चौंकाने के साथ डराने का भी काम कर रहा है। देश की मात्र 12 फ़ीसदी महिलाएं नैपकिन का इस्तेमाल कर पाती है। संभव है कि ये महिलाएं मुझ जैसी शहरी ही हो। मतलब कि गांव और कस्बों में हर महीने महिलाओं को चार से पाँच दिन बद से बदतर हालात में गुजारने होते होंगे। बेहतरीन क्वालिटी और हाईजीनिक नैपकिन्स के इस्तेमाल के बाद भी कई बार दर्द और परेशानी जब सहन नहीं होती है तब उनकी क्या हालत होगी जो कपड़े या फिर पॉलीथीन का इस्तेमाल करती हैं। इन दिनों में साफ सफाई के साथ शारिरीक तौर पर आराम बेहद ज़रूरी माना जाता है। ऐसे में सर्वे के मुताबिक़ कई महिलाएं इस दौरान राख या रेत का भी प्रयोग करने के लिए मजबूर है और काम उतना ही जितना रोज़ाना होता है। राख या रेत के इस्तेमाल से कई महिलाओं को घाव हो जाते हैं और कई तरह की बीमारियाँ भी हो जाती हैं। गांवों में महिलाओं को इस दौरान अछूत मान लिया जाता है। कोई उन्हें छूता तक नहीं है और न ही उन्हें किसी मंगल कार्य में शामिल होने दिया जाता हैं। माहवारी के दौरान घर के काम या किचन में घुसने की मनाही के पीछे मूल वजह महिला को आराम देना और स्वच्छता को बनाए रखना ही होगी, जो आगे चलकर रूढ़ीवादी सोच में बदल गई। गांवों से इतर शहर में रहनेवालों के लिए तो टीवी पर हर ब्रेक के दौरान आनेवाले सैनेटरी नैपकिन के विज्ञापन को देखकर तो ये आभास होता है कि अब तो ये एक बेहद सामान्य सी बात है कि सभी को इसके बारे में मालूम है और महिलाएं अब इसका इस्तेमाल भी करती हैं। लेकिन, सच तो ये है कि महिला के लिए नैपकिन खरीदना परिवार के अन्य सदस्यों को एक खर्चा लगता है, उसकी मूल ज़रूरत नहीं। कुछ गैर सरकारी संस्थाओं ने मिलकर पुराने कपड़ों को जोड़कर नैपकिन बनाने की शुरुआत की है जिसकी क़ीमत 1 रुपए प्रति नैपकिन पड़ेगी। लेकिन, जहाँ महिला को पहनने को कपड़े और खाने के लिए पैसे ना हो वहाँ एक रुपए का नैपकिन भी बहुत बड़ी और मंहगी बात हैं। कई बार मुझे लगता है हम सच में आगे बढ़ रह रहे हैं। देश की महिलाएं पुरुषों से कन्धा मिलाकर चल रही है। बैंकों की सीईओ महिलाओं की मुस्कुराती तस्वीरों को देखकर लगता है कि महिलाएं अब किसी बात में पीछे नहीं। लेकिन, इन्हीं ख़बरों के बीच छुपी ये एक कॉलम की ख़बर सर से पैर तक एक झुरझुरी फैला देती है।

Thursday, March 4, 2010

क्या करें क्या ना करें...

प्यार करना बच्चों का खेल नहीं और उससे भी मुश्किल है उस प्यार को ज़िंदगीभर शादी के रूप में निभाना। आज के इस समाज में प्रेम विवाह में जो तेज़ी आई बदलाव तो दर्शाती है साथ ही युवाओं की फैसले लेने की क्षमता भी बताती है। ये बात अलग है कि पिछले पाँच से छः सालों में हुए ये फैसले आनेवाले कुछ दस सालों में बताएंगें कि फैसले सही थे या ग़लत। प्रेम विवाह के लिए असहमति रखनेवाले माता-पिता बच्चों से पल्ला झाड़ लेते हैं लेकिन, इसे स्वीकृति देनेवाले भी आनेवाली परिस्थितियों में बच्चों का साथ ना निभाने की धमकी साथ दे देते हैं। सारांक्ष ये कि प्रेम विवाह ढ़ेढ़ी खीर हैं। लेकिन, पिछले कुछ दिनों से आसपास के अनुभवों को सुनकर लगता है कि अरेन्ज शादियाँ इनसे भी मुश्किल हैं। मेरी दोस्त की शादी कुछ महीनों बाद है वो प्रेम विवाह कर रही है। उसकी बड़ी बहन की शादी अभी नहीं हुई है वजह ये कि उसके माता-पिता बहन के मुताबिक़ लड़का नहीं खोज पा रहे हैं। मेरे बड़े भाई के लिए लड़की खोजना भी हमारे लिए मुश्किल का काम बनाता जा रहा है। इतनी सारी बातों का ध्यान रखना, हर कसौटी पर लड़का और लड़की को परखना कोई आसान काम नहीं। कल मेरी दोस्त का फोन आया उसे देखने एक लड़का आनेवाला है। वो लड़के से माता-पिता की इजाज़त से फोन पर बात कर चुकी है। लड़का उसे अच्छा और समझदार लगा। इसी बीच उसके पिता उससे मिलने गए और उन्हें वो कुछ ख़ास नहीं लगा। माँ-बाप हमेशा ही बच्चों के लिए बेस्ट खोजते हैं और उन्हें अपने बच्चे सबसे सुन्दर लगते हैं। मेरी दोस्त बीच में फंसा हुआ-सा महसूस करने लगी है। बातों-बातों में ही उसने कहा कि क्या यार ऐसी ही परिस्थिति में पड़ना तो अपनी पसंद से ही ना कर लेती मैं शादी। सच है माता-पिता की उम्मीदों, सामनेवाले इंसान और उसके परिवार की उम्मीदों सभी का बोझ आज उसके कंधों पर हैं। ऐसे में फैसला लेना और उस सही या ग़लत फैसले को ज़िंदगीभर ढोना बहुत ही भयानक होगा। समाज बदल रहा है लेकिन, सिर्फ़ प्रेम विवाह के मामले में नहीं बल्कि अरेन्ज शादियों के मामले में भी। अब माता-पिता अपनी मर्ज़ी चलाते हैं तो लेकिन, बच्चों के कंधों पर पसंद-नापसंद की शर्त पर...

Wednesday, February 17, 2010

बिंदास होने के मायने...

आजकल मैट्रो स्टेशन्स पर चारों ओर बिंदास टीवी के विज्ञापन नज़र आ रहे हैं। इन विज्ञापनों में कुछ आधुनिक सोचवाले युवा अपने बिंदास होने का अर्थ समझा रहे हैं। वो बता रहे हैं कि मैं बिंदास हूँ इसका मतलब ये नहीं कि मैं ड्रग्स लेता हूँ या फिर मैं भगवान में विश्वास नहीं रखती। आधुनिक सोचवाले युवा का इस्तेमाल इसलिए क्योंकि ऐसे भी कई युवा मौजूद है जो है तो युवा लेकिन उनकी सोच पुरानी ही है। खैर, ये विज्ञापन आपको एक मिनिट ऐसे युवाओं के बारे में सोचने के लिए मज़बूर करते हैं। आसपास खड़े ऐसे ही कुछ ढ़ीली जींस पहने हुए और बाल बिखराएं हुए युवाओं को ध्यान से देखने पर मज़बूर करते हैं। पिछले ही दिनों एक न्यूज़ चैनल पर मैंने चैनल वी के दो वीजे का इन्टरव्यू देखा। लंदन से भारत ये दोनों युवा अपने हिसाब से जीते हैं और अपने हिसाब से देश और उसकी समस्याओं को देखते हैं। उन्हें इस बात से भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन उनके बारे में क्या कहता हैं। दरअसल हरेक इंसान अपने हिसाब से जीना चाहता हैं लेकिन, हरेक में ऐसे रहने का माद्दा नहीं होता हैं। कोई समाज से डरता हैं तो कोई परिवार से तो कोई अस्वीकार हो जाने से डरता हैं। ऐसे में हम अंदर से कितने भी बिंदास क्यों न हो हम बाहरी रूप में बहुत सामाजिक होते हैं। बिंदास के ये विज्ञापन आपको अपने अंदर झांकने का एक मौक़ा दे रहे हैं। ज़रा एक बार रूककर सोचिए कि क्या आप भी बिंदास हैं...

Friday, February 12, 2010

अति सामाजिक होना मेरे बस की बात नहीं...

मैं आजकल कुछ परेशान हूँ। मुफ़्त में मिल रही सुविधाओं से। आज सुबह ही गुगल की नई नेटवर्किंग साइट बज़्ज़ के बारे में सुना तो लगाकि अब लोग इसमें भी जुटेंगे। लेकिन, आज इस बज़्ज़ को जब मैंने मेरे जीमेल खाते में देखा तो कुछ हैंरान हुई। फिर जब उसे खोला तो मालूम चलाकि मैं भी इसकी सदस्य हूँ और लगभग पचास लोगों को फ़ॉलो भी कर रही हूँ। मैं हैरान हो गई। मुझे लगा कि ये क्या हुआ। मुफ़्त में खाते खोलना मुझे ग़लत लगा। अरे, मुझसे तो पूछा होता। खैर, ये बात सिर्फ़ यही तक सीमित कहाँ। फेसबुक पर भी ऐसा ही कुछ है। झट से आपके खेल के स्कोर दूसरे को चैलेन्ज करने पहुंच जाते हैं और पता नहीं किस-किस को खेलने के लिए उकसा आते हैं। ऑर्कुट में एकदिन अचानक से ही आपको मालूम चलता हैं कि आप के पास एक चैट लिस्ट भी है। माना कि ये सभी मुफ़्त में हमें कई सुविधाएं दे रही हैं लेकिन, इसका अर्थ ये तो नहीं हुआ कि हमसे बिना पूछे ही ये हमारे खाते संचालित करने लगे। इस तरह के मामलों में मैं कुछ कच्ची हूँ। सोशल वेब साइट की सदस्य होने के बावजूद भी बेहद अनसोशल हूँ। मेरी ही तरह और भी कई लोग हैं जोकि इन सामाजिक सरोकारवाली तक़नीक़ का असल चेहरा देख नहीं पाते हैं। मुझे रोज़ाना चार से पाँच मेल आते हैं कि फलां इंसान आपको ढ़िंमका साइट पर देखना चाहता हैं तो फलां तलां पर... इन मेल्स को डिलीट करने पर दूसरे दिन रिमान्डर भी आता हैं और फिर एक धमकी कि, देख लो नहीं तो आप एक्सपायर हो जाएगे (मतलब मरने से नहीं बल्कि खाते के बंद होने से है। ये वो खाता है जो आपने नहीं आपके एवज में उस साइट ने स्वयम् ही खोल दिया है।)
मैं इस इन्टरनेट के मेरी निजी ज़िंदगी (या फिर ये कहे कि मेरे निजी मेल अकाउन्ट) में दखल से बेहद परेशान हूँ। कई बार तो इन साइट्स ने मुझे के पीछे लगा दिया जिनसे मेरी लड़ाई तक हो चुकी है। या फिर ऐसे को मेरी तरफ से जन्मदिन की बधाई चली गई जिससे अपनी मर्ज़ी से बात बंद की थी। ये अंतरजाल की जबरिया दोस्ती मेरे लिए एक बहुत ही बड़ी उलझन हैं और साथ ही लोगों का इसके प्रति उत्साह दूसरी तरह की परेशानी का सबब...

Tuesday, January 19, 2010

पर्वतारोहियों को नज़दीक से समझे...

पिछले कुछ दिनों से मेरी तबीयत बहुत खराब थी। पहले ठंड लग गई, फिर आखों में इन्फ़ेक्शन हो गया और फिर एक आंख में हैमरेज़ हो गया। इन सभी कारण से मैं ब्लॉगिंग से दूर रही लेकिन, ऑफ़िस लगातार आती थी और काम भी उसी गति से चलता रहा। मुझे दिल्ली की इस ठंड ने अंदर तक हिलाकर रखा है। मुझसे ये ठंड बिल्कुल सहन नहीं हो रही है। ऐसी ही बीमारी में मैं पिछले दिनों एक ऐसी जगह शूट पर गई जहाँ जाकर मेरे अंदर की ठंड और बढ़ गई। ये जगह थी - माउन्टनियरिंग म्यूज़ियम। दिल्ली के बीचों-बीच ऐसी शांत जगह कि कल्पना शायद ही किसी ने की हो। इस म्यूज़ियम में पर्वतारोहण से जुड़ी हर चीज़ मौजूद हैं। हमारे देश में कब कौन किस पर्वत पर चढ़ा, कितनी बार चढ़ा, कैसे चढ़ा सब यहाँ आकर मालूम चल जाता है। ये म्यूज़ियम अपने आप में बेहतरीन हैं। यहाँ कई तरह की जानकारियाँ मौजूद हैं। नक्शे हैं, वो उपकरण हैं जो कि पर्वतारोहियों ने इस्तेमाल किए हैं और साथ ही पर्वतों से जुड़ी सारी कहानियाँ तस्वीरों से बयां हैं। यहाँ एवरेस्ट के नामकरण से लेकर फूलों की घाटी को खोज तक को समझा जा सकता हैं। दिल्ली की व्यस्त ज़िंदगी के बीच अगर आपको पर्वतों से प्यार है तो आप भी यहाँ ज़रूर जाए।

Friday, November 6, 2009

बिना शादी किए दिल्ली में रहना...

मौसी दिल्ली में क्यों रहती है? क्या उनकी शादी हो गई हैं?
ये मासूम से सवाल मेरी भांजी ने मेरी मम्मी से पिछले दिनों पूछे। मेरी मौसेरी बहन कुछ दिन पहले भोपाल गई थी। जब मम्मी ने उनकी बेटी को ये बताया कि दीप्ति मौसी दिल्ली में रहती है, तो उसने ये सवाल कई बार मम्मी से पूछा कि बिना शादी के कैसे वो दिल्ली चली गई। मेरी भांजी की उम्र 5 साल है। जब मम्मी ने ये बात मुझे बताई तो मैं खूब हंसी। लेकिन, इस सवाल के पीछे एक बहुत अहम बात छुपी हुई है। आखिर 5 साल की बच्ची के दिमाग़ में ये कैसे आया कि लड़कियां केवल शादी के बाद ही घर से बाहर जाती हैं। आज से वक़्त में तो ये बात और अखरती हैं। पहले के समय की बात और थी कि लड़कियाँ शादी करके ही बाहर निकलती थी लेकिन, आज तो नौकरी से लेकर पढ़ाई तक के लिए लड़कियाँ घरों से बाहर आ रही हैं। लेकिन, शायद आगर गिनती की जाए तो आज भी घरों में ही रह जानेवाली लड़कियों की संख्या ज़्यादा होगी। परिवार के माहौल का बच्चों पर कितना असर होता हैं ये इस बात से भी समझा जा सकता हैं कि जब मैं छोटी थी अपनी मौसियों की शादियाँ होते देखती थी लेकिन, मेरी एकमात्र बुआ की शादी नहीं होती थी। मैं पापा से कहती थी कि- मौसी की शादी होती है, बुआ की नहीं। मेरे पापा बस हंसकर रह जाते थे। मैं ये समझ ही नहीं पाती थी कि किसी की मौसी किसी और की बुआ भी तो होती है। खैर, मेरी बुआ ने शादी क्यों नहीं कि ये बात मुझे बहुत साल बाद समझ आई। लेकिन, मुझे लगता है कि इन बातों को हंसकर नहीं टालना चाहिए। ज़रूरत है उस बच्ची को ये समझाने कि आखिर क्यों दीप्ति मौसी बिना शादी किए दिल्ली में रह रही हैं...

Friday, August 21, 2009

बच्चों की बड़े होने में मदद करें...

क्या आपके बच्चे या छोटे-भाई बहन ने आपसे कभी किसी तरह के घरेलू शोषण की शिकायत की है? हो सकता है कि कभी की हो लेकिन, क्या आपने आपने बच्चे की इस बात को गंभीरता से लिया? उस इंसान से क्या कभी कोई बात की? असल में हमारा समाज ख़ुद को एकदम साफ सुथरा बनाए रखना चाहता है जोकि अच्छी बात है। लेकिन, इसके लिए समाज उपने अंदर की गंदगी को साफ नहीं करता है, बल्कि उसे चादर के नीचे ढ़क देते है। एक औसत भारतीय घर में ऐसी घटनाएं होती ही रहती है। अगर इन घटनाओं का सही आंकलन हो तो संभव है आंकड़ों और इन घटनाओं के दुष्प्रभावों को देखकर आप चौंक जाए। ये मुद्दा मैं इसलिए उठा रही हूँ क्योंकि कल ही मैंने एक कॉमिक पढ़ी। इसमें कहानी तो बच्चों की थी लेकिन, इसे पढ़ना हरेक इंसान के लिए ज़रूरी है। इसकी कहानी एक स्कूल के कुछ बच्चों की है ख़ासकर लड़कियों की जिनका उनके ही स्कूल का एक शिक्षक यौनशोषण करता है। डर के मारे बच्चियों किसी को कुछ नहीं बता पाती हैं लेकिन, इसका असर उनके व्यवहार और पढ़ाई पर साफ नज़र आता है। क्योंकि ये एक काल्पनिक कहानी है इसलिए किसी तरह से बच्चियों के माता-पिता को बात मालूम चल जाती हैं और उनके माता-पिता उन पर विश्वास करके उस इंसान के ख़िलाफ कार्रवाई भी करते है। जैसा कि हमेशा होता है हैप्पी एण्डिंग। लेकिन, इस अंत से मैं खुश नहीं हूँ। क्योंकि ये असलियत नहीं है। असलितय तो ये है कि सौ में से निन्यान्वे बार बच्चे माता-पिता तक ये बात लेकर ही नहीं जाते हैं। वजह सिर्फ़ इतनी कि हमारे घरों में आज भी अभिभावकों और बच्चों के बीच एक दूरी है। कई ऐसी बातें है जिनके बारे में हम बात नहीं कर सकते, कई बातें हैं जो माता-पिता हमसे नहीं कहते। सबकुछ रहता है पर्दे के पीछे। दूसरी वजह जोकि बच्चों को इन बातों की शिकायत से रोकती है वो है माता-पिता का अविश्वास और किसी तरह की कोई कार्रवाई न करना। कई बार माता-पिता अपने ही बच्चों की बातों को गंभीरता से नहीं लेते हैं और अगर ऐसी कोई बात हो तो उन्हें चुप करके बात को दबा देते है। अगर आप एक अभिभावक है तो ध्यान दे अपने बच्चे के दोस्तों पर, अपने रिश्तेदारों पर, उनके व्यवहार में अचानक आए किसी भी बदलाव पर। बच्चों के मामले में किसी पर भी यक़ीन न करें बले ही आपका रिश्तेदार या दोस्त हो। बच्चे कहाँ जाते हैं, कब आते हैं, किससे मिलते हैं, इन सब पर नज़र रखें। बच्चों से उनके शारीरिक बदलावों और यौन क्रियाओं के बारे में उनके मुताबिक़ बात करें।

Saturday, July 18, 2009

सिक्कों के शौकिन...


आज दिल्ली के राजेन्द्र नगर इलाक़े में रह रहे विशुद्ध दिल्लीवाले परिवार के घर जाना हुआ। मेरे कार्यक्रम के सिलसिले में वहां गई थी। यहाँ रहनेवाले सुमित एक कॉइन कलेक्टर है। उनके पास कई विरले सिक्के और नोट है। सुमित अपने बड़े भाई और दो दोस्तों के साथ मिलकर दिल्ली कॉइन सोसायटी नाम की एक संस्था चला रहे हैं। चार लोगों के साथ शुरु हुई ये सोसायटी अब तीन सौ लोगों का परिवार बन गई है। जब मैं उनके घर अपनी कैमरा यूनिट के साथ पहुंची तो प्यारी-सी तीन साल की द्ध्रति (सुमित की बेटी) ने हमारा स्वागत किया। सुमित एक ग्राफ़िक्स डिजाइनर हैं और एक एमएनसी के लिए काम करते हैं। मैंने पूछा कि महानगर की भाग-दौड़वाली ज़िंदगी में जहाँ इंसान को खु़द को ज़िंदा रखना दुभर लगता है ऐसे में इस शौक को कैसे ज़िंदा रखा है आपने। बेहद ही सरल और शांत स्वभाव के सुमित ने कहा कि बस ज़िंदा रखा है हमने ये हमारी ज़िंदगी का हिस्सा है इसके बिना तो जीवन की ही कल्पना नहीं की जा सकती हैं। सुमित को ये शौक़ उनके बड़े भाई से मिला है। ये दोनों ही भाई बचपन से सिक्के और नोट को इकठ्ठा करने में लगे हुए हैं। इनके साथ जुड़े इनके दो और साथी भी इस शौक को पूरे मन से निभा रहे है। पेशे से वकील और बैंक मैनेजर ये दोनों सज्जन सुमित और उनके भाई ऋषि के साथ मिलकर हर साल सिक्कों की प्रदर्शनी भी लगाते हैं। इनके पास दुनिया के अलग-अलग देशों के, अलग और अनोखे नोट मौजूद है। पाकिस्तान में हज पर जानेवाले यात्रियों के लिए अलग से छपाए गए नोट भी इनके पास है जो कि केवल सऊदी अरेबिया में ही मान्य है। नेपाल नरेश की ओर से जारी नोट, बर्मा से लेकर सूडान तक के नोट और एक मुस्लिम देश में छपे वो नोट भी इनके पास है जिन पर गणेशजी की तस्वीर मौजूद है।

हमारे देश में आज़ादी से पहले चलनेवाले नोट, आज़ादी के बाद छपे नोट, कुछ मिसप्रिंट हो चुके नोट, यूनिक नंबरवाले नोट सब कुछ इनके पास है। ये चारों अपनी व्यस्त ज़िंदगी से अपने इस शौक के लिए वक़्त चुरा ही लेते है। इन सभी का मानना है कि आप अगर चाहे तो अपने शौक को पूरा कर सकते है। अगर आप में से कोई भी सिक्कों को संग्रहित करने का शौक रखते हैं, तो आप इनसे सलाह ने सकते हैं साथ ही इनसे जुड़ भी सकते हैं। बस यहाँ क्लिक कीजिए...

Wednesday, July 15, 2009

तिल देखा ताड़ देखा...

मध्यप्रदेश मेरा गृह राज्य है। यही वजह है कि प्रदेश के हर शहर, हर रीत, हर इंसान से मैं एक जुड़ाव महसूस करती हूँ। लेकिन, कुछ महीनों पहले ही मध्यप्रदेश पर्यटन निगम की ओर से जारी ये नया विज्ञापन देखा। ये एक बेहतरीन विज्ञापन है। आँखों के ज़रिए पूरे प्रदेश के बारे में बताता ये विज्ञापन एक अलग और कलात्मक सोच का बेहतरीन नमूना है। वैसे तो ये विज्ञापन अब कुछ पुराना हो चुका है और आप में से कइयों ने इसे कभी न कभी टीवी पर देख भी लिया होगा। लेकिन, फिर भी मैं इस विज्ञापन की लिंक यहाँ दे रही हूँ









एक बार इसे ज़रूर देखे...

Wednesday, July 8, 2009

ग्लोबल विलेज का ग्लोबल शोक...

अख़बारों में ख़बरों के साथ-साथ निजी सुख-दुख की ख़बरें छपना एक बहुत ही सामान्य बात हैं। जन्मदिन की बधाई और मृत्यु के दुख में सभी को शामिल करने ये परम्परा अख़बारों तक ही सीमित लगती थी। लेकिन, फिर टीवी पर कुछ ऐसे मार्निंग शो शुरु हुए जिनमें कि जन्मदिन की बधाइयां दी जाने लगी। इसी तरह अख़बारों में शादी के लिए दिए जानेवाले विज्ञापनों को टक्कर दी मैट्रीमोनियल साइट्स ने जिसे अब टक्कर दे रहा है टीवी विवाह से जुड़े शो दिखाकर। लेकिन, आज नेट पर तफ़री करते हुए कुछ बेहद ही रोचक और नई चीज़ पर नज़र पड़ गई। भास्कर की वेब साइट पर पहली बार मैंने शोक समाचार देखे। मैंने आज से पहले कभी किसी साइट पर ऐसे समाचार नहीं देखे थे। मुझे ये अनोखे लगे। आखिर अख़बार तो किसी एक क्षेत्र विशेष में ही सर्कुलेट होता है। हाँ अगर अख़बार बहुत मशहूर हो तो एक दिन बाद भी कई शहरों में पहुंचता हैं और लोग उसे पढ़ते हैं। लेकिन, फिर भी वो ग्लोबल इंटरनेट पर चस्पा होकर ही बन पाता है। ऐसे में आप विश्व के किसी भी कोने में बैठकर अपने शहर की ख़बरों पर क्लिक करके उन्हें पढ़ सकते हैं। और, ऐसे में शोक को भी ग्लोबल कर देना एक नई पहल है। अब आप बर्घिंग्म में बैठकर भी ये जान सकते हैं कि भोपाल में किस के घर किसकी मृत्यु हो गई हैं। ग्लोबल विलेज का ग्लोबल शोक...

Monday, June 22, 2009

सीटी बजाते लोग...

आप सभी ने सड़क किनारे सीटी बजाते हुए लड़कों को देखा होगा। मोहल्ले की पुलिया पर बैठे हुए इन लड़कों को हर कोई लफंगा और लोफर कहकर पुकारता है। ऐसे में शायद किसी ने ये कभी नहीं सोचा होगा कि यही सीटी एक कला का रूप भी हो सकती है। जी हाँ, सीटी बजाना भी एक कला है और हमारे बीच ऐसे कुछ लोग मौजूद भी हैं जो इसे कला के रूप में विकसित करने में जुटे हुए हैं। ये सभी तरह-तरह से सीटी बजाना सीख रहे हैं। इन सभी ने मिलकर एक association की स्थापना भी की है जिसमें ऐसे लोग शामिल है जिन्हें सीटी बजाने का शौक़ हैं। indian whistler's association इनकी इस संस्था का नाम हैं। ये सभी पूरे देश में फैले हुए है और हर महीने अपनी बैठके करते हैं। एक जगह इकठ्ठा होकर ये सभी सीटी बजाने के नए तरीक़े, कैसे इसे और बेहतर किया जाए इन सब मुद्दों पर विचार करते हैं। चार साल पहले गठित ये association कई जगह अपनी इस कला का प्रदर्शन भी कर चुकी हैं। इन लोगों का नाम लिम्का बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी शामिल हो चुका हैं। internet पर एक community group के रूप में शुरु हुई ये संस्था दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं। अगर आप भी चाहे तो इस संस्था के सदस्य बन सकते हैं। अगर आप इस संस्था के बारे में ज़्यादा जानना चाहते हैं तो लोकसभा टीवी पर मंगलवार रात साढ़े आठ बजे सुर्खि़यों से परे देखें...